ग़ज़ल

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pradeep
आज महफिल है हंसी हो, कुछ जवां से आप भी,
आज फिर दिल के बहकने
का इरादा-सा है क्या।

कह नहीं सकते जुबां से,
और दिल खामोश है
कौन है वो कोई अपना,
कोई बेगाना है क्या।

है बसा जो एक सपना,
आज आँखों में नया
आज राही मन्जिलों को
पा नहीं सकता है क्या।

मांगने से क्या मिलेगा,
आज इस संसार में
मुफलिसी का दौर है
ये पेट भर पाएगा क्या।

जब तलक थी वो अमीरी, लोग तब तक साथ थे
आब के टुकड़ों से कोई
वास्ता रखता है क्या।

दासतां ये प्यार की,
किसको सुनाएं आज हम
बेवफाओं के दिलों में
प्यार भी पलता है क्या।

आज बहते आँसूओं की,
कोई कीमत जान ले
जान देकर भी दिलों को,
कोई पा सकता है क्या।

आँसूओं ने जान ली है,
आज रोने की वजह
पूछते हैं आँख से वो,
दिल नहीं रोता है क्या।

    #प्रदीप भट्ट

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।