दीपावली पर पटाखें भारत की परम्परा नहीं मुगलों की देन है

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भारतीय संस्कृति उत्सव प्रधान है और उत्सव की प्राचीन परंपरा उल्लास और उच्चता से जुड़ी हुई है, जब जीवन में उल्लास हो और तन और मन की उच्चता हो वह समय उत्सव है। दीपोत्सव की परंपरा अनादि काल से भारतीय संस्कृति की अक्षुण्ण पहचान है, वैदिक काल हो या उत्तर वैदिक काल हो दीपावली के साथ कोई न कोई प्रसंग और सामाजिक या धार्मिक परम्परा जुड़ी हुई है। काल प्रवाह में इस परंपरा में कई नई व्यवस्थाएं और परंपराएं सम्मिलित हुई है।

वैदिक वांग्मय में दीपोत्सव मनाने के लिए केवल घी के दीये जलाए जाने का उल्लेख है। और विशेष प्रायोजन से खाद्य तेल के दीए जलाने का उल्लेख मिलता है। वर्तमान आधुनिक युग में कृत्रिम विद्युत और मोमबत्ती तक यह परंपरा आ चुकी है। यहॉ तक तो ठीक है। लेकिन प्राचीन परम्परागत संस्कृति में पटाखों का प्रवेश एक विकृति है।

दीपावली पर पटाखों के उपयोग के प्रमाण मुगलकाल से मिलते है। मुगलकाल से पहले भारत में पटाखों का उपयोग नहीं होता था। केवल बारुद का उपयोग वन्य पशुओं को भगाने के लिए किया जाता था। लेकिन जब मुगल साम्राज्य भारत में स्थापित हुआ तो मिट्टी के पात्र और कागज में लपेट कर पटाखों की शुरुआत भारत में हुई। मुगल अपने यहॉ विवाह आदि अवसरों पर धमाकों के लिए बारुद का उपयोग करते थे और उत्सव मनाते थे। चूंकि उस काल में मुगल ही भारत के शासक थे तो यथा राजा तथा प्रजा के अनुसार भारत के मुगल आश्रित सेवकों ने उनका अनुसरण करना प्रारंभ किया। चूंकि दीपावली भारत का सबसे प्रमुख त्योहार माना जाता है तो इस त्योहार पर उल्लास प्रकट करने के लिए मुगल काल में पटाखों से धमाके करने की परम्परा शुरू हुई । जिसका शनै-शनै भारत की जनता ने भी अनुसरण किया और यह एक परंपरा सी बन गई।

प्राचीन काल में जन संख्या का घनत्व कम था और पर्यावरण प्रदूषण बिलकुल भी नहीं था जिसके कारण बारुद से हुआ वायु और ध्वनि प्रदूषण कुछ समय में समाप्त हो जाता था। लेकिन वर्तमान समय में प्रदूषण चरम पर है और आज तो कोरोना के भयावाह प्रभाव से सारा विश्व परेशान है। आज जब सांस संबंधी रोगों से बचाव के लिए सरकार बार-बार जनता से अनुरोध कर रही है। और हम खुद भी पिछले 8-10 महिनों से यह महसूस कर रहे है कि कोरोना का सबसे ज्यादा प्रभाव स्वसन तंत्र पर हो रहा है, ऐसे में केमिकल से बने पटाखें से निकलने वाला धुंआ और कोरोना के लिए आग में घी डालने जैसा है।

प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये के पटाखें जलाए जाते है जो की व्यवहारिक रूप से धन में आग लगाने जैसा है। कुछ लोगों का तर्क है कि पटाखें खुशी प्रकट करने का माध्यम है तो वे यह जाने कि पटाखों की पहली फेक्ट्री शिवकाशी में सन 1940 में लगी थी। इससे पहले भारत में पटाखे नहीं बनते थे। तो क्या इससे पहले लोग खुशी व्यक्त नहीं करते थे? इसके पहले उत्सव नहीं मनाए जाते थे? पटाखों के कारण समाज या देश को कोई बड़ा लाभ होता है, ऐसा भी नहीं है। आज के समय में जब जीवन और स्वस्थ्य से संघर्ष कर व्यक्ति धन कमा रहा है। उस धन को आग लगाना किसी मूर्खता से कम नहीं है। हमें चाहिए कि जनहित और स्वहित दोनों को दृष्टिगत रखते हुए पटाखों का उपयोग स्वेच्छा से हम नहीं करे। दीपावली दीप जलाकर मनाएँ स्वयं सुरक्षित रखें परिवार और समाज को भी सुरक्षित रखें।

संदीप सृजन
उज्जैन

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।