अधर्म के परिणामों से बचो

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sanjay

 परिणामों से बचो, मनुष्य धर्मस्थानों में बंधता है या सब जगह बंधता है? व्यापार करते हुए, भवन बनवाते समय या चाहे जो पाप क्रिया करते हुए मनुष्य बंध सकता है या नहीं? मनुष्य किसी भी जगह और किसी भी अवस्था में बंध सकता है। इसलिए यथासंभव परिणामों में बिगाड़ हो, ऐसे संयोगों में नहीं रहना चाहिए। अगर ऐसे वातावरण में रहना पडे़ तो परिणाम न बिगडे़ें, ऐसी सावधानी रखनी चाहिए।

आप साधु नहीं बन सकते और पेड़ी-घर आदि संभाले बिना छुटकारा नहीं, इसलिए अगर परिणामों को अच्छे न रख सको तो यह थोड़ी-सी धर्म-क्रिया दुर्गति में जाने से आपको नहीं रोक सकती। अगर दुर्गति से बचना हो और देव-गुरु-धर्म का प्राप्त संयोग न छूटे, ऐसी इच्छा हो तो धर्म-क्रिया पर बहुत अनुराग पैदा करना होगा और अधर्म क्रिया के राग के प्रति विराग पैदा करना होगा। भयंकर से भयंकर पाप-क्रिया करते समय भी परिणाम अधर्ममय न बन जाएं, ऐसी मनोवृत्ति विकसित करनी होगी।

पंचेन्द्रिय प्राणिवध, महारम्भ, महापरिग्रह आदि नरक के कारणों का सेवन करने वाले भी नरक में नहीं गए और सद्गति को प्राप्त हुए, ऐसे उदाहरण हैं। लेकिन किस प्रभाव से? जैसी क्रिया, वैसे परिणाम होते तो वे अवश्य नरक में जाते, लेकिन उन्होंने परिणामों को बिगड़ने नहीं दिया।

धर्मक्रिया करने वाले के परिणाम बिगड़ने की संभावना कम रहती है, लेकिन वह भी अधर्म में मन से फंस जाए, यह संभव है। आपको तो अधर्म में बैठे हुए भी अधर्म के परिणामों से बचना है न? ‘अधर्म छोड़ने योग्य है और एकमात्र धर्म ही सेवन योग्य है’, ऐसा अनुभव हुए बिना परिणाम अच्छे कैसे रह सकते हैं? इसलिए हम तत्त्वज्ञान की बात कर रहे हैं। आप अगर सच्चे तत्त्वज्ञाता बनें तो अधर्म में बैठे हुए होकर भी अधर्म के परिणामों से खुद बहुत सरलता से बच सकते हैं। अगर शक्ति हो तो पंचेन्द्रिय प्राणिवध, महारंभ और महापरिग्रह आदि को छोड ही देना चाहिए। अगर अपनी चले तो हमें इन संयोगों से हट ही जाना चाहिए। इसलिए तो अपने यहां सुखी मनुष्य निवृत्ति लेकर सिद्धक्षेत्र में रहने लगते हैं और यथाशक्ति परिग्रह को घटाने के लिए परिग्रह का सदुपयोग करने लगते हैं। साधु भी नहीं बना जा सकता है और ऐसी निवृत्ति भी नहीं ली जा सकती है। आपको बहुत लोभ या बहुत ममता न हो, फिर भी आपका स्थान ऐसा है कि कदाचित् बाजार में जाना पड़े, लेकिन मन में क्या है? आप कह सकते हैं कि ‘यह सब अच्छा तो नहीं लगता है, पर संयोग ऐसे हैं कि अगर अभी छोड़ दें तो बहुत हानि हो जाए।’ यह सब मजबूरी से करना पड़ रहा है, इसका दुःख होना चाहिए।

            #संजय जैन

परिचय : संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं पर रहने वाले बीना (मध्यप्रदेश) के ही हैं। करीब 24 वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं बहुत सारे अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहती हैं।ये अपनी लेखनी का जौहर कई मंचों  पर भी दिखा चुके हैं। इसी प्रतिभा से  कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा इन्हें  सम्मानित किया जा चुका है। मुम्बई के नवभारत टाईम्स में ब्लॉग भी लिखते हैं। मास्टर ऑफ़ कॉमर्स की  शैक्षणिक योग्यता रखने वाले संजय जैन कॊ लेख,कविताएं और गीत आदि लिखने का बहुत शौक है,जबकि लिखने-पढ़ने के ज़रिए सामाजिक गतिविधियों में भी हमेशा सक्रिय रहते हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।