जीत लो

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ये गगन ये धरा,
ये मौसम हसीं।
चलो तुम सदा ,
रुको ना कभी।

सागर की लहरें,
नदिया की धारा।
कुछ बताएं हमें,
समझो इशारा।

ना रुकना कभी ,
चलते रहना सभी।
मिले उर्वर धरा,
या बंजर जमीं।

मिले पुष्प ,कंटक,
या पतझड़ कभी।
मिले रोशन जहां,
या अँधेरी गली।

चूम लो तुम गगन,
तुम जमीं नाप लो।
ना डिगे मन कभी,
धैर्य धरा सा धरो।

शीश झुके ना कभी,
ऐसा भूधर बनो,
छत्रछाया मिले ,
ऐसा अम्बर बनो।

मुश्किलों पर करो,
तुम सदा ही फतह।
बनाओ दिलों में,
सदा तुम जगह ।

बन सितारा चमको,
गगन में सदा।
जीत लो ये जहाँ,
यही है कामना ।

स्वरचित
सपना (स. अ.)
जनपद-औरैया

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matruadmin

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Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।