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नफरतो के बाजार सजे है , धोखो के अंबार लगे है।
इधर जाओ या उधर जाओ हर चेहरे पर नकाब लगे है।।
रात के अंधेरो का हटाने जैसे कृत्रिम रोशनी सजी है।
बस कुछ ऐसे ही इच्छाओं की पूर्ति के सपने सजे है।।
ना रोशनी देर तक रोक पाती है अंधेरो की कालख को।
ना हटाये कभी सपनो ने किसी की इच्छाओं के जाले।।
दो रोटी खाने को खाता है जीवन भर हर कोई।
पर वो जो बचपन मे माँ ने अपने हाथ से खिलाये,
उसके जाने के बाद कभी नही मिलते वो निवाले।।
#नीरज त्यागीग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).
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