फल खाये शजर : विजय तिवारी

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पुस्तक समीक्षा

हिन्दी साहित्य मे गजल कार के रूप मे प्रसिद्ध साहित्यकार ,पूर्व शिक्षक ,हिन्दी साहित्य परिषद की ओर से जिनहे सर्व श्रेस्ठ काव्य के लिए 1992 मे गुजरात के तत्कालीन राज्य पाल महामहिम डॉ स्वरूप सिंह के कर कमलों से प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया हे,तथा श्रेस्ठ काव्य के लिए 1993 मे राज सभा की सदश्य श्रीमति उर्मिला बहन पटेल द्वारा पुरस्कार पदक प्राप्त किया हे एसे अहमदाबाद के श्री विजय त्रिवेदी की पुस्तक “ फल खाए शजर “ हिन्दी गजल संग्रह की समीक्षा लिखने का सु अवसर हमे प्राप्त हुआ हे,हम गौरवन्वित हे ।
फल खाए शजर काव्य संग्रह मे माँ शारदा से शक्ति और भक्ति की मांग कवि विजय ने प्रथम गजल मे किया गया हे।
“ आस छोडू न कभी हे माँ मुझे वो शक्ति दे,
ज्योति तम को बदल दू मुझ मे एसी भक्ति दे “
दूसरी गजल मे बताया गया हे की इंसान आज विवश हे,आज हर इंसान खुशामत मे लगा हे,किन्तु जब बगावत होगी तब पस्ताना होगा। आंधीयों मे भी प्रकाशित होकर सीना तान कर हमेशा लड़ते रहने की बात कवि ने इस गजल मे की हे। ये न समझो कवि कलम ही चला सकता हे,शमशीर भी उठा सकते हे। विजय तिवारी की हर गजल मे एक नया संदेश छिपा हुआ हे। कवि की कलम पानी मे आग लगा दे एसी हे। गरीबो का धन लुंटकर मंदिर मस्जिद मे दान करने वाले लोगो पर कवि ने व्यंग किया हे। गजल आगे बताती हे की बेगुनाह को कत्ल होते हुए देखा हे,और मुजरिम को फरार होते हुए भी पाये हे,
‘बे गुनाहो का कत्ल देखा हे,
और मुजरिम फरार पाए हे।‘
‘शेर की खाल ओढ़कर अक्सर,
राज करते सियार पाए हे ‘
शेर की खाल ओढ़कर राज करने वाले ‘भेड़िये ‘की बजाय कवि ने ‘ सियार ‘ शब्द रखकर बताया गया हे की एक निर्बल व्यक्ति भी शेर बनकर राज करता हे।
आज के नेता पाखंडी बन गए हे। सीयार का रंग बदल गया हे। कवि बताते हे की धर्म के नाम पर अब सिर्फ मूर्तियो को छपन्न भोग लगाए जा रहे हे,दूसरी ओर गरीब इंसान को खाना भी मुनासिब नहीं होता हे,भूखे पेट सोना पड़ता हे।
‘पुरुषोतम तुम खूब बनो पर मुजकों रास रचने दो
श्याम बनु बस चाह यही हे मुझको बनना राम नहीं ‘
कवि ने श्याम बनकर रास खेलने की इच्छा व्यक्त की हे,राम बनना नहीं चाहते हे। आज हर शख़स स्वार्थ और लालच मे अंधा हो गया हे,। पर्यावरण पर भाषण देने वाला ही रात को जंगल कटा ने आएगा ,एसे मार्मिक कटाक्ष कवि की गजलों मे देखने को मिलता हे।
जो अभी पर्यावरण पर दे गया भाषण यहा ,
देखना वो रात मे जंगल कटाने आएगा ।
कौरवो के साथ गिरधर भी खड़े हे युद्ध मे ,
कौन फिर पांडव को अब केसे बचाने आएगा ।
आज ऎसा लगता हे की कौरवो के साथ गिरधर गोपाल खड़े हे,फिर पांडवो को कौन बचाने आएगा ? आज एसी ही स्थिति बन गई हे,सत्य का साथ देनेवाला कोई नहीं हे,सदगुणो की कमी महसूस हो रही हे। आग लगाने वाला ही दमकल लेकर आग बुझाने आएगा एसी घटना कभी कभी हकीकत मे बनती हे।
आगे चलकर कवि थोड़ा रोमांस मे दिखाई पड़ते हे। आंखे नशीली सी गेसू हे, हे ,ये गुलाब जेसे होठ ,अपनी प्रियतमा की तस्वीर अपने दिल मे बसा कर कहते हे,की अब तुम केसे निकल पाओगी ?
शरमा के कुछ लजा के घूँघट जरा निकालो।
गुजरे जमाने अब वो मासूम लड़कपन के ।
कवि एक नवी नवल दुल्हन को कहते हे की अब तुम मत शर्माओ,आप की शादी हो गई हे,आप के पति के सामने जरा घूँघट हटाकर बात करो,लड़कपन के वो जमाने चले गए हे।
रोको न आज दिल को हो जाय हो जाने दो ,
पीने दो जाम के मदमस्त उस नयन के ‘
इस पंकित मे स्पस्ट होता हे की तुम आज मत रोको मुझे ,आप के होठो से हमे जाम पीने दो,कवि विजय ने अपनी गजलों मे श्रुंगार रस और समाज की आपदाए ,कमियो को अपनी गजलों के माध्यम से उजागर करने का प्रयास किया हे। पाठको को गजले पढ़ने का आनद मिले और गजलों से कुछ नया संदेश प्राप्त करे उसका ध्यान कवि ने रखा हे। कवि विजय को हमने नजदीक से देखा हे,सुना हे,उनमे प्रस्तुति की कला भी भरपूर पड़ी हे। यदि रचना अच्छी हो लेकिन प्रस्तुति सही न हो तो सुंदर रचना अप्रिय लगती हे। तुम मेरी कब्र पर ये विजय तुम कांटे चढ़ाया करो ,ये कब्र का प्रयोग संस्कृति की चेतना को जगाता हे।उनकी गजलों मे उर्दू शब्दो का ज्यादा उपयोग नहीं किया गया हे,अपने देश प्रेम,आस्था ,खुद्दारी ,सामाजिक ,राज नैतिक ,विषमताए यह सभी मुशकेलियों का सामना करके अपना जीवन व्यतीत करना पड़ता हे। व्यक्ति के अंदर और बाहर आज जो संघर्ष चल रहा हे,उसकी अर्जित अंतरंग और आत्मीय अभिव्यक्ति कवि द्वारा इन गजलों मे व्यक्त हुई हे। विजय तिवारी की गजले एक अच्छा सुकून देनेवाली उम्दा गजले हे। इन गजलों मे सबसे बेहतरीन व्यंगतमकता का पक्ष देखने को मिलता हे। आज व्यंग जीवन और साहित्य मे होना जरूरी हे,आज के विसंगत समाज मे होना बहुत जरूरी बन गया हे।
राज नैतिक, धर्म, समाज,परिवार,रिसते,दैनिक व्यवहार सभी मे कुरुपताए फैली हुई हे। उन्हे व्यंग के माध्यम से कवि ने सशक्त अभिव्यक्ति दी हे।,कोई दो राय नहीं हे। आपने आज के समय से जुड़कर आज के समय प्रवाह मे स्थिति –परिस्थिति को व्यंगात्मक लहजे मे हमारे समक्ष बहुखूबी से रखा गया हे।
नदिए न पिये कभी अपना जल,
वृक्ष न ख्ये कभी अपना फल।
आज एसा हो नहीं रहा हे,राज सत्ता मे बैठे हुए वृक्ष रूपी नेता अपने फल खुद ही खा रहे हे,लोगो तक फल पहुचना स्वप्न सा बन गया हे। अपना ही कल्याण करने मे आज के नेता जूटे हुए हे। पेसो की खातिर अपना पक्ष छोड़कर अन्य पक्ष के साथ जुड़ जाते हे।
विजय तुम वो सुखनर हो जो पत्थर दिलको पिगला दे ,इस पंक्ति अपना अर्थ देती हे की पत्थर दिल को भी पिगला दे एसी गजले श्री विजय तिवारी जी ने दी हे। उनकी गजले सुनकर गम मे दुबे हुए इंसान को बड़ा सुखचेन मिले एसी उनकी गजले हे।
सभी कह रहे हे जमाना बुरा हे,
मगर कोई खुद मे नहीं झांखता ।
लोगो से सुनने को मिलता हे की,आज जमाना बहुत बुरा हे,किन्तु किसी भी इंसान ने कभी अपने गलेबान मे याने की खुद मे क्या बुराई हे वो देखने की कभी कोशिश नहीं की हे।
व्यंगात्मक ,प्रगतिशील,उपदेशात्मक ,गजलों के साथ कुछ गजले प्रेम-श्रुंगार से भरी पड़ी हे। एक शेर यहा दष्टांत के रूप मे पेश करता हु।
याद तुम्हारी लाती है,
रात न जाने क्यों आती है?
शाम ढले परछाईं हमसे चुपके चुपके,बतियाती हे,झील लगे जंगल मे जेसे,पाय लिया सी खनकती हे।यहा प्रेम श्रुंगार का अनुभव होता हे। मरू स्थल मे तपने के बाद प्रणय की अमराइयो की छांव मे कवि पाठको को ले जाते हे। मृदु सुकुमार भावना ओ के घांवों पर मलम लगते शेर दिल मे प्यार जताते हे। दिलचस्प और रोमांस की गजले पढ़ने का और विवेचन करने का सुंदर अवसर पाकर हम धन्यता का अनुभव कर रहे हे।
उनकी गजलों मे जीवन की वास्तविकता का सत्य भी दष्टि गोचर होता हे।
दोस्त हमने हजार पाये हे,
ज़ख़म भी बेसुमर पाये हे।‘
कवि ने दोस्त के बारे मे एक अच्छा और बुरा अनुभव इन पंक्ति यों से यक्त करने की कोशिश किया हे। अच्छे दोस्त भी हजारो की संख्या मे पाये हे,अपितु उसमे ज़ख़म देने वाले दोस्त भी बेसुमार पाये हे। अच्छे दोस्तो की गिनती की गई हे वो हजार हे,जब की ज़ख़म देने वाले दोस्तो की संख्या गिनती करना भी मुश्किल हे।
श्री विजय तिवारी निष्ठावान गजल कार हे। और हिन्दी के उपासक हे।गुजरात मे जन्म लेकर गुजराती बन गए हे,जब की उनका वतन उत्तर प्रदेश कानपुर हे। उनकी हिन्दी भाषा के प्रति लगन और वारसा मे मिला हुआ हिन्दी का खजाना उन्हे मंजिल की ओर ले गया हे।
आजकल हिन्दी की गजले तीन स्वरूपो मे रची जाती हे। उर्दू मे संस्कृति निष्ठ तथा प्रचलित सार्वजनिक शब्दावली से संबन्धित हिंदुस्तानी भाषा मे ,तत्सम हिन्दी मे सबसे कम और हिंदुस्तानी मे सबसे अधिक याने की सर्वाधिक गजले लिखी जा रही हे। विजय तिवारी की अधिकांश गजले हिंदुस्तानी मे रचित हे, जिन मे हिन्दी-उर्दू की गंगा –यमुना की छवि उभर आई हे। तथा तथ्य की पारदर्शिता भी बलवित हे। उनकी सृजन धर्मिता और आत्म विश्वास उनकी गजलों मे मुखर हे।
आप क्या चीज हे , मे गीत गजल से अपने चांद सूरज ,ये सितारे को भी नचा सकते हे,हजारो दोस्त तथा बेसुमर ज़ख़म पाने वाले कवि ने बेगुनाहों की कत्ल होते हुए देखा हे,और मुजरिमों को फरार होते हुए भए देखा हे,ये सामाजिक विषम ताए की ओर लोगो का ध्यान केन्द्रित करने के लिए लिखा गया हे,साहित्य समाज का दर्पण हे,और उसमे अच्छाइया तथा बुराइया बाहर निकल आती हे। शेर की खाल ओढ़कर सियार जेसे इंसान राज करते हुए और फूल देने पर भी खार पाते हुए लोगो को कवि ने देखा हे। गजल संग्रह का निसकर्ष ,फल खाए शजर अपने आप मे एक अलग किस्म का शीर्षक हे। उन्हे हार्दिक बधाई और शुभ कामनाए ।
पुस्तक प्राप्ति स्थान :फल खाए शजर ,
कवि विजय तिवारी
प्रथम संस्कारण 1999
द्वितीय संस्कारण 2017
मूल्य :180 रुपए
प्रकाशक : विजय तिवारी
9 माधव पार्क,2 वस्त्राल रोड ,अहमदाबाद -382418
मो 94276 22862
ईमेल:vijaydottiwari1998 @gmaildotcom

समीक्षक :
डॉ गुलाब चंद पटेल

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।