अमावश का अंधियारा

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रामलाल और गोपाल ने एक दूसरे के गिलास को शाही अंदाज में टकराया और उक ही सांस में खाली कर दिया
‘‘साली बहुत कड़वी है…….देशी है न ….’’ कहते हुए वह हंसा ।
अब हमारे पास चखना तो है नहीं…..ये लो जामुन की पत्ती को ही चबा लो…..मैंने इसे तोड़कर रखा है……..ससुरी देशी शराब से तो कम कड़वी लगेगीं ’’
अब हंसने की बारी गोपाल की थी ।
‘‘अपनी दीवाली तो सेठ ने बरबाद कर ही दी है……’’ रामलाल कुछ बड़बड़ाया । गोपाल समझ गया कि रामलाल गाली ही दे रहा होगा ।
‘‘चलो इतना नशा तो कर ही लेते हैं कि अपन को पता ही न चले कि आज दीवाली है ’’
‘‘हाॅ यार नशे में रहेंगें तो कम से कम घर में बच्चों के उदास चेहरे तो नहीं देख पायेगें…वे बेचारे तो सुबह से हमारे लौट आने की राह देख रहे हैं…….और सुनीता …….ओह…’’ । रामलाल की आंखों से आंसू बह निकले । उसने एक झटके में अपने गिलास को गटक लिया । गोपाल नेे जामुन के पत्ते उसकी ओर बढ़ाये ‘‘वैसे तो इस जिन्दगी से ज्यादा कड़वी ये दारू भी नहीं है…जब हम उसे रोज घूंट’घूंट कर पी लेते हैं बगैर चखने के तो ये देशी दारू तो मीठी ही लगती है…’’ । वह रूखी हंसी हंसा और अपने गालों पर उमड़ आये आंसूओं को पौंछ लिया ।
‘‘मैया लक्ष्मी हमें तो माफ कर देना हम न तो आपकी पूजन कर पा रहे हैं और न ही घर में दीपक रख पा रहे हैं ’’ ।
‘‘और कर भी लेते पूजन हर साल तो करते ही हैं फिर हमें तो आप कुछ देती हीं नहीं सारा कुछ तो ये सेठ लोगों के पास ही पहुंच जाता है, गजब का न्याय है प्रभो…..’’ । गोपाल ने आसमान की ओर देखते हुए हाथ जोड़ लिये ।
‘‘अरे रात हो गई……चलो एक बार और सेठ जी से विनती कर लें कि वो हमें हमारी मजूदरी दे दें तो हमारे घर भी मिट्टी के तेल का दिया तो जल ही जाये……’’
‘‘नहीं….रहने दो…..उनका दरबान हमें लाठी मार कर भगा देगा…….तुम तो एक पेग और बनाओ….’’
दोनों शराब के घूंट पीते और सेठ के बड़े से मकान की ओर टकटकी लगाये देखते रहे ।
बड़े सेठ का मकान बहुत सुन्दर है । बाहर से बहुत अच्छी लगती है उतनी ही अच्छी अंदर भी है । काले शाीशे वाली खिड़कियां हैं । तीन मंजिलें बनीं हुई है । दर्जनों कमरे हैं । नक्काशीदार दरवाजे हैं । दीवालों पर महंगा डिस्टेम्पर पुता है । अभी अभी उसकी पुताई हुई है इसलिये वह और भी खूबसूरत लग रहा है । उसने और गोपाल ने ही तो पोता है । इतनी उंची दीवारों पर वह रस्सी की नसेनी से चढ़ पाया था । ऊपर चढ़ने में हाथ-पांव कांपते थे पर उसने हिम्मत नहीं हारी । वह डरता रहता पर काम भी करता रहता । काम तो करना ही पड़ेगा न । न करेेगा तो पैसा कैसे आयेगा । उसके भी तो छोटे-छोटे बच्चे हैं पत्नी है । रामलाल ने गहरी सांस ली उसने पास में बैठे गोपाल को गहरी निगाह से देखा । गोपाल भी सेठ जी के मकान को ही देख रहा था । दोनों सेठ जी के मकान के सामने लगे जामुन के पेड़ की छांव में बैठे थे ।
आज दीपावली है । सेठ के घर पूजन हो रही है रात को भी पूजन होगी । सेठ जी ने बोला था कि वे पूजन करने के बाद ही उसे मजदूरी देंगें । एक महिने तक दोनों ने सेठ के मकान की पुताई की है । रोज सुबह जल्दी आ जाते और देर शाम तक पुताई करते रहते । दोपहर में वे घर से लाई रोटियां खाते और फिर काम पर जुट जाते । सेठ जी भी लगभग उसी समय खाना खाने दुकान से घर आते । वे बड़े गौर से पुताई देखते ‘‘क्यों रे ! ये देख ऐसे पुताई होती है यहां तो पुताई हुई नजर ही नहीं आ रही है’’ । वे गुस्सा हो जाते
‘‘नहीं मालिक हमने तो उसे पोता है अभी गीला होगा इसलिये साफ नजर नहीं आ रहा है जरा सूख जाने दो फिर बहुत अच्छा दिखेगा…’’
‘‘मुझे चरा रहा है……तुम लोग साले काम चोर हो इसलिये गरीब के गरीब ही बने रहते हो…..’’ सेठ जी की नाक लाल हो जाती । वे अपने कमरे में चले जाते । गोपाल अपना खाला छोड़कर फिर से उस स्थान पर बुर्स मारने लगता । सेठ जी के कमरे से खाने की खुशबू बाहर आने लगती । वे दोनों सेठ क्या खा रहे होगें की कल्पना में डूब जाते । सेठानी उन्हें खाना की खुशबू संूघते देख अपनी नाक चढ़ा लेतीं ‘‘यहां क्यों बेठे हो जाओ…..काम करो……’’ वे उन्हें झिड़क देतीं । वे चुपचाप उठते और काम पर लग जाते ।
सेठ जी के हर एक कमरे में ढेर सारा सामान रखा होता । दोनों मिलकर सामान को बाहर निकालते । आधा दिन तो इसी में लग जाता । सारे समय सेठानी उनके सामने रही आतीं । वे एक एक सामान को देखतीं और शक भरी निगाहों से उन्हें भी देखती रहतीं । कमरे का सारा सामान निकालने के बाद वे झाड़ू लगाते और साफ-सफाई करने के बाद पुताई करते । पुताई करने के बाद फिर से सारे सामान को वैसे ही जमाना पड़ता । गोपाल और रामलाल सेठानी से बहुत भय खाते । वैसे तो उन्हें सेठ जी से भी बहुत भय लगता था । वे दिन भर सिर नीचा किए काम करते रहते । वैसे भी पुताई के मामले में उनकी जोड़ी विख्यात थी । कई लोग उनसे से पुताई कराने के लिये सम्पर्क भी करते पर वे सेठ जी के यहां पुताई करना पसंद करते । वैसे तो उन्हें यह लालच तो होता ही कि सेठ जी इतने बड़े सेठ हैं, दर्जनों नौकर-चाकर हैं तो वे उन्हें ज्यादा मजदूरी देगें और हो सकता है कि कभी इनाम भी दे दें । पर जब वे वहां काम शुरू करते तो उन्हें एक-एक दिन काटना कठिन जान पड़ता । सेठ जी और सेठानी जी का व्यवहार बहुत ही परेशान करने वाला होता ।
वैसे तो गोपाल और रामलाल सेठ जी से बीच काम में भी पैसे मांगते पर उन्होने नहीं दिए
‘‘ऐसे फुटकर पैसे नहीं देगें…….जब काम खत्म हो जायेगा तब पूरा पेमेन्ट दे देगें’’ कह कर सेठ जी उन्हें टाल देते । वे ठहरे मजदूर उन्हें तो रोज कमाना और रोज ही खाना होता है । पैसे नहीं तो खाना नहीं । उनके घर चूल्हा नहीं जल पाता । महिने भर से सेठ जी ने फूटी कौड़ी नहीं दी तो उन्हें कई कई दिनों तक भूखा रहना पड़ा । बच्चों को तो कैसे भी कर के खिला देते पर उनके पेट में दाना नहीं जाता ं किराना दुकान से थोड़ा बहुत आटा उधार ले आते और उसकी ही रोटी बनाकर सूखी ही खा लेते । पर उन्हें उम्मीद यह थी कि उनकी यह परेशानी सेठ जी जब पूरी मजूरी देगें तो खत्म हो जायेगी ।
‘‘देखो सुनीता इस बार सेठ जी के यहां से अच्छी मजूरी मिलेगी…….दीवाली पर बच्चों को तो कपड़े दिला ही देगें तुम भी एकाध साड़ी ले लेना….’’ वे उत्साह में भर कर अपनी पत्नी से कहते ।
‘‘अरे मजूरी आने तो दो फिर देखते हैं…’’ ।
सुनीता के मन में कोई उत्साह दिखाई नहीं देता । सुनीता सालों से रामलाल के साथ रह रहीं है ।
वह अच्छे से जानती है कि कितने पैसे आयेगें और उससे ज्यादा खर्चा है । वह एक ही साड़ी में दिन नहीं महिना काट लेती । रामलाल खुद फटी बनियान पहिने रहता । बच्चे सरकारी स्कूल जाते थे तो उक जोड़ी ड्रेस उन्हें स्कूल से ही मिल जाती थी । वे भी साल भर उसी से काम चला लेते । कभी कभार रामलाल को किसी के घर से पुराने कपड़े या जूता चप्पल मिल जाते तो वो उन्हें लाकर बच्चों को दे देता । रामलाल की घर-गृहस्थी की गाड़ी ऐसे ही चल रही थी । पर इसके बाद भी प्रसन्न रहते ।
दीपक और आरती आज सुबह से ही अपने पिताजी की राह देख रहे थे । उनके पिताजी ने बोला था कि दीपावली के दिन उन्हें मजूरी मिल जायेगी तो वो उन्हें लेकर बाजार जायेंगे और नये कपड़े दिलायेगें साथ में पटाखे भी दिलवायेगें, रात को लक्ष्मी मैया की पूजन करेगें उन्हें मिठाई को भोग लगायेगें तो मिठाई तो सभी को मिलेगी । दोनों को उत्सुकता थी । वैसे भी उन्हें कपड़े के नाम पर केवल स्कूल की ड्रेस ही मिलती थी । पिताजी ने तो कभी नये कपड़े दिलाये ही नहीं थे । कहीं आने जाने में भी वे स्कूल की ड्रेस ही पहनकर जाते थे और पटाखे तो उन्होने कभी जलाये ही नहीं थे । एक बार माॅ एक फुलझड़ी का पैकेट कहीं से लाई थी उसमें दो फुलझड़ियां थीं जिन्हें उन्होने जलाया था । उनकी बिखरती रंगीन रोशनी को वे देखते रहे थे बहुत देर तक आज भी उनके सामने वो फुलझड़ी की रंगीन रोशनी दिखाई दे जाती है । वे दीपावली पर बड़े सेठ के मकान के सामने दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ कर बैठ जाते और उनके घर के बाहर फोड़े जाने वाले पटाखों को देखकर आंनदित हो जाते । वे आसमान में जाने वाले राकेट को तब तक देखते रहते जब तक कि वह बुझकर नीचे नहीं गिर जाता । वे तेज आवाज वाले बम्बों को फोड़ते देखते तो अपने कानों में हाथ रखकर पेड़ की ओट में छिप जाते । बड़े सेठ के घर देर रात तक पटाखे फोड़े जाते और दोनों बच्चे आंखों में नींद लिये बगेैर देखते रहते । बाद में वे जले हुए पटाखों के कचरे को इकट्ठा कर घर ले आते । उस कचरे में एकाध भी बगैर फूटा पटाखा मिल जाता तो वे खुशी से उछल पड़ते । उसे वे सहेज कर रखते और देवउठनी ग्यारस तक इंतजार करते ।
रामलाल और सुनीता अपने बच्चों की हसरत भरी निगाहों को पढ़ते तो अवश्य पर वे कुछ कर नहीं पाते थे । उनके पास तो घर में दीपक जलाने को तेल तक नहीं होता था । दीपावली के दिन वे अपने घर की कच्ची दीवाल पर पुराने लक्ष्मीजी की फोटो पर चमेली के फूल चढ़ाते और हाथ जोड़ लेते ‘‘हे लक्ष्मी मैया कभी हम पर कृपा कर दोगी तो हम भी दीपक जलाकर आपको भोग लगायेगें’’ । सुनीता तो बहुत देर तक जाने क्या-क्या बुदबुदाती रहती । रामलाल उसे निनिर्मेष निगाहों से देखता रहता । वह जानता था कि सुनीता क्या सोच रही होगी पर कितनी भी मेहनत करने के बाद भी वह इतना कमा ही नहीं पाता था कि कभी लक्ष्मी जी की पूजन भी अच्छे से कर ले और बच्चों को भी पटाखे बगैरह दिला दे । रामलाल को यह पीड़ा हर दम रहती । वो सुनीता को प्रार्थना करते देखता और यह भी देखता की उसकी आंखों से अविरल आंसू बह रहे हैं । वह बच्चों को देखता जो पूजा खत्म हो जाने की प्रतीक्षा इसलिए कर रहे होते कि वे भागकर बड़े सेठ के मकान के सामने के पेड़ के नीचे बैठ जायें ताकि जब वे पटाखे चलायें तो वे उन्हें देखकर संतुष्ट हो लें । लक्ष्मी जी ने उस पर कभी कृपा नहीं की ‘‘अब अपन पूजन ही ढंग से नहीं कर पायें तो लक्ष्मी जी कैसे प्रसन्न होंगीं’’ सोचकर वह संतुष्ट हो जाता । देर रात तक गूंजने वाली पटाखों की आवाज के बीच उनका परिवार गहरी नींद में सो जाता ।
सेठ ने पिछले साल भी उससे पुताई कराई थी । पर उस साल काम करते समय उसके हाथ से उनका कीमती कांच के फ्रेम वाली फोटो टूट गई थी जिसके एवज में सेठ ने उनकी मजदूरी काट ली थी । वह बहुत गिड़गिड़ाया था उनके सामने तो उन्होने कुछ रूपये उसे दे दिये थे जिनसे वह खाने का सामान घर ले गया था । वैसे तो वह इस साल सेठ के घर पुताई करना ही नहीं चाह रहा था पर उसे कहीं काम नहीं मिला तो मजबूरन उसे सेठ के सामने हाथ जोड़कर खड़ा होना पड़ा । सेठ ने उसे पुताई करने की जिम्मेदारी दे दी । इस साल उसने बहुत सावधानी से पुताई का काम किया था । उसे भरोसा था कि सेठ प्रसन्न हो जायेगें और न केवल उसे निर्धारित मजदूरी मिल जायेगी बल्कि सेठ कुछ न कुछ इनाम भी देगें । इसी भरोसे पर उसने अपने बच्चों को बोल दिया था कि वो इस साल दीपावली पर उन्हें नये कपड़े भी दिलायेगा और पटाखे भी । दोनों बच्चे इसी की राह देख रहे थे । सुबह जल्दी नहा-धोकर वो तैयार होकर बैठ गए थे और यह भी सोच लिया था कि वे बाजार से क्या-क्या खरीद कर लाने वाले हैं । रामलाल की प्रतीक्षा तो सुनीता भी कर रही थी । दो दिन से घर में दाना नहीं था । बच्चों को तो कैसे भी खिला दिया था पर स्वंय भूखी थी । आज तो उसने रामलाल को भी रोटी नहीं रखी थी । घर में पैसा आ जाये तो बाजार से आटा लाकर तुरंत रोटियां बना दूंगी सोचकर वह चूल्हें पर आग सिलगाये बैठी रामलाल की प्रतीक्षा कर रही थी ।
रामलाल और गोपाल ने आखरी पेग भी बना लिया था । दोनों को समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें । सेठ ने पैसे दिए नहीं थे और घर में सुनीता और बच्चे इंतजार कर रहे होगें । सुनीता भूखी बैठी होगी । वह जानता था कि आज तो घर में कुछ भी नहीं है इसलिये ही तो उसे भी रोटी बांध कर नहीं दी थी । वैसे भी वह सुनीता को बोला था कि ‘‘सेठ जी दोपहर में ही पैसे दे देगें और आज कोई काम भी नहीं है इसलिये वह तुरंत घर आ जायेगा साथ में आटा भी ले आयेगा तभी दोनों कुछ खा लेगें’’ । पर सेठ ने पैसे नहीं दिए । रामलाल की आंखों से आंसू बह निकले । आज त्यौहार के दिन सुनीता भूखी बैठी होगी । उसे अपने भूखे होने की चिन्ता नहीं थी ‘‘घर की औरत ही तो लक्ष्मी होती है जब मेरी पत्नी ही भूखी है तो लक्ष्मी जी कैसे प्रसन्न होगीं’’
व्ह बिलख पड़ा ‘‘गोपाल सेठ जी ने सारे नौकर चाकरों को पैसा दिए थे हमें भी दे देते….देखो हमने तो उनका घर चमका दिया है…….’’
‘‘हां यार……मुझे तो उनकी नियत ठीक नहीं लग रही…….’’
‘‘पर हम तो अपनी मेहनत का पैसा ही तो मांग रहे हैं……हमने तो कोई नुकसान भी नहीं किया, उल्टे उनके कई सारे काम जो हमें नहीं करने थे वो भी किए…..तो पैसा तो वे देगें ही……’’
‘‘चलो……एक बार और कोशिश करते हैं…….’’
छोनों ने हिम्तम जुटाई और सेठ के मकान के सामने आ खड़े हुए । गेट पर बंदूक हाथ में लिये दरबान खड़ा था जो उन्हें जानता था
‘‘भैयाजी…….हमें सेठ जी से मजूरी नहीं मिली है तनक उनसे मिलवा दो….’’
‘‘नहंीं वो पूजन कर रहे हैं और बहुत सारे मेहमान भी हैं………..वे आज तो तुम से नहीं मिल पायेगें………तुम लोग कल ही आना…….’’
दरबान को उन पर दया आ रही थी पर वो भी मजबूर था । सेठ जी ने किसी को भी अंदर न आने की सख्त सलाह उसे दे दी थी ।
‘‘भैयाजी……आप तो जानते ही हो हमने कितनी मेहनत कर के सेठ जी के घर की पुताई की है…..पर
सेठ जी ने हमारी मजूरी नहीं दी है कह रहे थे शाम को देगें………..हमारे बच्चे हमारी राह देख रहे होगेें……….जरा आप……..सेठ जी से कह दो तो हमें मजूरी मिल जाये…….तो हम भी घर चले जायें’’
‘‘वो अब नहीं मिलगें……….भाई……मैं सेठ जी को जानता हूॅ उनके शाम का मतलब कुछ और ही होता है………तुम कल आना…….हो सकता है सेठ जी पैसे दे दें’’ ।
दरबान भी असहज हो रहा था । वह शायद उनकी परेशानी को समझ रहा था ।
‘‘मेरी पत्नी भूखी बैठी है……मैंने भी सुबह से कुछ नहीं खाया है…….पैसे की बहुत जरूरत है भाई हम पर कृपा कर दो……तुम्हारा अहसान हम कभी नहीं भूलेगें….’’
रामलाल के आंखों से आंसू बह रहे थे वो अपने हाथ जोड़े दरबान के सामने खड़ा था । दरबान को उन पर दया रही थी ।
‘‘अच्छा मैं अंदर जाकर सेठ जी से पूछता हूॅ….’’ ।
अंदर जाते समय दरबान के हाथपांव कांप रहे थे । वो जानता था कि सेठ जी बहुत नाराज होगें पर उससे रामलाल और गोपाल का रोना देखा नहीं जा रहा था । आज त्यौहार के दिन उसके बच्चे भूखे हैं यह सुनकर उसकी आंखों से भी आंसू बह निकले थे । उसने हिम्मत कर अंदर प्रवेश किया । सेठ जी गेट की ओर ही आते दिखाई दिए उनके साथ कुछ मेहमान भी थे । उनके पीछे नौकर बड़ा सा टोकरा लेकर आ रहा था । दरबान समझ गया कि सेठ जी की पूजन समाप्त हो गई है अब वे पटाखे फोड़ने गेट से बाहर आयेगें ही ।
सेठ जी ने नाराजी भरी नजरों से दरबान को देखा पर कुछ नहीं बोले । दरबान उनके बिल्कुल पास आ गया था । उसने यथा संभव धीमी आवाज में सेठ जी को रामलाल और गोपाल के बाहर खड़ें होने और उनकी मजूरी की बात सेठ से की । सेठ आगबबूला हो चुके थे । वे गुस्से से तेज-तेज कदमों से चलते गेट के बाहर आ गये । रामलाल और गोपाल पर नजर पड़ते ही उनका गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा । उन्होने दरबान के हाथ से डंडा छीन लिया था और वह डंडा अब दोनों पर बरस रहा था । कुछ ही देर में दोनों लहुलुहाल हो चुके थे ।
रामलाल के दोनों बच्चे निराश हो चुके थे । उनकी आंखों में आंसू थे । सुनीता भी उदास चेहरा लिये घर की दहलीज पर बैठी थी । उसके मन में कई किस्म की शंका-कुशंकायें जन्म ले रहीं थीं । रामलाल कभी भी इतना लेट नहीं होता और आज तो जल्दी आने का बोल गया था फिर अभी तक आये क्यों नहीं । आरती और दीपक बड़े सेठ के मकान की ओर चल दिये । कम से कम वहां फूटने वाले फटकों को देखकर मन बहला लें । सेठ के नौकरों ने रामलाल और गोपाल को लहुलुहान हालत में वहीं जामुन के पेड़ के नीचे फेंक दिया था । उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे । वे कराहते हुए एक दूसरे का हाथ पकड़ कर उठने का प्रयास कर रहे थे तभी आरती और दीपक वहां पहुंचते हैं । जामुन के पेड़ के नीचे जैसे ही उनकी नजर अपने पिता के लहुलुहान शरीर पर पड़ती है वे चीख पड़ते हैं । तभी एक राकेट आकर आरती के ठीक बाजू में आकर गिरता है वह अपने पिता से लिपट जाती है ।

कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
नरसिंहपुर म.प्र.

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Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।