हिंदी के प्रचार-प्रसार और विस्तार में सोशल मीडिया की भूमिका

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sudhir sinh
              हिंदी भारत की राजभाषा है और भारतवर्ष के हिंदी पढ़ने- लिखने और बोलने वाले 70% लोग भी इस बात से अनभिज्ञ हैं ।सभी हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते हैं। जिस देश को आजाद हुए 70 साल से ऊपर हो गए उस देश को आजादी के नाम पर एक राष्ट्रभाषा आज तक नहीं मिला। राजभाषा के रूप में लगातार हम हिंदी का प्रयोग कर रहे हैं। हिंदी के समाचार पत्र ,हिंदी के पत्र पत्रिकाएं, हिंदी के न्यूज़ चैनल तथा हिंदी भाषा पर आधारित तमाम तमाम चैनल हिंदी के प्रचार प्रसार में अपना महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
          वर्ष 2014 का समय था बच्चों ने मुझे मेरे कहने पर एक मोबाइल ला कर दे दिया ।जिसमें व्हाट्सएप फेसबुक तमाम सुविधाएं  थीं।मोबाइल चलाना ज्यादा नहीं आता था ।तो आनन-फानन में बच्चों से फेसबुक  अकाउंट  बनवाया और 20- 25 लोगों को उनके व्यक्तिगत रिकवेस्ट पर उसमें जोड़ लिया। बड़े बेटे ने समझाया इसमें उन्हीं लोगों को जोड़ा जाता है जिन्हें आप जानते हैं। फिर क्या था वह 20-25 गायब किये गए ।अचानक मगसम संस्था के प्रभारी पुष्पेंद्र जी ने मुझे समझाया किस तरह से किस यंत्र का प्रयोग हिंदी भाषा के उन्नति और विकास के लिए किया जा सकता है। हम लोग मगसम के नाम से बनी संस्था से जुड़े हुए थे। हमारा मकसद था कि हम अधिकाधिक लोगों से जुड़े तथा हिंदी भाषा में लिखे पढ़े और मगसम के जरिये श्रेष्ठतम देश में जन-जन तक पहुंचाएं। फिर मैंने मगसम प्रतिक्रिया श्रोता मंच के नाम से एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया और हफ्ते 10 दिन में दो चार लोगों को उस में जोड़ा। लेकिन अगले 1 महीने के अंदर 10–15 साहित्यिक समूहों ने मुझे अपने समूह में जोड़ दिया। एक साहित्यिक पटल का एडमिन किसी सदस्य के हिंदी भाषा की क्षमता को देखते हुए उसे अपने साथ जोड़ता है। शायद मेरा लेखन उन्हें पसंद आया उन्होंने मुझे अपने साथ जोड़ा।  इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ  कि मैं तकरीबन 100 से डेढ़ सौ लोगों को जानने लगा। हिंदी में लिखे उनकी रचनाओं को पढ़कर उनके आलेखों को पढ़कर / गद्य और पद्य की सभी विधाओं में लिखे उनकी लेखनी को पढ़कर आनंद आने लगा। यह क्रम  बढ़ता गया आज  45 से 50 साहित्यिक समूहों से जुड़ाव हो गया है ।इन साहित्यिक समूहों के एडमिन से अच्छी जान पहचान हो गई है। व्हाट्सएप और फेसबुक में जुड़े हुए आज तकरीबन 4 वर्ष हो गए हैं, इस जुड़ाव से बहुत से फायदे और कुछ नुकसान भी प्राप्त हुए ।
            हिंदी साहित्य के नाम पर कहीं बहुत उम्दा लेखन के दर्शन किए  तो कहीं साहित्यकार साहित्य के नाम पर कूड़ा कचरा भी देखने को मिला है। हिंदी साहित्य में क्या कुछ हो रहा है हिंदी साहित्य का लेखन कितना विकास कर रहा है। हिंदी साहित्य के लोग क्या सोचते  हैं। हिंदी की सभी विधाओं में क्या कुछ लिखा पढ़ा जा रहा है ।समीक्षा से लेखक चिंतन का विषय पढ़ने को मिल जाता है ।गोष्ठियों में जाना होने लगा।गौष्ठी कब होती है जानकारी मिलने लगी।  जब किसी लेखक का *मैं*  देखने को मिलता है वह पल असहज महसूस करता हूँ।
            व्हाट्सएप समूह फेसबुक समूह जिस कार्य के लिए होना चाहिए वह कम होता है और जिस कार्य के लिए प्रयुक्त नहीं होना चाहिए वह ज्यादा होता है ।हिंदी साहित्य को प्रचार मिले इसके लिए हम लोगों ने मिलकर कुछ तय किया। जिसके तहत बहुत सारे प्रयास अभी भी जारी है ।पर जब दक्षिण भारत के लेखक हिंदी के जगह अपने स्थानीय भाषा में कुछ पोस्ट करते हैं तो स्थिति असहज हो जाती है। वे ऐसा क्यों करते हैं यह तो वे ही  जाने। क्योंकि उनकी वह भाषा उसमें क्या लिखा है यह हम तो नहीं जान पाते हो सकता है कुछ लोग उस पटल पर हो जो उस भाषा को समझ सकते हैं पढ़ सकते हैं ।उनके लिए लिखा गया हो लेकिन अगर पटल पर पांच लोग स्थानीय भाषा वाले हैं और 50 लोग हिंदी भाषा भाषी हो तो प्रत्येक व्यक्ति का यह नैतिक दायित्व बनता है कि वह हिंदी भाषा में ही अपने पोस्ट करें ।परंतु वह नहीं करता अब उसका कोई कुछ कह तो सकता नहीं ।
              दक्षिण भारत के साथियों को यह एतराज होता है कि दक्षिण भारत के लेखकों को वह मान सम्मान नहीं देते हैं जो हम लोग हिंदी भाषा भाषी को देते हैं। उनका हक है उन्हें मिलना चाहिए कोई यह नहीं सोचते कि जब दक्षिण भारतीय भाषाओं में लिखेंगे तो आप की भाषाओं को कौन पढ़ेगा। जब आपकी भाषा को कोई और नहीं पढ़  पाएगा तो उस पर समीक्षा क्या  होगी और जब आप ऐसा कुछ हिंदी भाषा के साथ नहीं कर रहे हैं तो सम्मान पुरस्कार की बात तो बहुत दूर की है । इसे वह अपमान अपना मानने लगते हैं फिर या तो पटल छोड़ देते हैं या वही तकरार करने लगते हैं ।भाषाई तकरार से  भला किसी का नहीं होगा।  स्थानीय भाषा का अपना महत्व  अपनी जगह है ।स्थानीय भाषाओं के बहुत सारे पटल चलते होंगे  । कुछ अपनी भाषाओं का विस्तार प्रचार कर रहे हैं जो कहीं से अनुचित नहीं है ।पर हिंदी पटल पर हिंदी ही लिखी जानी चाहिए। कुछ लोग रोमन लिपि में लिखना प्रारंभ कर देते हैं ।उन्हें भी तो कहा जाता है। कुछ मान जाते हैं कुछ नहीं मानते।
                पिछले 4 साल का अनुभव यह बता रहा है जितने भी लोग व्हाट्सएप और फेसबुक से जुड़े हैं ।25  % कलमकार हिंदी में लिख पढ़ रहे हैं और बहुत अच्छा लिख पढ़ रहे हैं। हिंदी का उत्तरोत्तर विकास हो रहा है ।हिंदी दक्षिण भारत में भी पहुंच रही है। हिंदी जम्मू और कश्मीर में भी पहुंच रही है ।हिंदी गुजरात में पांडिचेरी में केरला में भी पहुंच रही है। इस आभाषी  दुनिया  के साथ एकजुट होकर हिंदी अपना एक मुकाम आज  बना रही है। व्हाट्सएप और फेसबुक समूहों में हिंदी के  भाषाविद , हिंदी की जानकारी रखने वाले, हिंदी व्याकरण की जानकारी रखने वाले हिंदी लिखने पढ़ने में जिन पक्षों  का ध्यान रखा जाना चाहिए उसको जानने वाले आ चुके हैं और भी व्हाट्सएप ग्रुप और फेसबुक पर एक क्लास भी लगाने लगे हैं ।कहीं गजल सिखाया जा रहा है तो  कहीं दोहा सिखाया जा रहा है। तो कहीं सजल भी सिखाया जा रहा है कुछ जगहों पर बेबाक तो अधिकांश जगहों पर सांकेतिक समीक्षा की जा रही है।
           आज  यह हकीकत है की पुस्तकालयों में पाठक संख्या दिनों दिन कम होता जा रहा है ।वहां पर सिर्फ अब वही नजर आ रहे हैं जो शिक्षण से जुड़े हैं। जिनके पास मोबाइल नहीं है जिन्हें वहां पर बैठकर अध्ययन करना है और उसी अध्ययन के आधार पर अपनी जिंदगी की गाड़ी को रफ्तार देनी है।
           व्हाट्सएप के कई ग्रुपों में प्रातः  काल में जो अच्छे -अच्छे संदेश मिला करते हैं।  वह वाकई पहले दर्शन नहीं होते  थे । वह कभी कभार  हुआ करते थे ।क्योंकि वह पत्र-पत्रिकाओं में कभी कभार मिल जाते थे या साधु-संतों की नगरी या साधु-संतों के कार्यक्रम के दौरान कुछ पढ़ने को मिल जाते थे। भारत के प्राचीनतम हिंदी भाषा में लिखे गए तमाम जानकारी आज व्हाट्सएप और फेसबुक पटल पर कुछ लोग उपलब्ध कराने में लगे हैं। वह सब कुछ बिना किसी स्वार्थ के।
                  हिंदी साहित्य में कुछ लोग हिंदी को व्यापार बनाने में भी लगे हैं। यूं तो कहते हैं कि लेखन स्वान्तः सुखाय  में ज्यादा लोग रहते हैं और तो यहीं से धीरे-धीरे वे लेखन को एक व्यापार की तरफ ले जाने लगते हैं। साझा संकलन उसका एक जीता जाता उदाहरण है।  जिस तरह से साझा संकलन  का व्यापार चल पड़ा है। जिसके अंदर सभी मिल जुलकर एक साथ सबको पढ़ते हैं ।साहित्य के नाम पर साझा संकलन में जो परोसा जाता है। वह जिसके लिए परोसा जाता है वहीं तक सीमित रह जाता है । उस साझा संकलन में कुछ रचनाओं को छोड़ दे तो शेष रचनाएं क्या होती हैं वह समझ से परे होता है ।परंतु साहित्य का यह भी एक पक्ष है जिसके अंतर्गत कुछ कलमकार छप तो जाते हैं। कुछ कलाकारों को छाप दिया जाता है । पर छपास रोग बढ़ाने में कुछ लोगों का हाथ बहुत अधिक होता है।इस प्रक्रिया ने नाव लेखक का मन प्रसन्न हो जाता है।उनका दिल खुश हो जाता है ।तो किसी का क्या जाता है।
                 आज से 10: 15 वर्ष पहले पत्र- पत्रिकाओं की भरमार  थी अभी भी है ।अब लोग पत्रिकाएं अपने घर पर बहुत कम मंगाते हैं ,मंगाते हैं  तो पढ़ते नहीं हैं और कुछ माह बाद वह पत्रिका कबाड़ में पहुंच जाती है ।जो पढ़ने के शौकीन होते हैं वे  लाइब्रेरी पहुंच जाते हैं और हिंदी में लिखे हुए हो पढ़ते हैं ।
              सोशल मीडिया ने एक सबसे बड़ा काम यह किया है जिससे  कलमकारों के बीच की दूरियां खत्म होने लगी है। कलमकार एक दूसरे को जानने समझने लगे हैं ।वहीं कलमकार कुछ लोगों को मिलाकर कुछ गोष्ठियां कर लेते हैं कुछ छोटा मोटा कार्यक्रम कर लेते हैं जिसे वह अखिल भारतीय साहित्य कार्यक्रम भी कह देते हैं। कहते हैं किसी से भी अगर पूछा जाए कि तुम्हारे पास समय है तो वह व्यक्ति कहता है कोई समय नहीं है ।वह समय निकालता है। लेकिन आज अगर आप धरातल पर देखेंगे तो अच्छे-अच्छे कालोनियों में  दिन में लोग खाली आपको नजर आएंगे वे या तो गप्पे लड़ा रहे होंगे या अपने घर मोहल्ले या खाली स्थान पर बैठकर ताश की गड्डीया फेंट  रहे होंगे कोई और आनंद लेते हुए  जुआ भी  खेलते मिल जाएंगे। यह सब होते हुए  भी व्हाट्सअप और फेसबुक पर हिंदी  दूर दूर तक जा रहा है पूरे हिंदुस्तान के लोग आप को पढ़ रहे हैं । आपकी हिंदुस्तान में एक पहचान बन रही है। सोशल मीडिया ने नागरिकों की झिझक को खत्म कर दिया। वैसे तो हिंदी भाषा देश के 70% भागों में बोली जाती है ।लेकिन जब लिखने की बारी आती है 70% में से 50 से 55 परसेंट लोग ही कुछ लिख पाते हैं ।चिट्ठियों का दौर समाप्त हुआ तो व्हाट्सएप और फेसबुक पर पत्र लिखे जाने लगे। अपनी बातें लोग पहुंचाने में लग गए। दिन प्रतिदिन हिंदी भाषा भाषी लोगों का संख्या में बढ़ोत्तरी हो रहा है ।सोशल मीडिया ने इस बार भारत में जो चुनाव हुए उसमें भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लोगों को चुनाव के प्रति जागरूक किया ।चुनाव क्यों महत्वपूर्ण है वोट क्यों डाले जाने चाहिए ।इस पर लंबी चौड़ी चर्चाएं हुई, बातचीत हुई ,कुछ ऐसी बात करते हुए जो उन्हें व्हाट्सएप या फेसबुक पर नहीं करना चाहिए ।सोशल मीडिया लोगों को जोड़ने के लिए बना है।लोगों को तोड़ने के लिए नहीं ।आज के अखबार में दिया गया है की चुनाव से जुड़े बहुत सारे फेक न्यूज़ और आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए पोस्ट भी पाए गए। उन पर कार्रवाई भी होगी और निश्चित रूप से होना भी चाहिए। सोशल मीडिया का काला पक्ष उजागर होना चाहिए ।सोशल मीडिया के हानिकारक तत्वों को दूर करना भी जरूरी है ।
               सोशल मीडिया का सबसे बड़ा दोष क्या है ?सोशल मीडिया में हिंदी का प्रचार-प्रसार हो रहा है होना भी चाहिए।  लेकिन सोशल मीडिया में जिस तरह से सम्मान और पुरस्कार का एक नया चलन चल पड़ा है ।जिसके अंतर्गत कुछ भी लिखे को सम्मानित किया जाने लगा है ।किसी को भी सम्मानित किया जाने लगा है ।जान पहचान वालों को सम्मानित किया जाने लगा है ।किसी के कहने पर किसी को सम्मानित किया जाने लगा है ।हिंदी साहित्य के लिए नहीं लगता यह सब  जरूरी है ।
           कुल मिलाकर हम कह सकते हैं सोशल मीडिया अपने  अपने बाल्यकाल में है । ज्यों-ज्यों  इसमें अच्छे लोगों को प्रवेश मिलता जाएगा वह अपने युवावस्था में आएगा ।तब  इसमें बहुत सारे  गुण अपने आप दिखाई पड़ने लगेगा ।अपने आप अवगुण दूर होने लगेंगे ।जो साहित्य के रसिक हैं वह हिंदी का भला करेंगे। जिनका साहित्य से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है वे लिंक भेजेंगे, फोटो भेजेंगे ,स्कैन के फोटो भेजेंगे। लिखने की क्षमता है नहीं फोटो खींचना और भेज ना ही उनके कर्तव्य से बाज नहीं आएंगे ।लेकिन यह काम धीरे-धीरे कम होता जाएगा और लोगों को हिंदी साहित्य का महत्व अपने आप समझ में आने लगेगा ।
               जरूरी है व्हाट्सएप और फेसबुक के एडमिन इस बात पर ज्यादा ध्यान दें ।कुछ एडमिन ऐसे भी हैं जो फेसबुक जारी रखें  हुए हैं लेकिन उस पर क्या हो रहा है उस पर कोई टिप्पणी नहीं करता। अगर वास्तव में उनकी कोई रुचि नहीं है तो उसको उन्हें  बंद कर देना चाहिए ।क्योंकि बिना मालिक का घर जी का जंजाल बन जाता है।
            हिंदी लेखन जगत में एक और दुखद पहलू देखने में आया है दूसरों की अच्छी-अच्छी लिखी हुई रचनाओं को लोग अपने नाम से पोस्ट करने लगे हैं और कुछ लोगों को तो इस पोस्ट के जरिए कुछ सम्मान भी मिल गए हैं ।यह बहुत ही कष्टप्रद पक्ष है जो लोग इस भय से बस अपनी रचना नहीं लिखते हैं कि उनकी रचना चोरी हो जाएगी वह भी गलत कर रहे हैं ।आप प्रतिवाद करिए जिसने आपकी रचना चोरी की है उसे समाज के सामने लाईऐ। उसे साहित्य  जगत से तड़ी पार कराइये। तभी जाकर एक स्वस्थ साहित्यिक परिवार के अंश आप  कहलाएंगे किसी परिस्थिति  से भागना उससे मुंह मोड़ लेना कायरता ही कहलाएगा ।जो लोग अच्छा कर रहे हैं उनके साथ जुड़ना और हिंदी का विकास करना अपना नैतिक कर्तव्य मानकर उसने अपना उसमें अपना बहुमूल्य योगदान देना यह कार्य सभी करने लगे तो हिंदी भाषा  का विकास और भी तेज गति से होने लगेगा। जिस दिन भारत के शत प्रतिशत लोग हिंदी भाषा में काम करने लगेंगे उस दिन
पूरा विश्व हिंदी भाषा के महत्व को समझ जाएगा और पूरे विश्व का एक हिस्सा हिंदी को अपना लेगा।
#सुधीर सिंह सुधाकर
दिल्ली
राष्ट्रीय संयोजक- मगसम
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।