हिंदी के प्रचार प्रसार में सोशल मीडिया की भूमिका

Read Time4Seconds
vinay shukla
भारत की स्वतन्त्रता के पूर्व हिंदी भारत की एक मात्र सर्वमान्य अघोषित राष्ट्र भाषा थी। आजादी की लड़ाई के परवानों ने सदा ही हिंदी को पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने का भाषा सूत्र माना है और शायद यही कारण है कि भारत के संविधान निर्माण के समय भी
सर्वसम्मति से हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा मान लिया गया। कतिपय कारणों से कालांतर में संविधान में संशोधन कर हिंदी को केंद्र सरकार के कार्यालयों में कामकाज की भाषा का दर्जा देते हुए इसे राजभाषा के रूप में प्रतिस्थापित किया गया और फिर केंद्र सरकार को यह जिम्मेदारी दी गई कि हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए समुचित उपाय किया जाए। इन उपायों
के अंतर्गत हिंदी के प्रचार के लिए विभिन्न मानदंड तथा उपायों के अनुसार सरकारी तंत्र द्वारा प्रयास किया जा रहा है पर उन प्रयासों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम ही देखने को मिला। हालाँकि हिंदी प्रेमी जनमानस द्वारा अपने स्तर पर ढेरों प्रयास किये जाते रहे हैं पर अधिकांश उपाय कोई ठोस परिणाम ला पाने में सक्षम नहीं हो पा रहे थे। फिर अचानक
वैश्वीकरण का दौर प्रारम्भ हुआ। पूरा विश्व एक ग्लोबल गाँव में बदलने लगा। व्यापार और
प्रभार के विस्तार के प्रयास में विदेशी कंपनियों तथा प्रशासकों ने यह पाया कि यदि
हिन्दुस्तान में अपने व्यापार और संबंधों का प्रसार कर पाए तो आबादी के घनत्व के कारण थोड़े
से प्रसार से ही धन अर्जित करने का इससे अच्छा मौक़ा नहीं मिल सकता। एक तरफ ये प्रयास
चल ही रहे थे कि एक नए दौर की शुरुआत हो गई। वह दौर है सोशल मीडिया का। सोशल
मीडिया के जन्म से पूर्व वैश्विक अंतर्जाल(इंटरनेट/इंट्रानेट) का प्रसार हुआ और फिर इस
प्रसार के साथ ही ई-मेल और फिर आगे चलकर ब्लॉगिंग साइटों का उद्भव होना प्रारम्भ हुआ।
ऑरकुट,याहू चैट आदि जैसी कुछ चैट साइटें तथा ब्लॉगिंग साइटों के आ जाने से भारत के निवासी
अपनी भाषा में इन माध्यमों का प्रयोग करने को उत्सुक हुए। हालांकि अभी तक कम्प्यूटर की
दुनिया में यूनिवर्सल कोडिंग(यूनिकोड) समर्थित भारतीय भाषाओँ में काम किये जाने लायक
किसी सॉफ्टवेयर अथवा कम्प्यूटर की-बोर्ड का विकास नहीं हो पाया था अतः भारतीय
भाषाओँ में टंकण की ख़ास सुविधा भी नहीं उपलब्ध हो पा रही थी। इसके कारण सबसे बड़ी
समस्या थी एक कम्प्यूटर में हिंदी में टंकित सामग्री अन्य कम्प्यूटर में डब्बा बनकर आता था।
हाँ यदि सम्बद्ध फॉण्ट या सॉफ्टवेयर उस कम्प्यूटर में भी इनस्टॉल कर दिया जाता तो यह
समस्या दूर हो जाती। अब यदि आपको हिंदी में कुछ कहीं लिखकर भेजना हो तो उसका
सॉफ्टवेयर भी साथ भेजना आवश्यक होता था जो हिंदी के विकास में सबसे बड़ी असुविधा थी।
इन समस्त समस्याओं से मुक्ति के लिए गूगल द्वारा इंडिक कीबोर्ड प्रारम्भ किया गया। गूगल
की वेबसाइट से इंडिक की बोर्ड डाउनलोड कर उसके माध्यम से अंग्रेजी कीबोर्ड का प्रयोग
कर फोनेटिक में रोमन लिपि का व्यवहार करते हुए हिंदी में लिखने की परम्परा प्रारम्भ हुई
जिससे लिप्यंतरण के माध्यम से अंग्रेजी की लिपि में लिखे हुए शब्द हिंदी में परिवर्तित होने लगे
और फिर हिंदी में काम होने लगा। कम्प्यूटर पर हिंदी में काम करने की प्रक्रिया का क्रमशः
विकास होता गया| इस प्रयास में भारत के साथ-साथ माइक्रोसॉफ्ट और गूगल ने निरंतर
प्रयास किया। हिंदी का विकास क्रमशः होने लगा पर अब भी विकास की गति धीमी ही
थी। फिर अचानक चमत्कार हुआ और फेसबुक का प्रादुर्भाव हो गया। बस यह प्रादुर्भाव ही
हिंदी के विकास की प्रक्रिया में तेजी लाने का कारक बना।
फेसबुक एक ऐसा माध्यम बनकर उभरा जो लोगों को अपने विचार, सोच के साथ-साथ दिनचर्या
की ढेरों कहानियों को आपस में वैश्विक स्तर पर साझा करने का एक बड़ा मंच बन कर उभरा।
चूँकि भारत में शहरों की अपेक्षा ग्रामीण अंचलों में हिंदी भाषी आबादी अधिक है तथा फेसबुक
का प्रसार शहरी हो या ग्रामीण हर अंचल में हो गया। अब तो लोग अपने एक-एक क्षण के
क्रियाकलापों को आपस में सोशल मीडिया में शेयर करने लगे।ऐसा तो है नहीं कि हर व्यक्ति
अंग्रेजी का बढ़िया ज्ञान रखता हो या फिर अंग्रेजी का ज्ञान रखता ही हो।अपनी भाषा में भी तो अभिव्यक्ति
की जा सकती है।और फिर यह अभिव्यक्ति बेबाक जो होती है।फेसबुक के साथ साथ मोबाइल
तकनिकी में भी बड़ा ही विस्तार हुआ और फिर धीरे- धीरे कम्प्यूटर और लैपटॉप का स्थान
मोबाइल ने लेना प्रारम्भ कर दिया।जैसे-जैसे मोबाइल का विकास हुआ, कम्प्यूटर पर चलने
वाली अधिकांश वेबसाइटें मोबाईल समर्थ होने लगी और फिर जनमानस की इच्छा और प्रसार को
देखते हुए धीरे-धीरे कीबोर्ड,बोलकर किये जाने वाले टंकण की सुविधा आदि समस्त टूल सोशल
मीडिया द्वारा विकसित किया जाने लगा जिससे अधिक से अधिक लोग हिंदी में भाव सम्प्रेषण
में समर्थ हो सकें।व्हाट्सएप्प, टेलीग्राम, हाइक,पिंटरेस्ट और न जाने कितने सोशल मीडिया के
वेबसाइटों ने खुद को हिंदी में भी ढालना प्रारम्भ कर दिया।चूँकि ताली दोनों हाथ से ही
बजती है, यदि सोशल मीडिया कंपनियों को अपना प्रसार करना है तथा बाजार में बने रहना
है तो फिर अधिकांश भारतवासियों के द्वारा प्रयुक्त भाषाओं में आसानी से संवाद किये जाने की
सुविधायुक्त उपकरण का विकास तो करना ही होगा, और यही जिजीविषा उन्हें हिंदी के उपकरण
के विकास की और अग्रसर करती गई, हिंदी का प्रसार बढ़ता गया |
अबतक तो केवल सोशल मीडिया द्वारा वार्तालाप और भाव सम्प्रेषण की सुविधा युक्त उपकरण
ही उपलब्ध करवाए जा रहे थे, पर सोशल मीडिया के विकास ने क्रमशः प्रिंट मीडिया पर भी
नकारात्मक प्रभाव डालना शुरू किया।ढेरों पत्र पत्रिकाएं हो केवल प्रिंट मीडिया में ही आती
थी, वो भी अब धीरे-धीरे सोशल मदिया प्लेटफॉर्म पर आने लगी है।अब तो अखबारों,
पत्रिकाओं और पाठ्यपुस्तकों को ऑनलाइन भी पढ़े जाने की सुविधा प्रारम्भ हुई।इस प्रक्रिया से
सबसे अधिक यदि कोई लाभान्वित हुआ तो वह है हिंदी का पाठक।अबतक जो रचनायें या पत्र-
पत्रिकाएं अनजान कोनों में पड़ी रहती थीं, उन्हें भी पाठकों का बड़ा वर्ग मिलने लगा।यह
सोशल मीडिया का ही प्रभाव है कि फेसबुक, व्हाट्सएप्प आदि के मंचों पर हिंदी साहित्य सृजन
एवं पठन-पाठन के अनगिनत ग्रुप, वेबसाइट और समूह निरंतर काम कर रहे हैं |
पहले कंपनियों के उत्पाद पर केवल अंग्रेजी में ही विवरण दिया रहता था पर सोशल मीडिया के
बल को देखते हुए कम्पनियाँ अपने उत्पादों पर हिंदी में भी विवरण छापने लगी हैं तथा प्रचार
के लिए सोशल मीडिया की सहायता ले रही हैं|
आज यदि सोशल मीडिया का प्रादुर्भाव न हुआ होता तो हिंदी सरकारी गाडी के भरोसे शायद
ही आगे बढ़ पाती।उसे आंकड़ों में ही विकसित होते हुए देखा जाता, धरातल पर उसका कोई
विशेष प्रभाव नहीं दिखा पर सोशल मीडिया के जोर ने इसे जन- जन तक पहुंचाया और इसके
प्रचार- प्रसार को दूना- चौगुना बढ़ाया।हालाँकि हिंदी भाषा का विकास तो तेजी से हो
रहा है पर्टिक्यूलरली यह भी देखा जा रहा है कि अधिकांश हिंदी भाषी सोशल मीडिया
प्लेटफॉर्मों पर हिंदी की लिपि देवनागरी में हिंदी को लिखने की बजाय रोमन लिपि(अंग्रेजी
की लिपि) में लिख रहा है।इसमें कोई एक दोषी नहीं है , दोषी वो समस्त लोग हैं जो हिंदी
को रोमन लिपि में लिख रहे हैं।हालांकि रोमन लिपि का प्रयोग अधिकांश लोग अज्ञानता वश
कर रहे हैं पर फिर भी यह अभ्यास कहीं न कहीं हिंदी को कमजोर ही करेगा और फिर सबसे
पहले हिंदी की लिपि स्वतः ही बदल जाएगी।और यदि हिंदी की लिपि एक बार बदल गई तो
फिर हिंदी का पतन होते देर नहीं लगेगी।ऐसा न हो कि विकाश और विनास की लहार एक
साथ उठकर सबकुछ तहस-नहस न कर दे , तथापि सोशल मीडया ने जिस गति से हिंदी का
विकास किया है वह अतुलनीय है।
#विनय शुक्ला
हाजिनगर, पश्चिम बंगाल 
0 0

matruadmin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

हिंदी के प्रचार प्रसार में सोशल मीडिया की भूमिका

Thu May 30 , 2019
” हम सब की जान है हिन्दी। हिन्दुस्तान देश की पहचान है हिन्दी मस्तक पर शोभे चमकती बिन्दी बनकर हिन्दी अपनापन की एहसास पहचान है हिन्दी हिन्द देश की गौरवशाली गाथा की गान है हिन्दी। हमारे राष्ट्र की जान,प्राण राष्ट्रभाषा हिन्दी गौरवशाली शान की पहचान है।हिन्दी हम हिनदुस्तानियों की राष्ट्रभाषा […]

Founder and CEO

Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।