साहित्य जगत के एक प्रकाश स्तंभ : कविश्रेष्ठ शैवाल सत्यार्थी

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प्राचीन इमारतों, किलों, महलों और पर्वत श्रृंखलाओं का शहर ग्वालियर मुझे हमेशा ही प्रभावित करता रहा है। कई बार यहां आने का मौका मिला है। यहां का समृद्ध साहित्यिक वातावरण भी मुझे अपनी ओर खींचता है। मेरे छात्र जीवन के समय से मेरे साथ जुड़े हुए साहित्यिक क्षेत्र के कई मित्र ग्वालियर से हैं।
जब भी इस शहर में आना हुआ प्रियजनों के स्नेह और सम्मान से अभिभूत हुआ हूँ…

पिछली बार अक्टूबर 2018 में ग्वालियर की एक सप्ताह की यात्रा में भी मुलाकातों का ऐसा ही सिलसिला बना रहा पर 29 अक्टूबर की शाम साहित्य मनीषी श्रद्धेय शैवाल सत्यार्थी जी से मुलाकात एक यादगार अनुभव दे गई…

उनके साथ मेरा संबंध काफी पुराना है। करीब तीन दशक पहले मेरी किताबों पर उन्होंने अपनी अभ्युक्ति दी थी। सुंदर कलात्मक अक्षरों में लिखे उनके पत्र आज भी मेरी फाइल में सुरक्षित हैं।

‘और पहिये घूम रहे थे’ (कथा संग्रह) और ‘सप्त सिंधु’ (कविता संग्रह) समेत कई पुस्तकों, संस्मरणों एवं साक्षात्कारों के प्रणेता श्रद्धेय सत्यार्थी जी ने विभिन्न पत्र पत्रिकाओं का संपादन भी किया है।

भारत रत्न अटल सम्मान, हिंदी सेवी सम्मान, महाप्राण निराला सम्मान एवं राष्ट्रीय बोध साहित्य सम्मान से सम्मानित श्रद्धेय सत्यार्थी जी का पूरा जीवन साहित्य की सेवा में समर्पित रहा है।
महामंत्री के रूप में वर्षों से ‘साहित्य साधना संसद’ का संचालन करते हुए 86 वर्ष की अवस्था में वे आज भी विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय हैं।

इस बार मेरे ग्वालियर पहुंचते ही उन्होंने ‘साहित्य साधना संसद’ द्वारा 28 अक्टूबर 2018 को आयोजित होने वाली ‘काव्य गोष्ठी’ के लिए मुझे निमंत्रण दे दिया था परन्तु आगरा के पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के कारण मेरे लिए उस गोष्ठी में शामिल होना संभव न हो सका।

लेकिन उनके इस स्नेह और सम्मान के प्रति मैं किन शब्दों में आभार व्यक्त करूं… जब वापस ग्वालियर लौटा तो उन्होंने एक ‘काव्य गोष्ठी’ अपने आवास पर ही रख दी जिसमें वरिष्ठ साहित्यकार डा. कृष्णमुरारी शर्मा जी, श्री जयंती अग्रवाल जी एवं श्री बी. एल. शर्मा जी भी शामिल हुए। उन सबों के सान्निध्य में कुछ सुनना सुनाना मेरे लिए परम आनंद का अनुभव था।

इस मुलाकात से पूर्व दिसंबर 2017 में श्रद्धेय सत्यार्थी जी ने मुझे ‘साहित्य साधना संसद’ की ‘काव्य संध्या’ में भी आमंत्रित किया था। इसे मैं उनकी उदारता ही समझता हूँ कि भारत रत्न अटलबिहारी वाजपेयी जी को समर्पित जिस कार्यक्रम में ग्वालियर के तमाम वरिष्ठ कवि साहित्यकार उपस्थित थे उसमें उन्होंने मुझे मुख्य अतिथि का सम्मान दिया। नव वर्ष की पूर्व संध्या पर 31 दिसंबर 2017 को यह कार्यक्रम ग्वालियर के इंद्रगंज स्थित सनातन धर्म मंदिर परिसर में आयोजित किया गया था। उपस्थित सभी साहित्य मनीषियों ने ग्वालियर के इस गौरव स्तंभ को एक महान व्यक्तित्व, एक महान राजनेता और एक महान कवि के रूप में नमन करते हुए अपनी अपनी रचनाओं का पाठ किया।

‘शिंदे की छावनी’ में जहां श्रद्धेय सत्यार्थी जी घर है वहां मुख्य सड़क से ऊपर चौड़ी सीढ़ियों से होकर जाना होता है। ग्वालियर के अंदर पुराने ‘भारत टॉकीज’ के पास स्थित यह रास्ता चौड़ी सीढ़ियों के नाम से ही मशहूर है।

इस गोष्ठी के समापन के बाद श्रद्धेय सत्यार्थी जी के साथ हिंदी साहित्य में उनके कार्यों के बारे में लंबी चर्चा हुई। देश के अनेक शीर्ष साहित्यकारों के साथ उनके व्यक्तिगत संबंधों के बारे में जानकर सुखद आश्चर्य हुआ। अपने फोटो एल्बम में उन्होंने उन मधुर पलों को सहेज कर रखा है।

उनके विषय में यह भी बड़ी बात है कि वे पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल जी के अनुज तुल्य रहे। डा. हरिवंशराय बच्चन के साथ भी उनके घनिष्ठ संबंध रहे। डा. बच्चन के पत्रों को उन्होंने अपनी पत्रिका में प्रकाशित भी किया है।

इस क्रम में उन्होंने दो किताबें ‘चाचा की चिलम’ और ‘समर्पित सुधियाँ’ मुझे भेंट की जिनका संपादन उन्होंने स्वयं किया है। ‘चाचा की चिलम’ कविवर श्री शांतिस्वरूप ‘चाचा’ की व्यंग्य रचनाओं का संग्रह है वहीं ‘समर्पित सुधियाँ’ कविवर कुंजबिहारी व्यास के प्रणय गीतों का संग्रह है।

मेरे लिए भी अवसर था अपनी पाँचवी किताब ‘कोई एक आशियाँ’ को उन्हें भेंट करने का…

यह शाम भी मेरे लिए कभी न भूल पाने वाली शाम बन गई…

श्रद्धेय सत्यार्थी जी नई पीढ़ी के रचनाकारों के लिए प्रेरणा स्रोत और संपूर्ण साहित्य जगत के लिए एक प्रकाश स्तंभ हैं…

ईश्वर की कृपा उन पर एवं उनके पूरे परिवार पर सदैव बनी रहे।
वे स्वस्थ रहें और दीर्घ काल तक अपनी लेखनी से माँ भारती की सेवा करते रहें…

नमन उनके कृतित्व को…नमन उनकी साधना को…

  • डा. स्वयंभू शलभ
    रक्सौल (बिहार)
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।