शख्सियत: अभिमन्यू अनत

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🌹🌹अभिमन्यू अनत🌹🌹
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9 अगस्त 1937 में मॉरीशस के उत्तर प्रान्त के त्रियोल गाँव मे जन्मे अभिमन्यू अनत जी को मॉरीशस के हिंदी कथा में “साहित्य सम्राट” का दर्जा प्राप्त था।
उपन्यास,कहानी, कविता,निबंध पर इनको समान अधिकार प्राप्त था।हिंदी साहित्य की श्री दृष्टि में इनका अमूल्य योगदान रहा।
अभिमन्यू अनत का कविताकोश भारतीय काव्य का विशालतम और अव्यवसायिक संकलन है।साथ ही साथ इनकी कृतियों के लिए अनेकानेक सम्मान से भी इन्हें सम्मानित किया गया है।जिनमे मुख्य सम्मान-साहित्य अकादमी,सोवियत लैड नेहरू पुरस्कार,मैथिलीशरण गुप्त सम्मान,यशपाल पुरस्कार,जन संस्कृति सम्मान,उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान सम्मान प्रमुख हैं।
इसके अतिरिक्त श्री अभिमन्यू जी अनेक वर्षों तक महात्मा गाँधी संस्थान की हिंदी पत्रिका “वसंत”के संपादक एवं सृजनात्मक लेखन और प्रकाशन विभाग के अध्यक्ष रहे।साथ ही साथ “वसंत और रिमझिम” बाल पत्रिका के संस्थापक भी रहे।तीन वर्ष तक युवा मंत्रालय में नाट्य कला विभाग में नाट्य प्रशिक्षक और 18 वर्ष हिंदी अध्यापन कार्य मे संलग्न रहे।
खास उपलब्धियों में उनकी लगभग छोटे बड़े उपन्यासों की संख्या 35 से 40 रही है ।जिसमे कुछ एक के नाम इस प्रकार हैं-
जम गया सूरज,तीसरे किनारे,लहरों की बेटी, लाल पसीना,तपती दोपहरी,और नदी बहती रही,शेफ़ाली, गाँधी बोले थे,पर पगडंडी मरती नही,अस्ति अस्तु,कुहासे का दायरा इसके अतिरिक्त भी अन्य बहुत से उपन्यास चर्चित रहे।जिनमे से प्रमुख रहा”लाल पसीना”जिसे काव्यात्मक उपन्यास माना जाता है।
श्री अभिमन्यू अनत जी शांत स्वभाव,सौम्य व्यक्तित्व के सरल स्वरूप की विशेषता के साथ ही हिंदी जगत के शिरोमणि थे।उपन्यास के क्षेत्र में मॉरीशस का”उपन्यास सम्राट”माना जाता है।
कार्य क्षेत्र मॉरीशस में इनकी छवि एक विद्रोही कवि के रूप में थी।जनमानस की भावना के अद्भुत चितेरे थे।इनकी लेखनी साक्ष्य थी आम जन की भावनाओं को व्यक्त करने में।
हिंदी साहित्य और अभिमन्यू जी एक दूसरे के पूरक थे।
इनके उपन्यासों की पृष्ठभूमि मॉरीशस के देहातों का जीवंत उदाहरण है जो उसकी पृष्ठभूमि पर ही निर्मित है।अनेक भाव पूर्ण और मर्मस्पर्शी दृश्यों का सजीव प्रस्तुति करण इनके उपन्यासों की विशेष विशेषता रही है।जिसको इन्होंने बड़े ही सहज और सरल ढंग से उकेरा है।
45 वर्षों से अधिक समय तक हिंदी साहित्य को अपना भरपूर योगदान दिया।
श्री अभिमन्यू बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रतिभा सम्पन्न लेखक रहे।अनेक विधाओं में रचना इनकी विशेषता रही तथा सभी पर इनकी पकड़ मजबूत और सहज रही।
ज्यादातर रचनाएँ जन जीवन से जुड़ी मन मस्तिष्क पर सहज रूप से छा जाने वाली,हृदय की गहराइयों तक उद्वेलित करने वाली,भाव विभोर करने वाली,सोचने पर विवश करने वाली रचनाएँ जो मानव जीवन के समग्र अंश का सुंदर सहज सरल समिश्रण इनकी रचनाओं में परिलक्षित होता रहा है।
मानव जीवन के सभी पहलू ईर्ष्या,प्रेम,घृणा,क्रोध,राग ,विराग,दमन, शोषण,मैत्री, मनुहार, सभी भाव का परिष्कृत रूप रचनाओं में समावेश है जो साहित्य को सजीव रूप प्रदान करता है।
श्री अभिमन्यू जी की कई रचनाओं का फ़्रेंच अनुवाद भी हुआ है। देश भर की लगभग 80 पत्र पत्रिकाओं में इनकी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है।
“लाल पसीना”
मानवाधिकारों की उपेक्षा एवं मानवीयता के निर्दालन के प्रति संघर्ष का जीवंत रूप प्रस्तुत करता है।
ये उपन्यास मॉरीशस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित है।
भारतीय मजदूरों को फ्रांसीसी और ब्रिटिश उप निवेशवादी मॉरीशस ले गए थे संभवतः जिन्हें हम आज गिरमिटिया मजदूर के नाम से जानते हैं।
वो भोले भाले निरीह मजदूर जो अपने ज़रूरत के थोड़ा समान ले कर परिवार के साथ मॉरीशस पहुँच गए।
अथक परिश्रम कर वहाँ के चट्टानों को तोड़ समतल धरती का निर्माण किया।मेहनत के बलबूते धरती को उपजाऊ बनाया जो सोना उगलने लगी। उनके ही खून पसीने से धरती समृद्ध हुई पर उन्हें जानवरों से भी बदतर जीवन मिला।प्रकृति के सभी घटकों को अपना अधिकार प्राप्त था सिवाय इन मजदूर श्रमिको के।
शोषण करने वालों ने इन्हें कभी मानव नही माना उनके सभी अधिकारों को जब्त कर लिया था।व्यैक्तिगत, सामाजिक,राजकीय,आर्थिक,
धार्मिक,भाषिक संस्कृति सभी अधिकारों से वंचित ये वर्ग निर्धनता की पराकाष्ठा को छू रही थी।बेदना का हर रूप समाहित था इनके जीवन मे।
इन्ही सभी परिस्थितियों को बड़े ही भावपूर्ण तथा परिष्कृत कर सभी परिदृश्यों का मार्मिक अंकन अभिमन्यू जी ने अपनी इस रचना में किया है।
“लाल पसीना” शीर्षक
जिन बंधुआ मजदूरों ने अपने खून पसीने से मॉरीशस की भूमि को सबल और समृद्ध बनाया उन्हें ही अपने मानव होने के अधिकारों से वंचित होना पड़ा।
यथार्थ अंकन।
इस प्रकार अनेक रचनाओं के प्रणेता अभिमन्यू अनत जी की कृतियों को साहित्य के लिए अनूठा उपहार सहृदयता के साथ देना माना जा सकता है।इस उपहार दान से साहित्य क्षेत्र हमेशा उनका ऋणी रहेगा।
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अलका त्रिपाठी”विजय”

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लखनऊ

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।