रंगरसिया छलिया ओ कान्हा

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vipin kumar morya

रंगरसिया छलिया ओ कान्हा,
अब तुम कहाँ गए।

फैला चारों ओर है अंधेरा,
अब तुम कहाँ गए।

यमुना सी यमुना न रही,
गोकुल सा गोकुल न रहा।

बृन्दावन की हरियाली,
सब कुछ अब है बदल रहा।

कहाँ गए तुम कान्हा,
नक्से सारे बिगड़ गए।

न रिश्तों में प्यार है बचा,
न अपनों में अपनापन।

सब कुछ पैसा बन गया,
हाय कान्हा अपनापन।

आज जरूरत है कान्हा,
इस धरती को तुम्हारी।

आ जाओ कीसी भी रूप में,
सत्य पर झूँठ है आज भारी।

रंगरसिया छलिया ओ कान्हा,
अब तुम कहाँ गए।

फैला चारों ओर है अंधेरा,
अब तुम कहाँ गए।

         #विपिन कुमार मौर्या

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

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