जौहर-ज्वाला पदमिनी

Read Time15Seconds
durgesh
धधक उठी ज्वाला जौहर की,राजस्थान कहानी थी।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी,वो मेवाड़ की रानी थी॥
गन्धर्वराज घर की किलकारी,चम्पावती की मन ज्योति।
सिंहलद्वीप की राजरागिनी,स्त्री की थी उच्चतम कोटि॥
सुंदरता तन में भी अनुपम,मन बुद्धि संग जीत मनोति।
रतन सेन को भान हुआ तो,बनी वो प्रेम कहानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
चमक चाँदनी-सी,शोभा सूरज,सुरभि सरस मनोहर।
श्वास सुरों-सी,वचन मधुरतम,राज्य की बनी धरोहर॥
गन्धर्वसेन तब रचा स्वयंवर,पाने को राज सुयोवर।
जीत स्वयंवर रतनसिंह तब पदमिनी अपनी बनानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
एक परी सी थी वो सुंदर,स्वर्ग अप्सराएं भी शरमाई।
राजा रतन संग ब्याह रचाकर,गढ़ चित्तौड़ में वो आई॥
बचपन को करके विदा,वो मन-ही-मन लगती हर्षाई।
पीहर छोड़,प्रजा मन रम गई,शान चित्तौड़ रवानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
रानी बन वो चित्तौड़ में आई,मान रतन का गगन हुआ।
पल-क्षण सब रंगत से भर गए,समय साथ अब रतन हुआ॥
जन-जन में खुशियों की बारिश,राजमहल मन मगन हुआ।
रतन पदमिनी महल चढ़े जब,प्रजा की आन निभानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
राज-काज राजा के बल पर,रानी फिर भी साथ बनी।
सुंदर रानी की प्रसिद्धि जब भारत भर  में आम बनी॥
त्याग-वीरता तन-मन में बसी,प्रजा की वो जुबान बनी।
सुंदरता से थी वह ऊपर,आखिर तो वह क्षत्राणी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
दिल्ली सल्तनत पर था काबिज ख़िलजी, जो सुल्तान हुआ।
अलाउदीन ही नाम था उसका,पर रावण- सा शैतान हुआ॥
चर्चा जब दरबार में पहुँची,सुंदर पदमिनी  बखान हुआ।
जागा वो उत्पाती मन था,चोट भी जिसको खानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर….।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
ख़िलजी ने तब रची कूटनीति,चित्तौड़ राज मेहमान बना।
पाने को एक झलक पदमिनी की,उसका मन परेशान बना॥
झलक मिले वो उस क्षत्राणी,बस उसका अरमान बना।
जल-बिम्ब दिखा ऐसे संयोग से,विधि को बात बनानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
झलक पाकर जब वो शातिर,पाने को बस आतुर ही लगा।
राजा रतन किया आतिथ्य तो,छल-बल से उनको ही ठगा॥
अगवा कर,फिर बन्दी बनाया,कैदखाने में उनको रखा।
शर्त रखी पदमिनी देने की,पर रतन बात न मानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
भान हुआ जब राजपूतों को,राज-रतन को क्यों-कैसे छला।
क्षत्राणियां भी जोश से भर गई,पदमिनी का भी मन उबला॥
गोरा-बादल लगी खबर तब,शौर्य उनका बिजली-सा चला।
जान भले बलिदान करें अब,स्वतन्त्रता राजा दिलानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
छल से छली को ही छलने की,सब करने लगे तैयारी।
सजा पालकियां बैठे सैनिक,छुप हाथ लिए तलवारी॥
भरम फैलाया कि रानी सा जाती ख़िलजी के दरबारी।
पालकियों में जमे थे सैनिक,जिनकी रगें बलिदानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
गोरा-बादल पालकियां लेकर चल तो दिए दिल्ली की ओर।
छल-बल से राजा को छुड़ाकर लौटे तो मच गया था शोर॥
गौरां जब रणखेत हुआ,बादल संग रतन दिखाया जोर।
ख़िलजी को धता बताकर ही चित्तौड़ शान बढ़ानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
चन्द मेवाड़ के राजपूतों ने,सेना सल्तनत से की आज ठगी।
ख़िलजी को जैसे लगा तमाचा,चोट अभिमान पे ऐसी लगी॥
हार-चोट पर पदमिनी-लालसा आग बनी तन-मन में लगी।
गौरां-बादल की देख वीरता उसे दांतों ऊँगली दबानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
लेकर बड़ा एक सैनिक-दल बल,घेरा डाला मेवाड़ जमीं।
किला चित्तौड़ शत्रु घेर लिया,प्रजा की लगी थी साँस थमीं॥
क्षत्रियों के तन क्रोध से जल उठे,राजपूती तलवारें खिचीं।
वीरों ने फिर पहन ‘केसरिया’,‘शाका’ की मन में ठानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
शत्रु सेना का जोर देखकर, चित्तौड़ उठी एक लहर गमीं।
क्षत्रियों ने तब लोहा लेकर लाल,कर दी थी आज जमीं॥
थाह स्थिति सेना लेकर क्षत्राणियों-नैन में बढ़ गई नमी।
नैनों में अब ज्वाला भरकर,आन स्वयं की बचानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी….॥
जीत सामने देख शत्रु की,मन को इस्पात- सा कठोर किया।
जिस तन को अभिमान से संवारा,आग समर्पण ठान लिया॥
पतिव्रता का प्रण मन लेकर,सती ही निज को मान लिया।
पदमिनी ने तब जौहर करने की,सबको बात बखानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
शत्रु जीत के जीत न पाए,आओ आज ही कुछ कर जाएं।
अब करना क्या जीकर बहनों,मरकर इक इतिहास बनाएं॥
तन को जला के राख बनाएं,आओ अब इस ज्वाल समाएं।
ढोल-नगाड़ों के तेज स्वर में ज्वाला तेज भड़कानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
कर सोलह श्रृंगार दुल्हन-सा,सोलह हजार की संख्या हुई।
बड़ी विशाल-सी चिता बना के,झुण्ड के झुण्ड ही कूद गई॥
चिंगारियां अब ज्वाला बन गई,सुंदरता सब अब राख हुई।
ख़िलजी जब किले में आया,भस्म ही रही पहचानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर…।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी…॥
शान-आन स्वाभिमान की खातिर,वो ज्वाला में लीन हुई।
ख़िलजी जो भारत मालिक था,स्थिति उसकी दीन हुई॥
सुंदरता उस देह की आखिर ज्वाल में जल न मलीन हुई।
ज्वाला से मिल गई ज्वाला,वो ऐसी पदमिनी रानी थी॥
धधक उठी ज्वाला जौहर की,राजस्थान कहानी थी।
रतन सिंह मन-प्रेम पदमिनी,वो मेवाड़ की रानी थी॥
                                                         #दुर्गेश कुमार
परिचय: दुर्गेश कुमार मेघवाल का निवास राजस्थान के बूंदी शहर में है।आपकी जन्मतिथि-१७ मई १९७७ तथा जन्म स्थान-बूंदी है। हिन्दी में स्नातकोत्तर तक शिक्षा ली है और कार्यक्षेत्र भी शिक्षा है। सामाजिक क्षेत्र में आप शिक्षक के रुप में जागरूकता फैलाते हैं। विधा-काव्य है और इसके ज़रिए सोशल मीडिया पर बने हुए हैं।आपके लेखन का उद्देश्य-नागरी की सेवा ,मन की सन्तुष्टि ,यश प्राप्ति और हो सके तो अर्थ प्राप्ति भी है।
0 0

matruadmin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

राह कठिन है...

Thu Nov 23 , 2017
राह कठिन है जीवन की, पर फिर भी चलते जाना है। नील गगन के पास जाकर, विजय की परचम लहराना है॥ आज गिरे हैं कल उठेंगे, और फिर दौड़ लगाएंगे। राह की कठिनाइयों से हम, नहीं कभी घबराएंगे॥ क्या हुआ जो आज है अँधेरा, कल उजाला हो जाएगा। आज की […]

Founder and CEO

Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।