शायद

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navita asthana

जिन्दगी के अजीब मोड़ पे आए हो शायद,
अदालत को पीछे छोड़ के

आए हो शायद।

आज फिर मेरे अल्फ़ाज़ों को चुना है तुमने,
आज फिर मेरे दर्द को पढ़ आए हो शायद।

क्या हुआ जो इतनी शिद्दत से मांगा रब से,
तुम किसी अपने को खो

आए हो शायद।
आज फिर से तेरे चेहरे पर मुस्कान दिखी है,
गली में पहली मोहब्बत ढूँढ

लाए हो शायद।

अब लिखूँगी तो आँखें नम सबकी होंगी,
तुम मेरे कुछ ज़ख्म कुरेद

आए हो शायद।

क्या मैं कुछ लिख पाती जिन्दगी में कभी,
तुम ही हो जो भीतर से लिख रहे हो शायद।

जो तुम न होते तो हम भी शायरा ना होते,
गैरों के शेरों पर कर रहे होते वाह शायद।

रात-दिन लफ्ज़-लफ्ज़ तुम्हें ही बुनती हूँ,
नादान मैं कुछ सहेजना चाहती हूँ शायद।

रात में आ के एकदम से रजाई में सोना,
बिखरी जिंदगी समेटना चाहती हूँ शायद।

आज भी इसी उम्मीद में खड़ी हूँ सामने,
खामोशी को मेरी तुम पढ़ ही लो शायद।

जो तुम सरे-बज़्म कहने में कतराते हो,
इश्क मोहब्बत प्यार वो नाम हैं शायद।

मुझे तुम अपने पास जरा महफूज़ रखना,
मैं ही हूँ तुम्हारे चेहरे की मुस्कान शायद।

तुम्हारे अल्फ़ाज़ महक रहे हैं दोस्तों में,
तुम भी मोहब्ब्त कर आए हो शायद।

मेरी शायरी में अब के निखार आया है,
कहीं दूर से तुमने दाद दी हो शायद।

रातों में बेचैनी-सी लगे है मुझको यारा,
तुम मुझे कहीं तो पुकार रहे हो शायद।

ये दिल फिर से बगावत पर उतारु है,
तुमने फिर कोई दस्तक दी हो शायद।

चलो छोड़ो न कल लड़ूँगी आ के अब,
ये किस्सा तो कभी खत्म न हो शायद।

तुमने अनगिनत तारों को छेड़ दिया है,
कहानी तो अब लम्बी चलेगी शायद।

जहाँ मंजिल थी वहीं खोए हैं आ के,
ये दास्ताँ खूबसूरत मोड़ लेगी शायद।

रातों को सोए जमाना गुजर गया है,
तुम्हारी तरह नींद भी गुम हो शायद।

अब कोई रास्ता ही नहीं दिखता,
मेरे शहर में काली धुंध हो शायद।

तुम्हारे आने से खुश रहने लगी हूँ,
तुम मेरे जीने की वजह हो शायद।

कल आना फिर लिखेंगे मिलकर,
कल कुछ नया धमाल हो शायद॥

#नविता अस्थाना
परिचय:नविता अस्थाना की जन्मतिथि-२अक्तूबर १९८१ और जन्म स्थान-ग्वालियर है। 
वर्तमान में ग्वालियर(मध्य प्रदेश)में ही रहती हैं।आपकी शिक्षा-एमएससी एवं बी.एड. है। कार्यक्षेत्र-अध्यापन का है। आपके लेखन का उद्देश्य- सामाजिक बुराइयों को उजागर करना है। खास तौर पर ग़ज़ल लिखती हैं। 
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।