जरा मेरी भी सुनिए

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punam katariyar
मैं हिंदी, संस्कृत की आत्मजा हूं और भारत के अनेक क्षेत्रीय भाषाओं की बड़ी बहन हूं। विश्व में भारत वर्ष की राष्ट्र भाषा के रूप में जानी जाती हूं।देश और समाज के अनेक प्रणेता तथा साहित्यकार व कलाकार मुझे माध्यम बनाकर अक्षय कीर्ति एंव ऐश्र्वर्य के भागी बनें हैं।बच्चे इतिहास, भूगोल, विज्ञान,खगोल आदि की शिक्षा मेरे माध्यम से प्राप्त करते हैं। हिंदी सिनेमा के सितारे विश्वप्रसिद्ध ऑस्कर समारोह में शामिल होने के लिए निमंत्रित किये जाते हैं।देश विदेश में होने वाले छोटे बड़े समारोहों में हिंदी गीत गानों पर लोग थिरकते एवं मसलती करते नजर आते हैं।
   ‌     मेरा प्राकृत गुण है—सहज,सरल एवं प्रगतिशीलता। संसार के किसी भी भाषा के शब्द मुझ में समाहित हो जाते हैं। अंग्रेजी, लैटिन,जर्मन,अरबी,फारसी,पुर्तगाली, न जाने कितनी भाषाओं के शब्दों को मैंने अपनी पनाह दी
है।!फिर भी आज मैं दुखी हूं। जैसे जैसे देश में समृद्धि आती गई है, मैं सबके नजरों में खटकने लगी हूं।मेरी सहजता एंव प्रगतिशीलता को गंवारपन करार देने की कोशिश होने लगी है। मेरे माध्यम से कमाई करनेवाली हस्तियां अपना साक्षात्कार तक हिंदी में देने में शर्मिंदगी महसूस करते हैं।दस शब्दों की एक पंक्ति में चार शब्द हिंदी के बोलते हैं।ऐसा नहीं कि, उन्हें हिंदी आती नहीं है,अक्सर ऐसा वे जानबूझकर करते हैं। साधारण नौकरी के लिए भी हिंदी के साथ धाराप्रवाह अंग्रेजी को तरजीह दी जाती है।यह दुष्प्रचार किया जा रहा है कि, हिंदी के सहारे राष्ट्रीय -अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर जाना असंभव है। मैं बताना चाहूंगी कि विभिन्न विषयों में हिंदी माध्यम के ख्यातिलब्ध विद्वान देश में हुए हैं।
                       दीगर बात यह है कि, अन्य भाषाओं में आप केवल ज्ञान पाते हैं। किंतु,मैं एक ऐसी भाषा हूं जो आपको संस्कारवान भी बनाती है। वर्तमान परिस्थिति में जिस तरह नैतिक मूल्यों और मानवीय मूल्यों का ह्रास हो रहा है, मेरी अनिवार्यता और भी अपरिहार्य हो गयी है।कबीर, तुलसी,जायसी,मीरा, रैदास आदि के पदों को ह्दयगंम किते बगैर चारित्रिक विकास अवरूद्ध हो गया है। मैं इस देश के बड़े तबके,(अमीर- गरीब)की भावनाओं एंव विचारों को व्यक्त करने की भाषा हूं,एक बड़े भू-भाग की संपर्क की भाषा हूं।  वैसे मेरा प्रादुर्भाव हुए सौ -सवासौ साल ही हुए हैं और मैंने यहां तक का सफर तय किया है।अगर मुझ में कुछ कमियां हैं तो वह आपसी तारतम्य से दूर कर मुझे मेरे पद के अनुरूप उचित सम्मान दिलवाये। हमारे प्रिय पुत्र ‘भारतेन्दु’  ने कहा भी था—–
।। निज भाषा उन्नति ही, सबै उन्नति के मूल।।
                  जय हिंद!जय भारत!!
#पूनम( कतरियार)
नाम-   पूनम (कतरियार)
जन्म-स्थान :हजारीबाग(झारखंड)
शिक्षा–   एम.ए.(हिन्दी साहित्य)
संप्रति  –  लेखन
पता   –   पटना(बिहार)

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।