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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

सन् १९३१ का नवंबर केवल दूसरे गोलमेज सम्मेलन के लिए नहीं याद रखा जाएगा बल्कि इंदौर को एक दहाड़ता शेर भी इसी माह की१८ तारीख को इंदौर शहर के भविष्य के स्वर्णिम अध्याय बुनने के लिए अवतरित हुआ था | एक ऐसा शख्स जिसने ताउम्र दरियादिल और निडर रहकर शहर की तासीर बदलने और कायाकल्प के विकास के साथ विस्तारवादी रवैया अपनाते हुए इंदौर को विश्वस्तर पर पहचान बनाने की पहली वजह दी |

शेर-ए-इंदौर के नाम से मशहूर सुरेश सेठ साहब लगभग २५ दिनी शारीरिक अस्वस्थता के बाद गुरुवार को हमसे शरीर रूप से तो विदाहो गये पर जेहन में सदा के लिए बस गये | सेठ साहब का जन्म १८ नवंबर १९३१ को हुआ था| जब भी ज़िक्र होगा इंदौर के विकास का तो सुरेश सेठ नाम लिए बिना वो चर्चा ही अधूरी मानी जाएगी| सुरेश सेठ उन नेताओं में से थे जिनके लिए कभी पार्टी सर्वोपरि नहीं रही बल्कि उनकी भूमिका सत्तापक्ष में रहते हुए भी विपक्ष जैसी थी। वे निडर होने के साथ-साथ जिद्दी और बेबाक थे रहा। जो उन्हें जायज नहीं लगता था, उसका वे किसी भी हद तक जाकर विरोध करते थे। वे ग़लत होने पर कांग्रेस पार्टी के खिलाफ भी वे बोलने से नहीं चूके। शहर की शान राजवाड़ा को बचाने के लिए भी अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ आंदोलन किया था।

सुरेश सेठ साहब एक व्यक्तित्व ही नहीं थे बल्कि विकासशील इंदौर का विस्तारवादी अध्याय रहे | उनके जाने से शहर ने एक एसा हमदर्द या कहें मसीहा खो दिया जो न केवल इंदौर के विकास की बात करता था बल्कि इंदौर के हरवर्ग की चिंता को अपने जेहन में समेटकर उसे हल करने के लिए जूझता भी था | अंतिम विदाई देते हुए हर वो शख्स रो रहा थे जिसके दिल में इंदौर रहता हो|

शहर को दिया ‘इंदौर समाचार’

सन १९५७ में शहर की पत्रकारिता को निडरता और स्वच्छता की मिसाल देने के साथ दैनिक इंदौर समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू हुआ | सेठ साहब ने कभी भी अपने निजी लाभ-हानी को महत्व नहीं दिया और स्वच्छ पत्रकारिता कर इस शहर को पत्रकारिता का एक उत्कृष्ठ अध्याय दिया|

 

कंदीलयुग को हटा कर लाए थे इंदौर के अच्छे दिन

शेर-ए-इंदौर कहे जाने सेठ ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत वर्ष 1957 में पार्षद का चुनाव लड़कर की। 1957 से 60 तक वे पार्षद रहे। 1969 में इंदौर नगर निगम के महापौर बने। तब शहर के कई इलाकों में सड़कों पर कंदील जलाकर रोशनी की जाती थी। सेठ ने इनकी जगह बिजली के बल्ब लगवाए। सेठ इंदौर के महापौररहने के साथ ही प्रदेश में रही कांग्रेस सरकार में मंत्री भी रहे। जब वेइंदौर के मेयर चुने गए तब इंदौर की सड़कों को रात में रोशन करनेके लिए लालटेन लगाई जाती थीं। स्ट्रीट लाइटों से जगमग इंदौर कीसड़कों में उनके कार्यकाल में ही पहली बार स्ट्रीट लाइटें लगीं। स्ट्रीटलाइट लगाने की कहानी बड़ी रोचक है। मेयर बनते ही इंदौर कोसजाने का सपना लिए सेठ ने मुंबई की राह पकड़ी। सेठ मंुबई मेंकई दिनों तक रहे और मुंबई की गलियों में घूमकर वहां के विकासको देखा और फिर उसी तर्ज पर इंदौर को संवारने का सिलसिलाशुरू हुआ।

 

अवैध गुमटियां हटाने का फैसला लिया था

सन १९८० में इंदौर शहर में अधिकारियों के संरक्षण में अवैध गुमटियां लग रही थी जिससे शहर की यातायात व्यवस्था व सौंदर्य भी प्रभावित हो रहा था इसी के चलते स्वायत्त शासन एवं पर्यावरण मंत्री रहते हुए उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा था कि ‘निगम के अधिकारी रिश्वत लेकर अवैध गुमटियां लगवा रहे हैं और मुझे बदनाम कर रहे हैं।’ इसके बाद शहर से अवैध गुमटीयों को हटाने का आदेश जारी करवाया और इंदौर को अवैध गुमटीयों से मुक्त करवाया|

 

राजवाड़ा बचाया सेठ साहब ने

तात्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने इंदौर की शान राजवाड़ा निजी हाथों में बेच दिया था | तब सेठ साहब ने 1974 में राजवाड़ा की बिक्री के खिलाफ आंदोलन चलाया। विरोध प्रदर्शन के बाद सरकार ने 1976 में अपना निर्णय वापस लेते हुए राजवाड़ा जनता को समपर्ति किया।

 

८० के दशक में भी रहे आधुनिक सोच के सेठ साहब

सुरेश सेठ साहब 35 वर्ष पहले भी आधुनिक इंदौर की सोच रखते थे। उन्होंने 80 के दशक में विद्युत शवदाह गृह और बच्चों का अस्पताल बनवाने का काम किया। भारी वाहनों का शहर में प्रवेश रोकने के लिए वर्ष 1980 में दो रिंग रोड बनाने का प्रस्ताव तैयार किया था।

 

ताउम्र रहे स्वच्छ राजनैतिक व्यक्तित्व रहे

1989 में विधानसभा में धारा 370 हटाए जाने का अशासकीय प्रस्ताव रखकर सभी को चौंका दिया था। तब उन्हें पार्टी से हटाने का फैसला भी हुआ लेकिन हटाया नहीं जा सका। 1986 में उन्होंने विधानसभा से इस्तीफा भी दिया था। सेठ और विष्णुप्रसाद शुक्ला के बीच 1990 का विधानसभा चुनाव सबसे चर्चित था। शुक्ला तब भाजपा के दबंग नेता माने जाते थे लेकिन सेठ ने 1082 मतों से जीत हासिल की। इसके बाद सेठ ने मेयर और विधानसभा के चुनाव लड़े लेकिन जीत नहीं पाए।

 

हाथी पर बैठ कर पहुँचे सदन, दर्शाया विरोध

दबंग छवि के सेठ एक ऐसे नेता थे जो सच के लिए अपनी पार्टी लाइन को लांघने से भी पीछे नहीं हटते थे। वैसे तो सेठ ने कई बार अनशन आंदोलन कर सरकार की नीतियों का विरोध किया लेकिन एक बार तो वे हाथी से विरोध करने विधानसभा पहुंच गए। सेठ को यह बात पता थी की वहां पर बड़ी संख्या में पुलिस बल मौजूद है जो उन्हें रोकने की कोशिश करेगा। इसी को देखते हुए उन्होंने हाथी से विधानसभा पहुंचने का फैसला किया और गेट तक जा पहुंचे। गेट पर जैसे ही पुलिस ने उन्हें रोका उन्होंने तत्काल अपने कार्यकर्ताओं से कहा कि आप मुझे उठाकर विधानसभा गेट के अंदर फेंक दें। कार्यकर्ताओं ने उन्हें समझाया की इससे आपकों चोट भी आ सकती है लेकिन वे नहीं माने।

 

तो इसलिए भी लता जी को याद हैं इंदौर…

सुरेश सेठ के विरोध से स्वर कोकिला लता मंगेशकर भी अछूती नहीं रही। इंदौर में इनडोर स्टेडियम बनने की कवायद में सरकार जुटी हुई थी। सरकार ने इसके लिए लता जी को एक चैरेटी शो करने के लिए मनाया और उन्हें इंदौर आने का निमंत्रण दिया। सरकार ने इसके लिए लता जी को कई तरह की सुविधाएं दी थी। उस दौरान इंदौर के महापौर रहे सेठ जी को यह बात नागवार गुजरी। उनका कहना था की जब यह सार्वजनिक कार्यक्रम है तो सरकार इतनी सुविधाएं और छूट कार्यक्रम को लेकर क्यों दे रही है। उन्होंने इसका पुरजोर विरोध किया और लता जी जिस होटल में रुकी थी वहां कार्यकर्ताओं के साथ पहुंचकर उन्हें काले झंडे दिखाए थे। इस बात से लता जी भी स्तब्ध थी, आख़िर शो तो हुआ पर उसके बाद लता जी का कोई शो इंदौर में नहीं हुआ |

 

ये याचिकाएँ रही सेठ साहब की देन

१. स्वदेशी मिल की 15 एकड़ से ज्यादा जमीन निजी कंपनी को बेचने के फैसले के खिलाफ।

२. पूर्व मंत्री लक्ष्मणसिंह गौड़ और प्रकाश सोनकर की मृत्यु की सीबीआई जांच की मांग।

३. सुगनी देवी कॉलेज से लगी तीन एकड़ जमीन आवंटन विवाद।

४. खजराना जागीर जमीन मामले में याचिका।

५. नगर निगम पेंशन घोटाला।

६. बख्तावरराम नगर जमीन घोटाला।

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