मेरे पैरों में घुंघरू बंधा दे…

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Dilip Kumar
(दिलीपकुमार की वर्षगाँठ पर विशेष)
बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी,होंठों पर फबती हंसी,उबाल खाता जोश,अभिनय में बर्फ-सी शीतलता के साथ अभिव्यक्ति की तीव्रता,जिसकी खूबी का बखान करते वक्त एक बार तो सारे विशेषणों, उपमाओं और उपमेयों का भंडार भी अपर्याप्त-सा महसूस होने लगे,जिसे कभी ‘ट्रेजडी किंग’ कहा जाए तो कभी अभिनय का स्कूल,कभी कोलंबस की मानद उपाधि से अलंकृत किया जाए तो कभी अभिनय सम्राट की पदवी से अलंकृत किया जाए। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ भारतीय उप महाद्वीप के फिल्माकाश पर सतत पांच दशक तक अभिनय की रोशनी से जगमगाने वाले महानायक दिलीपकुमार की,जो ११ दिसम्बर को अपने जीवन के ९५ वर्ष पूर्ण कर रहे हैं। यह अपनी उखड़ती श्वांसों के स्पंदन के बावजूद एक धूमकेतु की तरह जीवित किवदंती बन गए हैं ।
  १९२२ में पेशावर में जन्मे दिलीपकुमार का परिवार कुछ अंतराल के बाद बंबई आ गया। इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद दिलीपकुमार की आगे की शिक्षा पर पूर्ण विराम लग गया,क्योंकि उनके पिता को व्यवसाय में काफी घाटा हो गया। फलतः पिता के कांधे का बोझ हल्का करने के लिए उन्होंने भी नौकरी की तलाश शुरु कर दी। अपने दर्जनभर भाई-बहनों की जिन्दगी को सही राह पर लाने के लिए उन्हें किसी बडी़ नौकरी की तलाश थी,किन्तु पैशानियों की लकीरों पर तो कुछ और ही लिखा था। शक्ल- सूरत से प्रभावी दिलीप जी ने हमउम्र सखा राजकपूर की तरह फिल्म अभिनेता बनने की ठान ली,जहां वे अंततः देविका रानी और हिमांशु राय के स्टूडियो बाम्बे टाकीज जा पहुंचे,जहां आने वाली किस्मत उनका बेसब्री से इंतजार कर रही थी। बाम्बे टाकीज के विख्यात फिल्म कथाकार भगवतीचरण वर्मा के सुझाव पर ही इनका नामकरण किया गया ‘दिलीपकुमार’ (वास्तविक नाम युसूफ खान)। अब बारी थी फिल्मी आगाज की,जहां अमिय चकृवर्ती की फिल्म ‘ज्वारभाटा(१९४४) से मौका मिला,पर असफलता हाथ लगी। कुछ और फिल्मों की असफलता के बाद १९४८ में नायिका नर्गिस के साथ आई फिल्म ‘मेला’ ने सारे समीकरण बदलकर दिलीपकुमार को सितारों के समूह के बीच ला खडा़ किया। दिलीपजी पर फिल्माए गीत ‘ये जिन्दगी के मेले दुनिया में कम न होंगे’ (मो.रफी) ‘गाए जा गीत मिलन के'(मुकेश) और ‘धरती को आकाश पुकारे'(मुकेश-शमशाद बेगम)  जैसे दर्द में डूबे गीत संगीतप्रेमियों की जुबां पर तैरने लगे। १९४८ की ही फिल्म शहीद का गीत ‘वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हो’ इतना सफल हुआ कि उसका सुरूर आज बरसों बाद भी बरकरार है। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर इस गीत की आवाज आज भी हमारे दिल में नई उमंग भर देती है,तन- मन में एक अजीब-सी खुमारी पैदा हो जाती है। शिकस्त,दाग,फुटपाथ, अंदाज(राजकपूर के साथ)संगदिल, बाबुल,तराना,आन,मेला और देवदास जैसी उम्दा फिल्मों में  निराश व दुखी नायक की भूमिका ने उन पर ‘ट्रेजडी किंग’ की छाप लगा दी। हालांकि, अभिनय में परिपक्वता के साथ उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा,पर जीवन में एक ठहराव-सा आ गया। ब्रिटिश मनोचिकित्सक डॉ.निकल्शन ने उन्हें हल्की-फुल्की हास्य प्रधान मनोरंजक फिल्में करने की सलाह दी। फिर दिलीप ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का सिक्का यहां भी कोहिनूर,आजाद,लीडर,गोपी, राम और श्याम जैसी चर्चित व सफल फिल्में देकर जमा दिया।
दिलीपकुमार की संवाद शैली,सार्थक विराम के साथ लयबद्ध आवाज,चेहरे पर अठखेलियाँ करती मुस्कुराहट के साथ-साथ उभरती मासूम-सी झलक और दिल की गहराइयों तक उतर जाने वाला अभिनय एक विशिष्ट पहचान बन गया।  अपने-आपको भुलाकर पात्र की भूमिका में डूब जाने वाला यह शख्स दिलीपकुमार का पर्याय बन गया। १९६६ में दिलीपकुमार ने अपने से आधी उम्र की शोख चंचल हिरणी-सी आँखों वाली ब्यूटी क्वीन के ताज से नवाजी गई अल्हण,खूबसूरत बाला सायराबानो से विवाह रचाया। ‘मुगलेआजम(१९६०)’  में राजकुमार सलीम की इनकी भूमिका यादगार रही। यह फिल्म २००४ में पुनः रंगीन बनकर परदे पर आई। १९५४ में दाग, १९५६ में आजाद,५७ में देवदास , ५८ में नया दौर,६१ में कोहिनूर,६५ में लीडर,६८ में राम और श्याम और १९८३ में फिल्म ‘शक्ति’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। पद्मश्री(१९९१) दादा फालके(१९९४ ) व पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘निशान-ए इम्तियाज’ के अलावा वे भारतीय संसद के उच्च सदन के राज्यसभा सदस्य भी रहे। १९८०-९० के दशक में बैराग, क्रांति(मनोजकुमार के साथ),शक्ति( अमिताभ के साथ),विधाता(संजीव कुमार के साथ),कर्मा और  सौदागर(राजकुमार के साथ) में भी अपने उम्दा अभिनय से फिल्मप्रेमियों का मन मोह लिया। दिलीप ने नूरजहाँ ,नरगिस,मधुबाला,निम्मी,मीनाकुमारी, वैजयंतीमाला,वहीदा,शर्मिला,राखी,नंदा, नूतन व पत्नी सायरा के साथ अपने अभिनय को जीवंत बनाया। १९९८ में प्रदर्शित फिल्म ‘किला’ (रेखा के साथ ) उनकी अंतिम अभिनय अदायगी थी।
आज अपने जीवन के अस्तांचल में प्रवेश कर शून्य में निहारता यह अभिनेता दिलीपकुमार अपने जीवन की ९६ वीं पायदान पर कदम रख अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहा है।

                                                         #कार्तिकेय त्रिपाठी ‘राम’

परिचय : कार्तिकेय त्रिपाठी इंदौर(म.प्र.) में गांधीनगर में बसे हुए हैं।१९६५ में जन्मे कार्तिकेय जी कई वर्षों से पत्र-पत्रिकाओं में काव्य लेखन,खेल लेख,व्यंग्य सहित लघुकथा लिखते रहे हैं। रचनाओं के प्रकाशन सहित कविताओं का आकाशवाणी पर प्रसारण भी हुआ है। आपकी संप्रति शास.विद्यालय में शिक्षक पद पर है।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।