अनुभव के आगे सब फेल है

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sanjay

दोस्तों हम और हमारे पूर्वज जो कीज्यादा पढ़े लिखे नहीं होते थे न ही ज्यादाडिग्रियां उन लोगो के पास होती थी /परन्तु फिर भी वो लोग आज केविध्दमानो से बहुत ज्यादा ज्ञानी हुआकरते थे और उन लोगो में  व्यावहारिक,वहारिक के साथ ही सामान्य ज्ञान हुआकरता था/ और वो लोग बड़ी बड़ीव्यावसायिक संस्थाओ (इंस्टुटो ) से नहींपढ़े होते थे / वो लोग तो गुरुकुल याशासकीय पाठशाला में जहाँ पर ताड़पत्तीपर बैठते थी / आज कल के जैसे बड़ीबड़ी महाविधालयो और प्रोफेसनलसंस्थाओ जैसे नहीं थे / आज के बच्चो सेयदि उनकी तुलना की जाये तो गणित केजोड़ घटना को वो लोग मौखिक बता देतेहै और २१ सदी के बच्चे बिनाकैलकुलेटर के कुछ भी नहीं कर पाते /और व्यवहारिक ज्ञान की तो बात ही मतकरो / अब आप ही बताओ की कौनज्यादा पड़ा लिखा है वो या ये आज के?

दोस्तों जो पहले के लोग पड़ते थे उन्हेंअपने जीवन में उतारते थे और आज केबच्चे कैसे पड़ते है हमें और आप कोबताने की जरूरत नहीं है / यदि उन सेपीछे सालो में पढ़े विषय से सम्बंधितकोई प्रश्न पूछ लिया तो मालूम है कीउत्तर क्या मिलेगा …? अपनी बात कोसमझने के लिए एक सच्ची घटना आपको बताता हूँ इससे आप समझ जायेंगेकी पढाई लिखे से ज्यादा अनुभव कामआता है और वो व्यक्ति भले ही दो क्लासही क्यों न पड़ा हो ? परन्तु उसका तजुर्बाआज कल के बड़े बड़े पीएचडी होल्डरसे भी ज्यादा है /

 

एक बड़े परिवार का लड़का विदेश सेउच्च तकनीकी पढाई लिखे करके अपनेदेश वापिस आया और उसने यहाँ परएक कारखाना लगाने का मन बनायाऔर घर वालो ने उसे लगाने की इजाजददे दी / काम शुरू हुआ सब कुछ बनाकरतैयार हो गया / विदेश मशीने भी आ गईऔर अब उन्हें फिटिंग करना था / उसमशीन फिट करने के दौरान एक बड़ीसमस्या आ गई / क्योकि मशीन एकभारी भरकम थी और उसे 30 फीट गहरेगढ्ढे के तल में उतार कर बैठना था / जोकी बहुत बड़ी चुनौती थी / अगर मशीनठीक से नहीं बैठाया गया तो फाउंडेशनऔर मशीन दोनों को बहुत नुकसानउठाना पड़ता। आपको बता दें कि ये वोसमय था जब बहुत भारी वजन उठानेवाली क्रेनें हर जगह उपलब्ध नहीं थीं /जो थीं वो अगर उठा भी लेतीं तो गहरेगढ्ढे में उतारना उनके बस की बात नहींथी।

बड़े बड़े इंजीनियरों को देश और विदेशके बुलाया गया / परन्तु समस्या कासमाधान किसी के भी पास नहीं था /कुल मिलकर यदि देखा जाये तो साराका सारा पैसा और समय सब व्यर्थ जानेवाला सा लगाने लगा /

एक दिन एक बनिया जो की नगर सेठ केयहाँ पर खाने पीने का सामान भेजता थातो वो पैसे लेने के लिए आया और देखाकी सेठ जी और उनका पुत्र जो कीविदेश से पढाई करके वापिस आया बहुतही परेशान है, तो बनिए ने पूछ लिया क्याबात है जी बहुत दुखी दिख रहे हो ? तबउन्होंने सारी बात बताई / बनिया बोलाक्या में देख सकता हूँ / मरता क्या नकरता , उन्होंने बनिए को प्लांट औरमशीन और वो गद्दा दिखा दी जहाँ परउस बड़ी मशीन को बैठना था / साथ हीसेठ के लड़के ने बनिए से कहाँ की चाचाजी ये किराने की दुकान नहीं है , जोआप समझकर समस्या को सुलझा दोगेहम बड़े बड़े इंजिनियर लोग हार गए हैऔर कुछ भी नहीं कर सकते तो आपक्या करोगे /

बनिए ने सेठ जी से कहाँ क्या में एक बारप्रत्यन करू ? वैसे भी सभी ने हार मानली है तो ? पिता पुत्र दोनों कहाँ देखो /अब बात आई बनिए की तो उसनेइंजीनियरों से कुछ सवाल पूछे और उनलोगो ने सब के उत्तर दिए / अंत में एकबात और पूछी की क्या इस मशीन कोपानी से कुछ हानि या ख़राब हो सकतीहै ? तो सारी इंजीनियरों ने कहाँ नहीं /पानी से इस मशीन को कोई भी खतरानहीं है / तब तो बनिए ने कहाँ आपकाकाम में कर सकता हूँ परन्तु मेरी एकशर्त है की यहाँ पर कोई भी इंजिनियरऔर आप के साथ आपका पुत्र भी यहाँपर नहीं आएगा जब तक में काम खत्मन कर लू , कहते न की मरता क्या नहींकरता और बात मान ली  / सभी लोगोको बड़ा ही आश्चर्य हो रहा था की ये क्याकरेगा  / काम प्रारम्म किया बनिए ने वर्फकी फैक्टरी से  20-25 ट्रक में वर्फ कीसिल्ली को मंगवाया और उन्हें गढ्ढे मेंभरना शुरू कर दिया। जब बर्फ से पूरागढ्ढा भर गया तो उन्होंने मशीन कोखिसकाकर बर्फ की सिल्लियों के ऊपरलगा दिया। इसके बाद एक पोर्टेबलवाटर पंप चालू किया गया और गढ्ढे मेंपाइप डाल दिया जिससे कि पानी बाहरनिकाला जा सके / बर्फ पिघलती गयी,पानी बाहर निकाला जाता रहा, मशीननीचे जाने लगी।

4-5 घंटे में ही काम पूरा हो गया औरकुल खर्चा 1 लाख रुपये से भी कमआया मशीन एकदम अच्छे से फिट होगयी / अब बनिए ने सभी लोगो कोबुलावा भेजा की आपकी मशीन फिट होगई ही, आकर देख लो / सारे बड़े बड़ेइंजिनियर और टेक्नीशियन आये तोदेखकर एक दम से दंग रह गए / वास्तवमें बिज़नेस बड़ा ही रोचक विषय है / येएक कला है, जो व्यक्ति की सूझबूझ,चतुराई और व्यवहारिक समझ पर निर्भरकरता है।

मुश्किल से मुश्किल समस्याओं का भीसरल समाधान खोजना ही एक अच्छेअनुभव वाले इंसान की पहचान है /बनिए ने साबित कर दिया की उच्चशिक्षा से कुछ नहीं होता , जब तक कीउसे व्यावहारिक ज्ञान न हो / अब आपही बताओ की श्रेष्ठ कौन है ?

इसलिए अपने बड़े बूड़ो से ज्ञान लेनाचाहिए और उनके अनुभवों को अपनेजीवन में उतरना चाहिए। यदि आप उन्हेंआदर और सम्मान दोगे तो जीवन मेंकभी भी परेशानियां तुम्हे परेशान नहींकर सकती है /

#संजय जैन

परिचय : संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं पर रहने वाले बीना (मध्यप्रदेश) के ही हैं। करीब 24 वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं बहुत सारे अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहती हैं।ये अपनी लेखनी का जौहर कई मंचों  पर भी दिखा चुके हैं। इसी प्रतिभा से  कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा इन्हें  सम्मानित किया जा चुका है। मुम्बई के नवभारत टाईम्स में ब्लॉग भी लिखते हैं। मास्टर ऑफ़ कॉमर्स की  शैक्षणिक योग्यता रखने वाले संजय जैन कॊ लेख,कविताएं और गीत आदि लिखने का बहुत शौक है,जबकि लिखने-पढ़ने के ज़रिए सामाजिक गतिविधियों में भी हमेशा सक्रिय रहते हैं।

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Founder and CEO

Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।