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यूँ तो हर घर में कचरा ही कचरा है
लेकिन मेरा वाला कचरा अच्छा है।
वो जो मुझको काना कहता है हरदम
बचपन से ही जो आंखों का अंधा है।
माँ तो खुश हो जाएगी बस छूकर ही
महबूबा को खुश करने का पंगा है।
टेंशन मत लो कब बोला है किसने क्या
सबकी अपनी दूकानें हैं धंधा है।
बाकी सारे ख़तरे तो हैं फोकट के
बचकर रहना मानवता पर ख़तरा है।
दिवाकर पांडेय चित्रगुप्त
जलालपुर (उत्तर प्रदेश)
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