बापू राष्ट्रपिता तो अटल राष्ट्रनेता

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बापू राष्ट्रपिता तो अटल राष्ट्रनेता हैं कहने में कोई अतिश्योक्त‍ि नहीं हैं बल्क‍ि यथेष्ठ और गौरव की अनुभूति है। वास्त‍‍वि‍कता में यही यथार्थ व मौलिकता है लिहाजा, युगो-युगि‍न तप, कर्म, त्याग और बलिदान से महात्मा गांधी जैसे राष्ट्रपिता और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राष्ट्रनेता के दीदार देश को होते है। हम खुशनसीब हैं कि हमें ऐसे महामनाओं का साया मुनासिब हुआ। वो बापू का अर्पण, सत्य, अंहिसा, स्वदेशी, सादगी, साहस और सहद्वाव व लगाव ही था जिसने परातंत्रता से स्वतंत्रता दिलाकर देश को पि‍त्तृव भाव से एक सूत्र में निस्वार्थता से बांधे रखा। परणि‍ती में सारे वतन ने उन्हें राष्ट्रपिता कहा, याद रहे ये कोई मानद् उपाधि‍ नहीं है अपि‍तु देशवासियों का अपने बापू के प्रति सच्चा सम्मान था।

 वैसे ये अटल जी का समर्पण, नेतृत्व, राजनीति, समरसता, कर्तव्यनिष्ठा, राष्ट्रवादि‍ता और भाषा व भाषण की अटूता ही तो है जो सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा जग में अलौकिक हैं। इस मंत्रमुग्धता के साथ दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रि‍क देश ने पक्ष विपक्ष की दीवारों से परे राजनीति के अजातशत्रु अटल जी को अपना सर्वमान्य नेता माना। जो अजर, अमर और अटल होकर क्षि‍तीज पर सदा-सर्वदा दैदीप्यमान होते रहेंगा।
शायद ही जगत में ऐसे बिरले उद्वरण देखने को मिले जहां राष्ट्रपि‍ता और राष्ट्रनेता के प्रति अथाह प्रेम और विश्वास हो। ये तो अर्पण की भूमि है, तर्पण की भूमि है,वंदन की भूमि और अभि‍नंदन की भूमि है इसीलिए यहां राष्ट्रपिता भी है और राष्ट्रनेता भी है जिनका कहा गया एक-एक वाक्य कथनी भी है और करनी भी हैं।

अब बारी हमारी व आने वाली पीढी की है कि राष्ट्रपिता की भांति राष्ट्रनेता की अमिट छाप को अपने मानस पटल पर स्मरणि‍त रखकर अंगीकार या ओझल करते हैं। विषाद स्थि‍ति ऐसी आन पड़ी कि हमसे हमारे राष्ट्रनेता जुदा होकर जिदंगी का पाठ पढ़ाकर चले गए। सहगमन देखना ला‍जमी होगा कि हम सीखे सबक के राजपथ पर कितना चल पाते हैं, चल पढ़े तो समझो अपने जननायक को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर दी। नहीं तो यादों के पन्ने पुन: दोहराने की जरूरत आन पड़ेगी। निर्विवाद जय-जयकार से काम नहीं चलने वाला ये तो बिदाई है, अशेष स्मरण हैं और श्रृद्धा हैं यह अपनी जगह जायज है असलियत में तो वंचित, पीड़ित,शोषि‍त, दलित और देश की रक्षा व विकास में जुटना ही मूल मकसद हैं, तभी हम अटल  भारत रत्न के सच्चे उत्तराधि‍कारी साबित होंगे।

वीभत्स काल की काली छाया ने हमसे हमारे युगपुरूष को छीन लिया, ना चाहते हुए भी हमने उन्हें पंचत्तव में विलिन कर दिया। निस्पृह करते क्यां इसके सिवाय हमारे पास कुछ जरिया ही नहीं था आखि‍र ईश्वर को भी उनकी सेवा का लोभ था। तभी तो बड़ी रौनक होंगी अब भगवान के दरबार में एक फरिश्ता पहुंचा है जमीं से आसमान में। ऐसी अपूरणीय छति पं. अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म ग्वालियर में 1924 को कृष्णादेवी-कृष्णा बिहारी वाजपेयी के घर हुआ। पिता एक कवि और स्कूल मास्टर थे। अटल जी ने यही के गोरखी शासकीय उच्च्तर विद्यालय से स्कूल और विक्टोरिया कॉलेज से स्नातक की शि‍क्षा ग्रहण की। बाद में कानपुर के दयानंद साइंस वैदिक महाविद्यालय से स्नातकोत्तर की उपाधि‍ प्रथम श्रेणी प्राप्त की। 1939 में आप एक स्वयंसेवक की तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हो गए और 1947 में संघ के पूर्णकालिक स्वयंसेवक बन गए। विभाजन के दौर में विधि‍ की पढ़ाई अधर में छोड़ कर प्रचारक के रूप उत्तरप्रदेश चले गए वहां पं. दीनदयाल उपाध्याय के साथ राष्ट्रधर्म ,पांचजन्य, स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे तत्कालिन ख्यातिलब्ध अखबारों का संपादन किया। लेखनी की धार से लिखी गई मेरी 51 कविताएं का मधुर गुंजार आज भी घर-घर में होता हैं।

 कविमन अटल जी पहली बार बलरामपुर से सांसद चुने गए और विभि‍न्न 6 जगहों से 10 बार लोकसभा के सदस्य निर्वाचि‍त होते रहे। आपने दो बार राज्यसभा का भी प्रतिनिधि‍त्व किया है। साथ ही जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य और अध्यक्ष के रूप में कुशल नेतृत्व किया। बानगी में 2 से 182 तक का सफर पार्टी ने तय किया जो 282 तक आ पहुंची है। इस दौर में 1977 में जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री का यादगार कार्यकाल आज भी कालजयी बना हुआ है। दरम्यान संयुक्त राष्ट्र संघ में दिया गया हिंदी का भाषण हृदयंगम हैं। आपके सुशासन और कार्यपालन से वशीभूत होकर आपको 1992 में पदम् विभूषण , 1993 डी. लिट, 1994 लोकमान्य तिलक पुरस्कार, बेस्ट संसद, भारत रत्न पं. गोवि‍न्द वल्लभ पंत पुरस्कार, 2015 भारत रत्न और बंग्लादेश का सर्वोच्च लिबेरेशन वॉर सम्मान इत्यादि से सम्मानित किया गया।

आगे बढ़ते हुए 1996, 1998  और 1999 से 2004 तक प्रधानमंत्री के तौर पर देश का उल्लेखनीय व ऐतिहासिक नेतृत्व किया जिसका अनुसरण बरसों बरस तक होना नामुमकिन लगता हैं। स्तुत्य, देशहित में प्रत्युत कार्यो की ओर देखे तो पोखरण परमाणु परीक्षण, कावेरी जल विवाद निपटारा, स्वर्णि‍म चतुर्भुज परियोजना, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, सूचना प्रौद्योगिकी का संजाल और कोकर्ण रेल्वे समेत अन्य महत्वाकांक्षी योजनाओं व अभि‍यानों की बेहिताशा श्रृखंला हैं जिनके बारे में जितनी बात की जाएं उतनी ही कम हैं। ये ही राजनीति का अटल सत्य हैं। अब युगऋषि‍ के बारे में लिखना सूरज को रोशनी दिखाने के समान हैं अंतत: अटल जी की एक ओजस्वी कविता के साथ…..बाधाऍं आती हैं आऍं घि‍रें प्रलय की घोर घटाऍं पॉवों के नीचे अंगारे सिर पर बरसें यदि ज्वालाऍं निज हाथों में हंसतें-हंसतें जलना होगा कदम मिलाकर चलना होगा।

  #हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व विचारक

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विषय-दृष्टि

Sat Aug 18 , 2018
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Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।