संघर्ष का फिर दांव खेलो

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anup sinh

जब प्रलयकंर स्थितियां हों,
और चुनौती भेज रही हो
टकराने को तीरों से जब
नियति ढाल-सी बनी खड़ी हो,
दिग्भ्रमित कराने को तुमको
झंझावात खड़ा बद्ध हो
नैसर्गिक हो अथवा न हो
ऐसे में यदि मध्य हो,                                                                                        संघर्ष का फिर दांव खेलो।

सवार तरी पर होकर के,
बढ़ रहे पार जाने को जब
देख भंवर के क्रूर रोध को,
लड़ रहे स्वयं बच पाने को जब
उठतीं हो बार-बार ऊंची
डूबाने को जब नई लहर
अस्वीकृत कर दें सीमाओं को,
कराल काल-सी टूटें तुम पर
संघर्ष का फिर दांव खेलो।

निश्चित कार्य पूर्व का जो
सदृश्य नहीं हो पाता हो,
कभी अक्षमता तो कभी
अहम स्वयं का टकराता हो,
बोल रहा हो काल सामने
साथ कहां मेरा पाओगे,
बिकने वाली वस्तु नहीं कोई                                                                               जो मूल्य चुकाकर लाओगे,                                                                                विपरीत समय औ द्वन्द स्वयं से                                                                            संघर्ष का फिर दांव खेलो।

सकल विश्व दे ठोकर भीषण,
जग से जाकर टकराने पर
समतल पर मिल जाए भूधर,                                                                                  निज का निर्मित पथ लाने पर                                                                             कर अमान्य अस्तित्व तुम्हारा                                                                              सम्मुख कोई विघ्न खड़ा हो,                                                                              तुम्हें मिटाने को जड़ से जब                                                                                  शत्रु स्वयं का और बड़ा हो,                                                                                      संघर्ष का फिर दांव खेलो॥

#अनूप सिंह 

परिचय : अनूप सिंह की जन्मतिथि-१८ अगस्त १९९५ हैl आप वर्तमान में दिल्ली स्थित मिहिरावली में बसे हुए हैंl कला विषय लेकर स्नातक में तृतीय वर्ष में अध्ययनरत श्री सिंह को लिखने का काफी शौक हैl आपकी दृष्टि में लेखन का उद्देश्य-राष्ट्रीय चेतना बढ़ाना हैl 

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29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।