दुर्गा रूपी नारी

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बहुत हो गया धैर्य साहब
शस्त्र उठाने आई हूँ।
नारी की चित्कार नहीं
हुँकार सुनाने आई हूँ।।

१) कभी गार्गी कभी अपाला
कभी विदुषी बन आई हूँ।
नारी को तू हाथ लगाये
झाँसी की तलवार मैं लाई हूँ।।

२) कभी लक्ष्मी कभी सरस्वती
कभी दुर्गा बन आई हूँ।
नंगा नाच दिखाये जब तू
रणचण्डी बन मैं आई हूँ।।

३) नारी का सम्मान करे जब
सावित्री बन आई हूँ।
जिस्म नोचकर जब तू खाये
काली का खप्पर लाई हूँ।।

४) कौशल्या का सम्मान करे तो
राम रूप में जाई हूँ।
गर बू जो काम दाम की आवे
*सीमा को जग में लाई हूँ।।

५) एक चीख भी अगर सुनी तो
तुम न बचने पाओगे।
इस बार अकेली एक नहीं
मैं सौ दुर्गा को लाई हूँ।
मैं सौ दुर्गा को लाई हूँ।।

नोट-सीमा(इण्डियन कमाण्डो ट्रेनर)

आयुषी अग्रवाल (स०अ०)
कम्पोजि़ट विद्यालय शेखूपुर खास
वि० क्षे०- कुन्दरकी(मुरादाबाद)
पता- रामलीला मैदान के सामने, कुन्दरकी

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Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।