अपनी बारी नहीं अभी

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pradeep kant

ज़िम्मेदारी नहीं अभी,
अपनी बारी नहीं अभी।

जैसे-तैसे जीत गए,
वैसी पारी नहीं अभी।

वक़्त नींद का हुआ भले,
पलकें भारी नहीं अभी।

अगल-बगल ही प्यादे हैं,
मात हमारी नहीं अभी।

थोड़ा वक़्त कठिन है बस,
पर लाचारी नहीं अभी।

  #प्रदीप कान्त

परिचय : इंदौर में केट कालोनी निवासी प्रदीप कान्त की ग़ज़ल और नवगीत लेखन में विशेष रूचि है। 2012 में ग़ज़ल संग्रह ‘क़िस्सागोई करती आँखें’ प्रकाशित हुआ है। जनसत्ता साहित्य वार्षिकी (2010),समावर्तन,बया, पाखी, कथादेश और इन्द्रप्रस्थ भारती आदि साहित्यिक पत्रिकाओं व दैनिक समाचार पत्रों में गज़लें व नवगीत प्रकाशितहोते हैं। आपकी रचनाएँ कई वेबसाइट्स पर भी संकलित हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।