बचा लेना होगा खुद को मरने से

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aarti kumari
आज नहीं मर रहा है केवल एक इंसान, 
न ही मर रहे हैं सिर्फ बूढ़े लाचार शरीर
पर आज…
मर रही हैं उम्मीद के झिलमिलाते दीप लिए, 
चौखट पे जमी मां की आंखें
जो अपने बेटे के इंतज़ार में पथरा-सी गईं हैं l 
आज मर रही है माँ की ममता 
मर रही है उसकी थपकी देतीं लोरियां, 
सूख रहा है उसके आँचल का दूध
जब उसके बच्चे दूर परदेस जाकर
उसकी आवाज़ तक को सुनने से
कर देते हैं इनकार,
और झटक देते हैं एक सिरे से 
उसके कंपकंपाते हाथों को, 
जो तलाशते रहते हैं
अपने बच्चों में अपने बुढ़ापे की लाठियां…l 
आज मर रहा है एक पिता का धैर्य, 
और उसका त्याग 
मर रहा है उसका आत्मविश्वास
जब उसके ही पुत्र लगा देते हैं 
उसके पूरे वजूद पर एक सवालिया निशान, 
और देते हैं एक करारा तमाचा
उसके द्वारा दी गई परवरिश को…l 
आज का युवा कर रहा है प्रतिनिधित्व
उस पाश्चात्य संस्कृति का, 
जिसमें हमारे घर में बुजुर्गों के लिए 
कोई एक कोना भी मयस्सर नहीं है
जिस महानगरीय व्यवस्था और
मशीनी ज़िन्दगी में बोझ समझ 
छोड़ दिया जाता है बेबस मां-बाप को,
`ओल्ड ऐज होम` में 
घुट-घुट के अंतिम सांसें लेने को l  
आज मानवीय संवेदनाओं को मार 
चमकता खनखनाता कलयुगी सिक्का
कर रहा है 
उन सारे मूल्यों और संस्कारों पर राज,
जो हमारे भरत वंश की परंपरा रही है
जिस संस्कृति में ययाति, श्रवण और
राम सरीखे पुत्र हुए,
जिस संस्कृति में 
बुजुर्गों की सेवा करना
हमारा सिर्फ कर्तव्य ही नहीं, 
बल्कि जिनके चरण 
देवी-देवताओं के चारों धाम तुल्य माने गए, 
आज मर रही है..बेमौत..वही संस्कृति
आज अपनी ही लाश ढो रही है हमारी सभ्यता l 
अब भी वक़्त है..बचा लेना होगा हमें
इन मरती आत्माओं को,
इन लहूलुहान होते पारिवारिक संबंधों को
बचा लेना होगा इन टूटते मानवीय रिश्तों को
बचा लेना होगा अपनी 
खत्म होती भारतीय संस्कृति को,
और बचा लेना होगा गर्त में जाते 
अपने खुद के भविष्य को…ll 

                                                       #डॉ. आरती कुमारी

परिचय : डॉ. आरती कुमारी की जन्म तिथि २५ मार्च १९७७ और जन्म स्थान गया (बिहार) हैl आप वर्तमान में आजाद कॉलोनी माड़ीपुर(मुजफ्फरपुर,बिहार) में निवासरत हैंl आपने एमए(अंग्रेजी), एमएड और पीएच-डी. की शिक्षा हासिल की हैl वर्तमान में सहायक शिक्षिका के रूप में राजकीय उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय (ब्रह्मपुरा,मुजफ्फरपुर) में कार्यरत हैंl  `कैसे कह दूँ सब ठीक है` काव्य संग्रह प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिकाओं में लेख एवं अन्य रचनाओं का प्रकाशन निरंतर जारी हैl वेब और शैक्षणिक पत्रिकाओं में भी लिखती हैंl साक्षा-काव्य-संग्रह -आज के हस्ताक्षर,ग़ज़ल सरोवर आदि भी आपके नाम हैl सम्मान के रूप में  राजस्थान की राज्य इकाई द्वारा शिक्षा एवं साहित्य के क्षेत्र में ‘अनुव्रत सम्मान-२०११’ सहित ‘बिहार विकास रत्न अवार्ड- २०१२’,‘गोपी वल्लभ सहाय सम्मान-२०१३’ `साहित्य साधना सम्मान-२०१५` आदि  पाए हैंl कवि सम्मेलन एवं मुशायरों में पाठ करती हैंl 

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।