सूने पड़े है मंदिर मस्जिद,चमक रही है मधुशाला

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नमंदिर मस्जिद है बैर कराये
मेल मिलाती है मधुशाला |
मंदिर मस्जिद अब बंद पड़े है ,
चमक रही है अब मधुशाला ||

सूने पड़े है मंदिर मस्जिद ,
जमघट है अब मधुशाला मे |
कैसा घोर ये कलयुग आया ,
मस्ती ले रहे है मधुशाला मे ||

खुलते ही मधुशाला को
भीड़ लगी है मधुशाला मे |
बच्चे भूख से तड़फ रहे है
मजदूर पड़ा है मधुशाला मे ||

होता नहीं जब काम तुम्हारा ,
उसको बुलाओ मधुशाला मे |
काम तुम्हारा तुरंत होगा ,
जब पिलाओगे मधुशाला मे ||

जीवन के इस कोलाहल मे ,
प्यास बुझाती है मधुशाला |
पुरानी बाते याद आ जाती है ,
जब पहुच जाते मधुशाला ||

करते है मंदिर मस्जिद का बटवारा
नहीं करते बटवारा मधुशाला का |
मिल कर पी लेते है एक गिलास मे ,
कैसा सच्चा मजहब पीने वालो का ||

म से मंदिर म से मस्जिद ,
म से बनी है मधुशाला |
म से बनी जब तीनों चीजे ,
क्यो बदनाम है मधुशाला ||

आर के रस्तोगी

गुरुग्राम

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।