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ajay prasad

दिल में अरमान था  बहारों का

और तोहफा मिला है खारों का ।
तेरे बगैर बता मै अब क्या करूँ
इन बेजान दिलकश नजारों का ।
रौशनी जब   मुझे खलने लगी है
क्या करें सूरज चाँद सितारों का ।
हसरतें   हाथ नहीं  मलती आज
इल्म जो होता हुस्न के इशारों का ।
खुबसूरती भी संगीन खंजर ही है
मासूम से चेह्रे है अब हत्यारों का ।
#अजय प्रसाद 
नालंदा(बिहार )
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http://matrubhashaa.com/wp-content/uploads/2019/02/ajay-prasad.pnghttp://matrubhashaa.com/wp-content/uploads/2019/02/ajay-prasad-150x150.pngmatruadminUncategorizedकाव्यभाषाajay,prasadदिल में अरमान था  बहारों का और तोहफा मिला है खारों का । तेरे बगैर बता मै अब क्या करूँ इन बेजान दिलकश नजारों का । रौशनी जब   मुझे खलने लगी है क्या करें सूरज चाँद सितारों का । हसरतें   हाथ नहीं  मलती आज इल्म जो होता हुस्न के इशारों का । खुबसूरती भी संगीन खंजर ही...Vaicharik mahakumbh
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