बहुत याद आए

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बहुत याद आए ,
बचपन प्यारा।
सुन्दर सलोना ,
समय प्यारा प्यारा।

ना सोने की चिंता।
ना उठने जल्दी ।
ना काम कोई था,
ना कोई भी जल्दी ।

वो गुड्डा गुड़िया की,
शादी निराली।
वो नाचना मस्ती में,
बनके बाराती।

वो गुल्ली डण्डा,
साइकिल चलाना।
वो खो-खो, कबड्डी,
वो नाव बनाना।

वो नदी में नहाना।
पेड़ों पे चढ़ना,
वो कंकड़ खेलना,
मेड़ों पे चलना।

वो यारों से मिलना,
लड़ना झगड़ना।
झट रूठ जाना,
फिर मान जाना।

वो दूध,मलाई,
वो माखन रोटी।
शिकायत करना,
वो झूठी मूठी।

वो ऊँची मचान से,
चिड़ियाँ उड़ाना।
वो खलिहानों में ,
बकरी चराना।

वो रंगीन कम्पट,
चूरन की पुड़िया।
दादी का बुलाना
ओ मेरी गुड़िया।

नानी की कहानी,
वो एक राजा रानी।
आए अँखियों में ,
फिर निंदिया रानी।

वो चूल्हे की रोटी,
बैंगन का भुर्ता,
माँ का बनाया,
वो ढीला कुर्त्ता।

वो माँ का आँचल,
दुलार पिता का।
मिल जाए काश,
वो पल बचपन का।

दुनियाँदारी से,
पीछा छुड़ाऊँ।
एक बार फिर से,
बचपन जी जाऊँ।

स्वरचित
सपना (स. अ.)
जनपद औरैया

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।