समेट लेता हूँ स्वयं को

0 0
Read Time53 Second
deelip vashishth
एक खाली बर्तन सी
लूढकती देह
पसीने की बूँद बूँद से
छलक जाती है जब;
एक शून्यगामी वृक्ष सी
खडी काया
नख -शिख भीग जाती है
श्रम मेह बरसने से
जब ऊँगलियों के पौर पौर तक
टपकती है नमी…
मुख शिला पर लकीरें बना लेते है
स्वेद कण….
ऐसे मे दौड़ पडता हूँ
उस कानन कुञ्ज में..
जहाँ बहुत से पौधे बस एतदर्थ लगाये थे
कि मुझे पेड बडे होते देखना
बहुत पसंद है…..
आज इनके तले बैठता हूँ…
तो लगता है
जैसे देवता की छत्र छाया में बैठा हूँ!
समेट लेता हूँ स्वयं को आकर यहाँ.
जब भी टूट जाता हूँ बिखरने की सीमा तक
#दिलीप वसिष्ठ
सिरमौर(हिमाचल प्रदेश)

matruadmin

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

इस जहाँ में ख़लिश मैं ही हूँ दीवाना

Tue Jul 3 , 2018
इस जहाँ  में ख़लिश मैं ही हूँ दीवाना  या रात की ख़ामोशी सुनता है कोई और भी आसमान के नीदों में चहलक़दमी करके धरती के  ख़्वाब बुनता  है कोई और भी हवा  के ज़ुल्फ़ों से बिखरे आफ़ताबों को ओंस की डाली में चुनता है कोई और भी धूप के टुकड़ों […]

पसंदीदा साहित्य

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।