
● भावना शर्मा, नई दिल्ली
भारत की सत्तर फ़ीसदी आबादी पान-गुटखों के अड्डों पर, चाय सुट्टा की गिरफ़्त में, हैवानियत के मकड़जाल में, सिगरेट के धुएँ के छल्लों में, गुमटी-चौराहों के ठिकानों पर लगातार अपने जीवन को ठिकाने लगाने में जुटी हुई है। न केवल पुरूष बल्कि उतनी ही संख्या में महिलाएँ और लड़कियाँ भी धुंए की गुलामी को स्वीकार कर अपने शरीर और हार्मोन के साथ खिलवाड़ करने पर आमादा हैं। मशहूर शायर साहिर लुधियानवी का शे’र- “मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया/ हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया…।” ज़िंदगी की परेशानियों को धुएँ में उड़ाने की बात तो करता है, लेकिन वास्तविकता में देखा जाए तो यह फ़िक्र को धुएँ में उड़ाना नहीं है बल्कि ज़िंदगी को भी थोड़ा-थोड़ा करके साथ में उड़ा देना है। देश की यही सत्तर फीसदी आबादी इसी धुएँ को फैशन और स्टेटस सिम्बोल मान कर जीवन यापन कर रही है।
मई के महीने में जब हम अस्थमा दिवस और धूम्रपान निषेध दिवस मना रहे हैं, तब यह ज़रूरी हो जाता है कि हम केवल जागरुकता अभियानों तक सीमित न रहें, बल्कि अपने भीतर झाँकें और यह समझें कि आख़िर हम अपने शरीर, अपने जीवन के साथ क्या कर रहे हैं?

धूम्रपान आज केवल एक बुरी लत नहीं रहा, यह एक ‘स्टाइल स्टेटमेंट’ बन गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, हर साल विश्वभर में लगभग 80 लाख लोग तंबाकू के कारण समय से पहले मर जाते हैं, जिनमें से 12 लाख के क़रीब मौतें पैसिव स्मोकिंग यानी दूसरों के द्वारा किए गए धूम्रपान के कारण होती हैं। भारत की बात करें तो ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे (GATS) 2017 के अनुसार, भारत में लगभग 26 करोड़ लोग तंबाकू उत्पादों का सेवन करते हैं, जिसमें से लगभग 10 करोड़ लोग धूम्रपान करते हैं। यही नहीं, हर साल भारत में तंबाकू से जुड़ी बीमारियों के कारण लगभग 13 लाख मौतें होती हैं और इनमें बड़ी संख्या युवाओं की है।
आज के युवा वर्ग में स्मोकिंग एक फ़ैशन ट्रेंड की तरह देखा जा रहा है। सोशल मीडिया पर स्टाइलिश सिगरेट थामे तस्वीरें, वेब सीरीज़ और फ़िल्मों में नायकों की तरह धुआं उड़ाते किरदार, इन सबने मिलकर धूम्रपान को एक ग्लैमरस रूप दे दिया है। अफ़सोस की बात यह है कि इसका सबसे गहरा प्रभाव किशोर और युवाओं पर पड़ता है, जो हमारे देश का भविष्य हैं, राष्ट्र के निर्माणकर्ता हैं। फ़िल्म अभिनेता, साहित्यकार और दूसरे सेलिब्रिटीज़ जब सार्वजनिक रूप से धूम्रपान करते हैं या ऐसे उत्पादों का प्रचार करते हैं, तो वे जाने-अनजाने में समाज में एक ख़तरनाक संदेश भेजते हैं। भारत में 2012 में लागू हुआ सिनेमा में धूम्रपान के दृश्यों पर प्रतिबंध COTPA) एक सराहनीय पहल थी, लेकिन इसका पालन बहुत ढीला है। वेबसीरीज़ और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स पर तो यह नियंत्रण और भी कमज़ोर है।
धूम्रपान केवल कैंसर, अस्थमा, दिल की बीमारियों जैसे रोगों का कारण नहीं बनता, यह धीरे-धीरे शरीर के हर अंग को खोखला कर देता है। लैंसेट जर्नल में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार, धूम्रपान करने वाले लोगों की औसतन उम्र 10 साल कम हो जाती है। फेफड़े, जो हमें साँस लेने की ताक़त देते हैं, दिल जो जीवन भर धड़कता है और दिमाग़, जो हमारे विचारों और भावनाओं का केंद्र है, इनकी क़ीमत तब पता चलती है, जब यह अंग काम करना बंद कर देते हैं और इसकी जगह नए अंगों के प्रत्यारोपण की ज़रूरत पड़ती है। अस्थमा एक ऐसी बीमारी है, जो सीधे हमारे फेफड़ों को प्रभावित करती है। WHO के अनुसार, दुनिया में लगभग 26 करोड़ लोग अस्थमा से ग्रसित हैं, जिनमें से कई की हालत तंबाकू और धुएँ के कारण और बिगड़ती है। पैसिव स्मोकिंग के कारण भी अस्थमा के मरीज़ों की हालत और गंभीर हो जाती है।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भी विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर एक संदेश दिया था कि- “विश्व तंबाकू निषेध दिवस हमें तंबाकू सेवन से होने वाले नुकसानों की याद दिलाता है और इस ख़तरे को कम करने के लिए हमारी प्रतिबद्धता की पुष्टि करने का दिन है। तंबाकू उत्पादों के अवैध व्यापार को रोकने पर विश्व स्वास्थ्य संगठन का ध्यान एक प्रशंसनीय प्रयास है, जो तंबाकू सेवन को कम करने में मदद करेगा।”
अब जबकि हम जान चुके हैं कि यह धुआं हमारे लिए कितना नुक़सानदेह है, ज़रूरत है समाधान पर काम करने की, जिससे नई पीढ़ी को इससे होने वाले ख़तरों से बचाया जा सके। इसके लिए हम सभी को अपने-अपने स्तर पर ज़िम्मेदारी लेनी होगी। सरकार को इसके लिए न सिर्फ़ नीतियाँ बनानी हैं बल्कि उनको सख़्ती से लागू भी करना होगा। धूम्रपान छोड़ने के लिए मुफ़्त काउंसलिंग और निकोटीन रिप्लेसमेंट थैरेपी जैसी सुविधाओं को देश के कोने-कोने तक पहुँचाना भी एक ज़रूरी कदम साबित हो सकता है। इसके साथ ही मीडिया और फ़िल्म जगत को भी ज़िम्मेदारी लेनी होगी। फ़ैशन के नाम पर धूम्रपान को ग्लोरीफ़ाई करना बंद करना होगा। साथ ही, साहित्यकारों और रचनाकारों की भी समाज के प्रति एक बड़ी ज़िम्मेदारी है। जब वे अपने लेखन, कविताओं, कहानियों और नाटकों में ऐसे विषयों को उठाते हैं, तो समाज का एक बड़ा वर्ग उनसे प्रभावित होता है। इसलिए साहित्यकारों को चाहिए कि वे अपने शब्दों के माध्यम से स्वास्थ्य और जागरुकता के बीज बोएँ, ताकि साहित्य न सिर्फ़ आत्मा का खाद्य बने, बल्कि समाज के निर्माण का एक सशक्त माध्यम भी।
इसके अलावा परिवार और शिक्षकों की भूमिका भी अहम है। यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी स्वस्थ और सजग हो, तो हमें उन्हें उदाहरण बनकर दिखाना होगा। बच्चों को बचपन से ही तंबाकू और धूम्रपान के नुक़सानों के प्रति संवेदनशील बनाना बेहद ज़रूरी है। उनके साथ खुलकर इस विषय पर बातचीत करें, कहानियों और चित्रों के माध्यम से उन्हें यह समझाया जा सकता है कि धूम्रपान कोई ‘हीरोइक’ या ‘कूल’ चीज़ नहीं, बल्कि शरीर के लिए एक धीमा ज़हर है। स्कूलों में भी ऐसे विषयों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिए, ताकि बच्चा शुरुआत से ही स्वस्थ जीवनशैली की ओर प्रेरित हो।
हमारा शरीर एक मशीन नहीं, बल्कि प्रकृति द्वारा दिया गया एक जीवंत चमत्कार है, जिसे संजोना बेहद ज़रूरी है। तो आइए, इस अस्थमा दिवस और धूम्रपान निषेध दिवस पर हम एक वादा करें, अपने शरीर से प्रेम का, अपनी साँसों की क़द्र का, और आने वाली पीढ़ियों को धुएँ नहीं, एक स्वच्छ और स्वस्थ जीवन देने का। हमारा शरीर मंदिर है, और धुआं उसमें ज़हर। अब समय आ गया है कि हम उस ज़हर को अपने जीवन से हमेशा के लिए निकाल दें। ऐसे जहर की जगह शरीर नहीं गटर है।
#भावना शर्मा
लेखिका एवं विचारक
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