तोड़ो न कलियाँ

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dhirendra
लेकर चमन की सारी खुशियाँ
मचलने लगी है बागों की कलियाँ ।
नीली , पीली , रक्तिम , गुलाबी
खिलने लगी है बागों की कलियाँ ॥
ओस की बूँदों पे सूरज की किरणें
पड़ते ही सजती है मोती की लड़ियां ।
रंग -बिरंगी विभिन्नाकृतियाँ
अवनि पे उतरी इन्द्रधनुषी छवियाँ ।
कोमल , मोहक , मखमली , मुलायम
खिलने लगी है बागों की कलियाँ ॥
बागवां के हाथों से सींची गई ये
महका रही भू – नभ की गलियाँ ।
क्रीडा की वस्तु न समझो
इनसे ही सुशोभित है दुनियाँ ।
सागर , गगन , पर्वत शिखर में
खिलने लगी है बागों की कलियाँ ॥
ब्रह्मा की सृष्टि , विष्णु की माया
शक्ति बिना शव है शिव की भी काया ।
राम की सीता , कृष्ण की राधा
रमणी बिना सबका पौरुष है आधा ।
शिक्षा , सेवा , खेल , युद्ध भूमि में
खिलने लगी है बागों की कलियाँ ॥
सृष्टि की आधार शक्ति यही है
अनूजा , तनुजा , मातृशक्ति यही है ।
ये ही सजायेंगी सपनों की बगिया
तोड़ो न इनको खिलने दो कलियाँ ।
लक्ष्मी , दुर्गा , वीणापाणी की सखियाँ
खिलने लगी है बागों की कलियाँ
#आचार्य धीरेन्द्र झा 
परिचय-
संस्कृत साहित्य से आचार्य वर्षों से कविता लेखन में रत है। रचनाओं में शृंगार रस की प्रधानता होती है । प्रसाद साहित्य परिषद , हिन्दी साहित्य सम्मेलन एवम् कला संगम संस्थाओं से जुड़े है।
प्रखंड -रुन्नी सैदपुर 
सीतामढी , बिहार 

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

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