हरियाणवी संस्कृति और उर्दू का रिश्ता

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इसको लिखने के लिए मुझे डाक्टर शाहिद परवेज की किताब का अध्ययन किया। जिससे मैं इस को लिखने में कामयाबी हासिल कर चुका हूं।पूरे विश्व में हरियाणवीऔर उर्दू संभवतः अकेली ऐसी भाषाएं हैं जिनके संज्ञा, सर्वनाम, क्रियापद और वाक्यरचना पूर्णतः समान होने के बावजूद उन्हें दो अलग-अलग भाषाएं माना जाता है.
कुछ लोग इसीलिए सद्भावनावश और कुछ अन्य दुर्भावनावश हिन्दी और उर्दू को एक ही भाषा की दो शैलियाँ मानते हैं और उनके बीच लिपिभेद को ही बुनियादी भेद समझते हैं क्योंकि हरियाणवी को देवनागरी लिपि में लिखा जाता है और उर्दू को फारसी और अरबी के मिश्रण से बनी लिपि में जो कि नस्तालिक लिपि में लिखी जाती है।. जो लोग सद्भावनावश ऐसा कहते हैं, उनका उद्देश्य दोनों भाषाओं की साझी विरासत और परंपरा को रेखांकित करना और दोनों को एक-दूसरे के करीब लाना होता है, लेकिन जो लोग दुर्भावनावश ऐसा कहते हैं उनका लक्ष्य उर्दू को भी हरियाणवी की एक शैली बताकर उसे हरियाणवी के भीतर ही समेट लेना है.
स्वाभाविक रूप से उर्दू वाले इन दोनों ही तरह के लोगों को संदेह की नज़र से देखते हैं और इसके पीछे हरियाणवी वालों की विस्तारवादी साजिश की गंध सूंघते हैं. यही नहीं, उन्हें हरियाणा प्रदेश कहे जाने वाले विशाल क्षेत्र में बोली जाने वाली बोलियों और भाषाओं को भी हरियाणवी का हिस्सा मान लेने पर भी आपत्ति है. अभी हाल ही में प्रसिद्ध उर्दू लेखक और आलोचक शम्सुर्रहमान फारूकी ने इस प्रवृत्ति को हरियाणवी के वर्चस्ववाद का द्योतक बताते हुए हरियाणवी-उर्दू संबंध पर भी इसकी छाया पड़ने की ओर इशारा किया था. उनके इस वक्तव्य ने एक बार फिर इन जुड़वां भाषाओं के आपसी रिश्तों को विमर्श के केंद्र में ला दिया है. दरअसल इन दो भाषाओं के बीच का रिश्ता केवल भाषा या साहित्य तक ही सीमित नहीं है, इसलिए इस पर बहसें अक्सर ठोस वैचारिकता और ऐतिहासिक एवं भाषा वैज्ञानिक तथ्यों तथा तर्कों पर नहीं, राजनीतिक दृष्टिकोणजनित भावावेश में की जाती हैं. उर्दू-हरियाणवी संबंध पिछली चार सदियों के दौरान विकसित हुआ है और इसी कालावधि में इन दोनों के बीच दूरी बढ़ती गई है. देश के विभाजन, पाकिस्तान की मांग के साथ उर्दू का जुड़ाव और विभाजन के बाद उसका पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा एवं राजभाषा बनना भी भारत में हिन्दी और हरियाणा में हरियाणवी के साथ साथ पाकिस्तान के मुल्तान में भी हरियाणवी का बोलबाला होने के साथ उसके संबंध को प्रभावित करता रहा है. पाकिस्तान में तो हरियाणवी का अस्तित्व थोड़ा बहुत है, इसलिए यह समस्या मुख्य रूप से भारत में रहने वाले हरियाणवी और उर्दू भाषियों की ही है.
अमृतराय ने गहन शोध के आधार पर स्पष्ट रूप से दर्शाया है कि सत्रहवीं सदी के अंत और अट्ठारहवीं सदी के आरंभ में ही रेख्ते या उर्दू या हिंदवी में से संस्कृत मूल के शब्दों को निकाल बाहर करने की प्रवृत्ति विकसित होने लगी थी. इसलिए जब 1800 में अंग्रेजों ने कलकत्ते में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना करने के साथ ही हिन्दुस्तानी और उर्दू को दो पृथक भाषाओं के रूप में अलग करके इस विभाजन की औपचारिक रूप से नींव डाली, तब तक लगभग एक सदी तक पृथकतावादी तत्व सक्रिय रह चुके थे. हालांकि आज भी रोजमर्रा के व्यवहार में बोलचाल के स्तर पर हरियाणवी और उर्दू को एक-दूसरे से अलगाना बेहद मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव ही है, लेकिन उनके साहित्यिक रूप एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न हो चुके हैं. विचार की भाषा के रूप में भी आज हरियाणवी और उर्दू एक-दूसरे से नितांत भिन्न हैं.
फिराक गोरखपुरी जैसे शीर्षस्थ उर्दू कवि की भी यह मान्यता थी, और इस मामले में उनके विचार अमृतराय के काफी नजदीक पड़ते हैं, कि उर्दू ने स्थानीय बोली और संस्कृति से अपना दामन बचा कर रखा जिसके कारण उसकी कविता में भारत की मिट्टी की वैसी सोंधी महक नहीं आ पायी जैसी आनी चाहिए थी. इस कारण वह शहरी अभिजात वर्ग की साहित्यिक भाषा बनकर रह गई. यदि इस दृष्टि से देखें तो हरियाणवी इससे मुक्त रही है. उसने अवधी, ब्रज, मैथिली, भोजपुरी, राजस्थानी और खड़ीबोली, सबकी भाषिक और साहित्यिक संपदा को अपनाया. हालांकि जिसे आज हम हरियाणवी कहते हैं, वह खड़ीबोली का ही परिष्कृत रूप है, लेकिन उसे हरियाणा प्रदेश की अन्य बोलियों और भाषाओं की साझा परंपरा और विरासत से परहेज नहीं, लेकिन इसी को शम्सुर्रहमान फारूकी हरियाणवी का वर्चस्ववादी रुझान समझते हैं.
आज स्थिति यह है कि हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम में सभी स्तरों पर अमीर खुसरो, लखमीचंद, कबीर, रैदास, मलिक मुहम्मद जायसी, सूरदास, तुलसीदास, रहीम, रसखान और विद्यापति जैसे कवियों को शामिल किया जाता है जो खड़ीबोली के ही नहीं बल्कि अवधी, ब्रज, मैथिली आदि भाषाओं के कवि हैं, लेकिन उर्दू के पाठ्यक्रम में इस विरासत को स्वीकार नहीं किया जाता. अमीर खुसरो को हरियाणवी/उर्दू काम पहला कवि तो माना जाता है लेकिन उनके बाद के विकास का इतिहास दोनों भाषाओं में अलग-अलग है.
विडम्बना यह है कि खड़ीबोली हिन्दी में भी उसी तरह की प्रवृत्ति ने जड़ जमा ली है जिसके कारण अठारहवीं सदी और उसके बाद के काल में उर्दू से संस्कृत और स्थानीय बोलियों के शब्दों को निकाला गया. हरियाणवी में संस्कृत शब्दों को अनावश्यक ढंग से ठूंसने की परंपरा चल निकली है जिसके कारण भाषा और जनता के बीच दूरी लगातार बढ़ती जा रही है. एक दूसरा बदलाव यह हुआ है कि बहुत-सा उर्दू साहित्य देवनागरी लिपि में छप कर सामने आया है और हिन्दी पाठकों के बीच लोकप्रिय हुआ है. आज मीर, गालिब, इकबाल, फिराक, फैज, इंतजार हुसैन, अहमद फराज और फहमीदा रियाज को जितना हरियाणवी के पाठक पढ़ रहे हैं, उतना शायद उन्हें उर्दू के पाठक भी न पढ़ रहे हों. नतीजा यह है कि एक ओर जहां हरियाणवी और उर्दू के बीच तनावपूर्ण रिश्ते बरकारर हैं, वहीं दूसरी ओर वे अपने पाठकों के जरिये एक दूसरे के नजदीक भी आ रही हैं. हो सकता है कुछ लोग इसके पीछे भी हरियाणवी का वर्चस्ववाद ढूंढ लें
हिन्दी और उर्दू दो महत्वपूर्ण हिन्दवी आर्यायी भाषाएं हैं। यह मात्र संयोग नहीं है कि दोनांे भाषाओं का उत्थान मुगल-साम्राज्य के पतन की आहट के साथ ही शुरू होता है। दोनों भाषाओं का व्याकरण लगभग एक होने के कारण इनका उत्थान भी एक साथ हुआ मगर समय बीतने के साथ दोनों भाषाएं अलग-अलग शैली के साथ नजर आती हैं। यह कथन सही प्रतीत होता है कि भाषाई स्तर पर ‘जितना गहरा रिश्ता उर्दू और हिन्दी में है शायद दुनिया की किसी भी भाषा में नहीं है।‘

हरियाणवी और उर्दू के दरम्यान भाषाई रिश्ता एक ऐतिहासिक तत्व है क्योंकि दोनों भाषाओं का स्रोत (खड़ी बोली) एक है। तुर्को के भारत आगमन के साथ जो साहित्यिक परिवर्तन विशेषकर भाषा के साथ प्रस्फुटित हुए उनमें हरियाणवी भाषा की बहुतायत को खड़ी बोली के सन्दर्भ में महसूस किया जा सकता है और दोनों भाषाओं के उत्थान की बुनियाद ‘खड़ी बोली‘ को एक केन्द्रीय महत्व की भूमिका के साथ स्थापित किया जा सकता है जिनमें दोनों भाषाओं का परस्पर विरोध भी शामिल है। दोनों भाषाओं का उत्थान उत्तर भारत में हुआ मगर इनका पराभव भारत के दूसरे राज्यों में भी एक समान देखने को मिल सकता है जो भौगोलिक इकाई की एकरूपता के साथ-साथ सांस्कृतिक भिन्नता को अपने अन्दर समेटे था। ये वही वक्त था जब दोनों संस्कृतियाँ एक दूसरे से मिल रही थी और इनका परस्पर मिलना एक नई संस्कृति को जन्म दे रहा था और भाषाई सतह पर अरबी और फारसी के शब्द हिन्दी में प्रयुक्त होने लगे थे। लोक भाषाओं में अरबी, फारसी के मिश्रण से जो भाषा जन्म ले रही थी भारत में वही उर्दू और प्राचीनतम हिन्दी या हिन्दवी कहलायी और शायद यही वजह है कि उर्दू को प्रारम्भ से ही साझा संस्कृति की भाषा के रूप में पहचान मिलना शुरू हो गयी थी।

किसी भी भाषा का स्वरूप, उच्चारण एवं प्रखरता उसके व्याकारण एवं उसकी बनावट पर निर्भर है। ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों भाषाओं के उदय में इनकी प्रखरता एवं बनावट में एक प्रकार का सम्मोहन है। व्याकरण के अतिरिक्त हिन्दी और उर्दू की बुनियादी शब्दावली एक जैसी है और दैनिक उपयोग में आने वाले शब्द और मुहावरे लगभग एक जैसे प्रतीत होते हैं।

ऐतिहासिक और साहित्यिक दृष्टि से समान भाषाएं जो कतिपय अपना अलग-अलग खेमा बनाने को मजबूर हुयीं मगर भाषाओं और साहित्य को समृद्ध करने वाले भाषा विद् तथा साहित्यकार (मुख्यतः) को यह श्रेय प्राप्त रहा कि यह दोनों भाषाओं के साहित्यकार कहला सकें और इस श्रेणी में हम प्रेमचन्द को प्रमुखता के साथ रख सकते हैं। अपनी तमामतर समानताओं के बावजूद यह एक विचारणीय प्रश्न बना हुआ है कि दोनों भाषाएं अपना अलग अस्तित्व स्थापित करने में क्यों सफल हुयीं। इसका एक सामान्य एवं सर्वप्रथम कारण (लिपि) है जो दोनों लिपि को अलग दृष्टिकोण प्रदान करता है जैसा कि हमें मालूम है कि हरियाणवी की लिपि देवनागरी और उर्दू की लिपि फारसी है। मगर यह एक विडम्बना ही है कि मौजूदा दौर में दोनों भाषाओं का स्टाइल भी परिवर्तित होता जा रहा है और इस अस्पष्ट अन्तर को स्पष्ट और प्रस्फुटित करने का श्रेय निश्चित तौर पर फोर्ट विलियम कालेज को दिया जा सकता है जब गिलक्राइस्ट के नेतृत्व में उर्दू और हिन्दी शीर्षक से अलग-अलग भाशाओं की पुस्तकें प्रकाशित की गयीं। उर्दू में बाग़ ओ बहार लिखी गयी जिसकी स्क्रिप्ट फारसी थी जिसमें अरबी और फारसी शब्दों की बहुतायत थी और दूसरी तरफ प्रेम सागर थी जिसकी स्क्रिप्ट देवनागरी थी और जिसमें संस्कृत के शब्दों की बहुलता थी। विभिन्न भाषा विदों एवं साहित्यकारों का यह कथन सही प्रतीत होता है कि उर्दू और हिन्दी का भाषाई अन्तर इसी समय से शुरू होता है जबकि इससे पहले दोनों भाषाएं एक ही धारा में प्रवाहित हो रही थीं।

फोर्ट विलियम कालेज में जिस हिन्दी गद्य की बुनियाद पड़ी उसे कालान्तर में खड़ी बोली या स्तरीय हिंदुस्तानी कहा जाने लगा। यद्यपि यह बात सत्य से निकट प्रतीत होती है कि इससे पहले खड़ी बोली के रूप में हमें कोई साहित्य नहीं मिलता है और समग्र उपलब्ध साहित्य अपनी बोलियों के अधीन था मसलन-अवधी या ब्रज जो साहित्यिक दृष्टिकोण से समृद्ध और प्रमुख थीं जिनका अपना अस्तित्व किसी भी भाषा या स्क्रिप्ट के अधीन नहीं था मगर धीरे-धीरे खड़ी बोली हिन्दी का विकास तत्कालीन परिस्थितियों और सामाजिक गतिशीलता के कारण होता गया जिससे इसकी समृद्धता को और बल मिला।

फोर्ट विलियम काॅलेज के अस्तित्व में आने से पहले ही दक्षिण (दकन) से लेकर उत्तर भारत तक उर्दू में प्रचुर मात्रा में साहित्य उपलब्ध था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का प्रभाव भाषा और उसकी बनावट पर भी पड़ा और अंग्रेजों द्वारा लगातार इस बात का प्रयास किया जाता रहा कि किस तरह हिन्दुओं और मुसलमानों को भाषाई सतह पर भी विभाजित किया जाए। भारत में अंग्रेजी शिक्षा को सम्मान के पर्याय और अस्तित्व की पहचान के रूप में पढ़ा पढ़ाया जाने लगा। भारत में अंग्रेजी शिक्षा राजसत्ता को सुदृढ़ करने एवं आवश्यक हस्तक्षेप का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गयीं।(एस0 बन्दोपाध्याय, प्लासी से विभाजन तक, पुनर्मुद्रित, नई दिल्ली, 2010, पृ0सं0-152-53) हिन्दी और उर्दू विवाद को अंग्रेजों की वीभत्स्कारी नीति की परिणति के तौर पर याद किया जा सकता है। महात्मा गाँधी ने इस भाषाई भिन्नता को समाप्त करने के लिए दो अलग हो चुकी भाषाओं को एक स्वरूप देते हुए इसका नामाकरण हिन्दुस्तानी के रूप में किया मगर गाँधीजी का प्रयास दिलों के अन्दर घर कर चुकी नफरत को समाप्त करने में असफल रहा। गाँधीजी का भाषाई एकता का प्रयास निरन्तर कमजोर होता गया और जिस भाषाई एकता की बुनियाद पर अंग्रेज विरोध के महल की स्थापना का स्वप्न देखा गया था उसकी बुनियाद ही अंग्रेजो द्वारा कमजोर कर दी गयी।

स्वतंत्र भारत के संविधान में हिन्दी और उर्दू को अलग-अलग भाशा के रूप में स्थापित किया जा चुका है मगर इसके बावजूद इन भाषाओँ का भाषाई रिश्ता समाप्त नहीं हो जाता है क्योंकि हम कह सकते है कि ऐतिहासिक भाषाई प्रतिबिम्ब में दोनों भाषाओँ का इतिहास और सा्रेत एक ही है। अपने तमाम विरोधी अस्थिरताओं के बावजूद हिन्दी और उर्दू का भाषाई सम्बन्ध स्थिर बना हुआ है। यह सम्बन्ध यह सन्देश भी अग्रसारित करता है कि भाषाई पहचान को धार्मिक पहचान के अन्तर्गत नहीं आना चाहिए। यह सम्बन्ध हमें इस प्रश्न पर बार-बार विचार करने की प्रेरणा भी देता है कि धार्मिक अस्मिताएँ, भाषाई अस्मिता के साथ ही पहचानी जायेगी या इसका एक अलग अस्तित्व भी तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद स्थापित रहेगा और भाषा -ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति की पहचान के रूप में स्थापित रहेगी। ©

खान मनजीत भावड़िया मजीद
सोनीपत (हरियाणा)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।