आतंक के साये में लक्ष्यहीन लोकतंत्र

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kaji
विश्व के प्रतिष्ठित लोकतांत्रिक देशों में से एक आर्यावर्त ( भारत ) वर्तमान में दिशाविहीन सा प्रतीत होता है क्योंकि शक्तिशाली गणतंत्र के समक्ष अनेकानेक चुनौतियां हैं एवं हम अपनी विक्षिप्त मानसिकता और संकीर्ण कट्टरपंथी विचारधारा के कारण विश्व परिदृश्य से अपनी पहचान खोते जा रहे हैं । देश की वर्तमान जटिल समस्या आतंकवाद है जिसके लिए कहीं न कहीं दलगत दूषित राजनीति और राष्ट्र में तीव्र गति से फैल रहा मज़हबी उन्माद ही दोषी है । हम संक्षिप्तत: यह कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार का राजनीतिकरण हो गया है । लोकतंत्र के समक्ष फैली अराजकता से निपटने के लिए शासन को नीतियां निर्धारित कर उसका क्रियान्वयन करना होगा । वर्तमान सरकार की नीतियां , विकासपरक है परंतु कुछ समुदाय या यह कहें कि वर्ग विशेष के कुछ अशिक्षित लोगों के बहिष्कार से संवैधानिक महायज्ञ में अड़चनें आ रही है ।
 लोकतंत्र के समक्ष सरहद पार से बढ़ते आतंकवाद को कुचलने के सिवाय और कोई हल नहीं । लोकतांत्रिक पर्यावरण को परिशुद्धता, सिर्फ जीवट संकल्पों की आक्सीजन से ही मिल सकती है । दुनियाभर में हो रहे आतंकी हमले,न केवल आतंकवादी दावानल को बढ़ा रहे हैं अपितु हमारी वसुधैव कुटुंबकम् की मैत्रीपूर्ण नीति को भी क्षत विक्षत कर रहे हैं ।
 सरहदों पर हमारे रणबांकुरों के अदम्य साहस और निस्वार्थ बलिदान के परिणामस्वरूप ही आज हम स्वयं को स्वतंत्र कह पाते हैं । हमारे महामहिम प्रधानमंत्री की सदभावना यात्राओं ने अवश्य ही विश्व के समक्ष यह संदेश रख दिया है
 कि हम गौतम, गांधी और महावीर के आदर्शों का अनुसरण कर सकते हैं तो समय आने पर भगतसिंह और मंगल पांडे की तरह विद्रोही भी हो सकते हैं ।
 आखिर कब तक हम अहिंसा के बदले हिंसात्मक गतिविधियों को झेलते रहेंगे ?
 आखिर कब तक हमारा लोकतंत्र, समस्याओं की
बेड़ियों में जकड़ा रहेगा ?
 आखिर कब तक सरहद पर आतंक का अजगर फुंफकारेगा ?
   इन प्रश्नों के जवाब तभी मिल सकते  हैं जब हम धार्मिक कट्टरता की दीवारों को ध्वस्त कर केसरिया-हरा में न बंटते हुए एक रंग में एकता के सूत्र में बंधे और आततायी आतंकियों का संहार कर सके ।
 राष्ट्र धर्म, सभी धर्मों से सर्वोपरि होता है ।
लोकतंत्र को दिशाविहीन से विकास, समाजोत्थान और समृद्धि के चरमोत्कर्ष पर पहुंचाने के लिए नैतिक मूल्यों को समझ कर देशहित में निर्णय लेने होंगे । एक ऐसी विचारधारा को जन्म देना होगा जो शोषण का परिष्कार कर सके तभी हमारा ” मेरा भारत महान” का स्वप्न, मूर्तरूप में परिणित हो पायेगा ।
 हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिलाना होगा ताकि हमारे धर्मयुद्ध में विजय शंखनाद कर सकें क्योंकि राष्ट्रभाषा, देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है ।।

#डॉ.वासीफ काजी

परिचय : इंदौर में इकबाल कालोनी में निवासरत डॉ. वासीफ पिता स्व.बदरुद्दीन काजी ने हिन्दी में स्नातकोत्तर किया है,साथ ही आपकी हिंदी काव्य एवं कहानी की वर्त्तमान सिनेमा में प्रासंगिकता विषय में शोध कार्य (पी.एच.डी.) पूर्ण किया है | और अँग्रेजी साहित्य में भी एमए किया हुआ है। आप वर्तमान में कालेज में बतौर व्याख्याता कार्यरत हैं। आप स्वतंत्र लेखन के ज़रिए निरंतर सक्रिय हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।