नैतिक शिक्षा सबके लिए

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kaveeta

अशोक काम की तलाश में गाँव से शहर आया। पढ़ा-लिखा ज्यादा था नहीं,इसलिए मजदूरी करने लगा, लेकिन उसका साथी मजदूरों से अक्सर झगड़ा होता था। कारण था उसका बातचीत में गाली-गलौज का इस्तेमाल। इसलिए कुछ ही दिनों में काम से निकाल दिया जाता था। बेकारी के समय खर्चा चलाना मुश्किल हो जाता और धीरे धीरे छोटी-मोटी चोरी करते वह कब अपराध की दुनिया में फंस गया,उसे पता ही न चला।
मोहन गाँव से शहर आया तो उसे कहीं काम नहीं मिला। उसने एक ढाबे पर बर्तन साफ़ करने का काम कर लिया, लेकिन आमदनी इतनी नहीं थी कि जिम्मेदारियां पूरी हो पाती। उस पर जब ढाबे में लोगों को एक बार के खाने पर उसकी महीने भर की पगार जितना खर्च करते देखता तो उसका मन अपनी दुश्वारियों पर रो उठता। धीरे-धीरे उसने सुनसान रास्ते पर लूटपाट शुरु कर दी। खर्च और अधूरी आस ने कभी सोचने का मौका ही नहीं दिया कि, सही क्या और गलत क्या ? आज जेल में अपने गुनाहों की सज़ा काटते कई एनजीओ की कार्यशाला में जब बताया जाता है कि कैसे अपनी इच्छाओं को वश में किया जाता है या अपनी कमाई को बढ़ाने के लिए रोजगार प्रशिक्षण दिए जाते हैं , तब मोहन यही सोचता है काश ये सब पहले मिलता तो आज उसकी जिंदगी कुछ और ही होती।
दीपक गाँव का आवारा लड़का था। गलत संगत,सिगरेट-शराब की लत और रोजगार की कमी से काम ढूंढने पास के एक छोटे शहर आ गया। यहाँ जुगाड़ करके ऑटो चलाना सीख लिया। स्वभाव का अक्खड़ था,सो जब-तब सवारियों से उलझ पड़ता था। कई नए लोगों को यूं ही चक्कर लगवा कर ज्यादा पैसे ऐंठता। महिलाओं के साथ भी अभद्र व्यवहार करता। खर्चे बढ़ने पर उसने सोचा कि, बस में ड्राइवर हो जाए,लेकिन उसका कैरेक्टर सर्टिफिकेट इतना खराब था कि,उसे कहीं नौकरी नहीं मिली। अपने साथ वालों को आगे बढ़ते देख वह कुंठा का शिकार हो गया, जिससे उसका स्वाभाव बद से बदतर होता गया।
शिक्षा हमारे समाज की नींव है,जिस पर समाज का ढांचा टिका हुआ है। समाज के हर वर्ग तक शिक्षा पहुंचे जिससे लोगों का जीवन सुगम हो,लोग उनके अधिकारों के बारे में जानें, सरकार की विभिन्न योजनाओं की जानकारी वे प्राप्त कर सकें और उनका लाभ उठा सकें। समाज के विभिन्न वर्गों के लिए शिक्षा की जरुरत अलग-अलग रहती है। यदि संपन्न उच्च और उच्च मध्यम वर्ग को छोड़ भी दिया जाए तो निम्न मध्यम वर्गीय और निम्न वर्ग के लोगों के लिए शिक्षा सिर्फ अक्षर ज्ञान तक ही काफी समझ ली जाती है। इसके चलते इन वर्गों के बच्चे अपनी प्राथमिक पढ़ाई के बाद ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। इसका कारण परिवार का माहौल,शिक्षा की उपयोगिता की समझ न होना भी है,तो कई बार आर्थिक मजबूरी भी। इसके बाद इन बच्चों का सामना पड़ता है इन्हीं के जैसे अशिक्षित लोगों से, जिनको सामान्य शिष्टाचार की जानकारी भी कई बार नहीं होती है। गाली-गलौज,अभद्र भाषा सहज ही इनके व्यवहार में शामिल हो जाती है। इनमें से अधिकतर किसी गैराज,ढाबे, दुकानों पर ऑटो-ट्रक ड्राइवर के रुप में मजदूरी या ऐसे ही काम से जुड़ जाते हैं।
ग्रामीण इलाकों में स्थिति बहुत भयावह होती है,क्योंकि वहाँ रोजगार के अवसर सीमित होते हैं। भेदभाव और जातीय संकीर्णता के चलते ये अवसर और भी कम हो जाते हैं। ऐसे में रोजगार के लिए ये लोग जब शहरों की ओर आते हैं,तो वहाँ की चकाचौंध समृद्धि को देख कर इन्हें अपने जीवन की कमियों का एहसास होता है,लेकिन फिर अशिक्षा और अव्यावहारिक बर्ताव इनके आगे बढ़ने के रास्ते में रुकावट डालता है। विडम्बना ये है कि, इन अड़चनों को न ये समझ पाते हैं, न ही इनसे पार पा पाते हैं। खर्चे बढ़ते रहते हैं और जीवन की चाहतें भी, जिससे इन लोगों में कुंठाएं बढ़ती हैं। पैसों की तंगी,ख़राब व्यवहार के कारण आपसी रिश्ते खराब होते हैं और ऐसे में ये लोग जाने-अनजाने अनैतिक कामों की ओर अग्रसर हो जाते हैं। शराब, जुएं की लत,चोरी-चकारी और आपराधिक गतिविधियों द्वारा पैसे कमाने का शार्टकट अपना लेते हैं।
मजदूर गैराज या ढाबों पर काम करने वाले कुली या हॉकर,चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मैकेनिक के तौर पर काम करने वाले या इसी श्रेणी के लोग जिनकी शिक्षा पूरी नहीं हो पाती,इन्हें स्वस्थ माहौल नहीं मिल पाता है। जिन्हें अच्छा क्या,बुरा क्या बताने वाला कोई नहीं होता, क्या करना चाहिए-क्या नहीं और अगर नहीं तो कैसे ?,ये बताने वाला भी कोई नहीं होता है। इनके जीवन की जद्दोजहद सिर्फ पैसा कमाने से भी बहुत अधिक होती है। हमारी शिक्षा पद्धति में व्यवहारगत इन मूलभूत सिद्धांतों को शामिल नहीं किया गया है। ये माना जाता है कि, छात्र जीवन में आगे बढ़ते हुए दैनंदिन व्यवहार में ये बातें शामिल होती जाएँगी। उन बच्चों के लिए जो बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं, या लगातार खराब माहौल में रहने को बाध्य हैं उन्हें सही नीतिगत व्यवहार की शिक्षा का कोई प्रावधान नहीं है। स्कूली शिक्षा में समय-समय पर बदलाव होते रहते हैं,लेकिन शिक्षा की बढ़ती पहुँच के बावजूद भी समाज में आपराधिक मामलों की कमी नहीं हुई है। इसका बड़ा कारण नैतिक शिक्षा का अभाव है।
यही हाल मजदूर वर्ग का भी है। जीवन के कटु अनुभवों से वे जो सीख लें,बस वही आगे बढ़ पाता है,लेकिन इन्हें व्यवहारगत ट्रेनिंग देने की शासन के पास बहुत विस्तृत योजना नहीं है। हालांकि,अवसर विशेष पर कुली, ऑटो चालकों,बस चालकों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है, लेकिन वह सिर्फ तब,जब कोई बड़ा विदेशी समागम होने वाला हो, लेकिन हमारे खुद के लोगों के लिए नहीं।
ऐसे लोग जब अज्ञानतावश या अपनी कुंठा-हताशा वश अपराधों में लिप्त होकर सजा पाते हैं,तब उन्हें सही- गलत के लिए प्रशिक्षण और कार्यशाला की जाती है,लेकिन ऐसा कुछ होने से पहले और सभी के लिए आवश्यक तौर पर नहीं। हाँ,अब कुछ स्वयंसेवी संगठन सरकार के सहयोग से कुछ प्रोग्राम जरूर चला रहे हैं,पर अभी भी उनकी पहुँच सब तक नहीं है। साथ ही ये कार्यक्रम इतने अनियोजित हैं कि,एक बार के प्रशिक्षण के बाद उनका प्रभाव और पुनः जरुरत की निगरानी ही नहीं कर पाते हैं।
कार्यालय में अधिकारियों के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण होते रहते हैं,लेकिन क्लर्क,चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों( हेल्पर, लाइनमेन, चपरासी) के लिए ये नहीं के बराबर हैं जबकि इन्हीं का जनता से सीधा वास्ता पड़ता है। यही लोग मुख्यतः दुर्व्यवहार के लिए जाने जाते हैं। देखा जाए तो सरकारी नौकरियों में रहते हुए भी इनके लिए तरक्की के रास्ते बहुत सीमित होते हैं,जिसका असर इनके व्यवहार पर पड़ता है। हालांकि, आर्थिक रूप से इनकी उत्तरोत्तर प्रगति होती रहती है,लेकिन जिस जगह ये काम करते हैं वहाँ पैसे के साथ पॉवर की बड़ी महत्ता होती है जिसे पाने के लिए कामों में अड़ंगे लगाना,लोगों को भ्रमित करना,जल्दी काम करवाने के नाम पर पैसा मांगना जैसी बातों से ये स्वयं को पावर पोज़िशन में मानते रहते हैं।
सरकार को चाहिए कि, एक ऐसा विस्तृत कार्यक्रम बनाए,जिसमें रोजगार मूलक, प्रगति मूलक और व्यवहारगत प्रशिक्षण दिया जाए। आरटीओ,कर्मचारी संघ और मजदूर यूनियन के साथ ऐसे लोगों का प्रशिक्षण और कार्यशाला सुनिश्चित की जाए। साथ ही एक निश्चित समय अंतराल पर इनके एडवांस कोर्स के साथ इन ट्रेनिंग की पुनरावृत्ति हो ताकि इसका असर और सुधार और बदलाव के लिए आवश्यक परिवर्तन इन पाठ्यक्रमों में किए जा सकें।
ऑटो टैक्सी,बस ड्राइवर के लाइसेंस का नवीनीकरण करते समय अंतराल पर काम किया जाना जरूरी है,ताकि इनके प्रशिक्षण की निगरानी की जा सके। साथ ही मजदूर,मैकेनिक मजदूर आदि के लिए उनके नौकरी प्रदाता व्यक्ति या संगठन को जिम्मेदार बनाया जाए।
समाज में बढ़ती कुंठा, हताशा और आपराधिक मामलों को देखते हुए अब अपारम्परिक रोजगार मूलक और नैतिक शिक्षा पर जोर दिया जाना जरुरी है। या कहें कि,बुनियादी शिक्षा के सिद्धांत को कार्यरुप देने का समय आ गया है। साथ ही बढ़ती भौतिक जरुरतों के मद्देनज़र रोजगार मूलक प्रशिक्षण की समयावधि को कम किया जाकर इनका भरपूर प्रचार- प्रसार कर ज्यादा-से-ज्यादा लोगों को इससे जोड़ने की जरूरत है।

#कविता वर्मा 

परिचय: इंदौर के तुलसी नगर  में निवासरत कविता वर्मा को लिखने- पढ़ने का शौक ही लेखन में उतार लाया है। आप स्वान्तः सुखाय लिखती हैं और लगभग १५ साल शिक्षण से जुड़ी रही हैं। कई पत्रों और पत्रिकाओं में लेख,कहानी,लघुकथाएँ और कविताएं भी प्रकाशित हुई हैं। प्रकाशित कहानी संग्रह ‘परछाईयों के उजाले’ को प्रथम पुरस्कार मिला है। आपका जन्म स्थान टीकमगढ़,जबकि वर्तमान निवास इंदौर है। बीएड, एमएससी करने के साथ ही १५ वर्ष का गणित शिक्षण का अनुभव है।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।