“अपनी पहली रेल यात्रा वृतांत”

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aparna jha
आज भी याद आता है अपनी वो पहली रेल यात्रा…कक्षा एक की विद्यार्थी मैं, अशोक कुमार के स्वर में वो गीत ‘रेलगाड़ी छुक-छुक-छुक,बीच वाली स्टेशन बोले रुक-रुक-रुक…’ रेलगाड़ी की कल्पना बस इसी गाने ही से तो थी. पता नही उस दौरान वातानुकूलित बोगी की सुविधा थी या नहीं…हम प्रथम श्रेणी कक्ष में प्रवेश लिए. 5 लोग तो हमहीं थे और छठा कोई एक और…फिर बाबूजी ने कक्ष का दरवाजा कुछ इस तरह से अंदर से बन किया जैसे अपने घर के मुख्य द्वार को रात के समय बंद करते हैं.तीन दिन का सफर…जमशेदपुर से दिल्ली और फिर जम्मू…,
स्टेशन पर बिकने वाले हर खाद्य पदार्थ चटखारे ही लगते, ट्रेन का खाना मानो किसी ने ससम्मान आमंत्रित किया हो…नदी,पहाड़,पठार, भोर,साँझ दुपहर हर कुछ नई ही तो लग रही थी.बड़ी बहनों ने जो इतिहास,भूगोल और समाजशास्त्र की किताबें पढ़ीं थी, सब पाठ सदृश्य हो रहे थे…वो देखो एटलस सायकिल का कारखाना,तो वो देखो चीनी मिल इत्यादि-इत्यादि.उस सब समय में यह मस्ती सी लगती थी,पिकनिक सी लगती थी और फिर वही रेल यात्रा कुछ खास से आमबातों सी  हो गई. क्योंकि हम बड़े ही हुए थे रेल की सफर करते हुए.बाबूजी की नौकरी कुछ समय सीमा पर स्थानों का स्थानांतरण नुमाया करती.
जब कॉलेज जाने लगे तो घर में भी एक स्थायित्व सा आ गया.और फिर सालों तक रेल को हमने देखा नहीं. गर्मी या सर्दी की छुटियों में होस्टल वाले विद्यार्थी 15 दिन पहले से रेल टिकट की कतार में लगने लगते तो क्लास बिल्कुल खाली हो जाता.मैं यूँही एक दिन मित्रों के समक्ष हंसी-मज़ाक में बोल उठी_” तुमलोग एक महीने पहले से रेलवे रिज़रवेशन की बातों से बोर करने लगते हो…” तभी एक मित्र मुंह बना कर बोल बैठा…कभी रेल में बैठी भी हो?”बड़ा अटपटा सा लगा था तब,कि वो ऐसा कैसे कह सकता था.बाबूजी तो हमे प्रथम श्रेणी और बाद में वातानुकूलित रेलगाड़ियों में सफर कराते थे जो कि हवाई जहाज के सफर से कम प्रतीत नहीं होता था.हाँ,ये बात तो तय थी कि इधर कुछ सालों से हम कहीं दूर सफर पर गये नहीं.
बचपन में रेल के सफर की दूसरी स्थिति मैंने तब महसूस किया जब मैं विवाह के पश्चात गुड़गांव बसने आई थी.किराए का मकान था.मकान मालिक के दो बच्चे थे, क्रमश: तीसरे और आठवीं कक्षा के छात्र.एक शाम दोनो बच्चे मेरे पास रोमांचित मुद्रा में आये.उनकी खुशी का ठिकाना न’ था.कहने लगे कि वह जीवन में पहली बार रेलगाड़ी भी देखी और सफर भी किया.उनका रोमांच ठीक उसी प्रकार का था जैसा कि मैंने बचपन में अपने पहली रेल यात्रा में महसूस किया था.परन्तु मेरे मन में प्रश्न उठा कि भला ऐसे कैसे हो सकता कि अबतक इन बच्चों ने रेल नहीं देखी थी…फिर त्वरित मन में ख़याल आया कि ये लोग हम जैसे खानाबदोश थोड़े ही हैं कि नौकरी कहीं,घर कहीं, मां-बाप कहीं और ससुराल कहीं…इनका तो सारा ठौर-ठिकाना ही कुछ किलोमीटर की दूरी पर है…तो इन्हें रेलवे स्टेशन तक भी जाने की जरूरत क्यों?
तीसरी स्थिति बचपन के रेलगाड़ी का अनुभव तब हुआ जब बेटा शायद चार साल का रहा होगा.उससे पहले वह अपने टीवी पर टाइनी टीवी देखने का बड़ा शौकीन था.उसके किरदार उसे पूरी तरह से भा गए थे,बल्कि खान-पान,सोने उठने,बोलने के तरीके भी उसके पूर्णतया प्रभावित हो चुके थे.उस चैनल पर एक ट्रेन की भी कहानी चलती थी जिसके किरदार रेल ही थे जो आपस में बात करते थे.एक ट्रेन का नाम तो मुझे याद आ रहा है ‘रिचर्ड्स’ और, तीन और रेल गाड़ी थे.बेटा वह देख कर बड़ा खुश होता था. उसकी समझदारी आने के बाद जब हम अपने गाँव जाने दिल्ली के रेलवे स्टेशन पहुंचे,एक साथ इतनी रेलगाड़ियां वो भी इतनी बड़ी-बड़ी देख वो समझ ही नहीं पाया.और फिर टीवी पर तो गाड़ियां इतनी छोटी-छोटी दिखती…तो फिर ये क्या..! मैं समझ गई, फिर उससे कहा कि ये उनके पापा-मम्मी हैं इसलिये बड़े दिखते हैं और इसके रहने के लिए स्टेशन भी तो बड़ा चाहिये ना! वो तब मान गया.जब गाड़ी के अंदर आया और गाड़ी चलने लगी तो उसके ख़ुशी का ठिकाना ना था…किराए के मकान में,और किरायेदार होकर रहना और छोटी सी गाड़ी में इधर-उधर घूमना….ये सब उसकी कल्पना में भी कहां आने वाले थे.इतनी बड़ी गाड़ी में और इतने लोगों के संग सफर, उसने सोचना बन्द कर दिया,बस खुशियां और खुशियाँ,रोमांच और रोमांच की दुनिया उसमें सिमट कर आ गई थी.
मैंने ये तीन बचपन के उदारण पहली रेल यात्रा वृतांत की इसलिये दी कि मुझे लगता है यदि मैं तीनों की तुलना करूँ, जिसमें परिवेश बच्चों के पलने की बेशक थोड़ी अलग हो परन्तु आनंद और रोमांच रेलगाड़ी और इसके सफर की लगभग हरकिसी में एकही रही.रेलगाड़ी की यात्रा करना यानी कि समाज,संस्कृति को एक साथ जीना,अनेकों मनोभाव/दशा को जीना यानी अपने देश की विवधताओं के गुलदस्ते में,वीथिकाओं में खुद को खो देना और उन पलों में समा जाना जो हमेशा अनेक किस्सों,हकीकत को बयां करती हो और जीवन में कुछ खुशगवार पल बन आपको खुशियां देती रहे.यूँही नहीं रेलगाड़ी,साहित्य सिनेमा, और समाज के लिये प्रिय विषय रही.हर उम्र ने रेलगाड़ी की यात्रा का आनन्द अलग-अलग नज़रिए से लिया, परन्तु बचपन में की गई रेगाड़ी की यात्रा बस ऐसी ही रही, जिसका आनन्द ठीक दादी नानी के मुंह से कही लोक कथाओं और गीतों का आंनद ताउम्र के लिय…
   #अपर्णा झा
परिचय:अपर्णा झा,मिथिलांचल की बेटी,फरीदाबाद निवासी है.इन्होंने विषय द्वै (फ़ारसी एवं museology क्रमशः दिल्ली के जेएनयू एवम राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान)परास्नातक किया है सम्प्रति ये लेखन कार्य से जुड़ी हुई हैं.अनेकों साझा संग्रह एवं राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं,वेब,अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में इनकी लघुकथा,आलेख,एवं रचनाएं प्रकाशित हुई हैं.सांस्कृतिक स्थलों में भ्रमण और हिन्दुस्ततानी संगीत सुनने का शौक है.पूर्व में इन्हें तीन साल का संग्रहालय के क्षेत्र में कार्य करने का अनुभव है.
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।