बिहार के लिए व्यक्ति नहीं, संपूर्ण विचार थे पूर्व मुख्यमंत्री स्व• डा•जगन्नाथ मिश्र।

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24 जून 1937 जन्म
19 अगस्त 2019 मृत्यु

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्ण केन्द्रीय मंत्री स्व•डा•जगन्नाथ मिश्र राज्य के लिए एक राजनीतिक अभिवाहक, एक विचारक एक चिंतक जिन्हें सारी विषयों समस्याओ पर मजबूत पकड़ थी,स्वंय में एक आदर्श विचार थे।उनका आज हम सब के बीच न होना एक रिक्तयां पैदा करता है।वह राजनीतिक गलियारे में भी वैसे ही थे जैसे एक आम लोगो में, वे शख्सियत ही ऐसे थे जो सभी के दिलों में बसते थे।वे जीवन पर्यन्त सभी को राह दिखाते रहे।बिहार के दिग्गज नेताओं ने कई बार इसे सार्वजनिक मंचो से स्वीकार भी किया है। वे स्वभाव के धनी और मिलनसार व्यक्ति थे।वे जीवन पर्यन्त जन-कल्याण के लिए समर्पित रहे।यही कारण है कि उनके घोर विरोधी भी उनका नाम लेते थे और इज्जत करते थे। इन्हें भारत के सर्वश्रेष्ठ बुद्धिजीवी में से एक माना जाता रहा। अपने सभी कार्य-कर्ताओं को उम्र के अंतिम पड़ाव तक बतौर नाम से जानते और पहचानते रहे जो इनकी याददाश्त लेवल को दर्शाता है। इनके बारे में लोग यही कहते है जिनसे एक बार मिल लेते थे उसे वे वर्षो बाद भी नाम के साथ पहचान लेते थे।जो उनकी शख्सियत को बढ़ाता चला गया।

इन्होंने कुल 5 बार लगातार ( 1972, 1977, 1980, 1985, 1990 ) मधुबनी के झंझारपुर विधानसभा से चुनाव जीता और तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री बने 75 -77, 80-83, 89-90, तक।

उन्होंने बिहार के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए विशेषकर शिक्षा के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदानो को चाहकर भी नही भुलाया जा सकता।संस्कृत स्कूल मदरसा,स्कूलो और कालेजो का सरकारी करण उनके मुख्यमंत्रीत्व काल में बड़े पैमाने पर हुए जो आज भी शिक्षा के मूल आधार है।शिक्षको की नियुक्ति और वेतनमान का ग्रेड भी उन्ही के द्वारा दी गयी शिक्षकों को भी कलेक्टर के दर्जे का तनख्वाह तक पहुंचाया।जिसके कारण उस समय की शिक्षा आज की शिक्षा से बेहतर मानी जाती है।उर्दू को द्वितीय राजभाषा में शामिल करना ।उर्दू शिक्षकों टायपिस्टो की नियुक्ति करना उनकी दूरगामी सोच और समरसता पूर्ण व्यवहार को दर्शाता है।वे जाति की नही वरन पूरे समाज के लिए कार्य करते थे।ऐसे महानविभूषित का इस कोरोना काल में न होना एक शून्य पैदा कर रहा है।सम्पूर्ण बिहार को वे अपने लेखो प्रलेखो चिठ्ठीयो और विज्ञप्तियों के जरिये सदा संदेश देते रहे।उनके विचारो से राज्य के सभी दल लाभान्वित होते रहे थे।सभी के प्रति उनका स्नेह मन भावन था और सभी उनको अभिवाहक की तरह मानते थे।कभी भी इन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नही किया।

उन्होंने अपने जीवन काल में बहुत सी किताबें भी लिखी जो बिहार की विभिन्न समस्याएँ, अर्थशास्त्र की कई शोध पत्र और बिहार की उत्थान से जुड़ी हुई है।उन्हें लिखने और पढ़ने में बड़ी रूचि थी।जीवन के अंतिमकाल में भी वे प्रेस विज्ञप्ति देते रहे।ऐसे महान विचारक का आज न होना बिहार की राजनीति के लिए अपूरनीय क्षति मानी जा रही है।

आशुतोष झा

पटना बिहार

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।