*हास -परिहास*

Read Time4Seconds

chaya saxena

मोबाइल को चार्ज पर लगा चैटिंग का आनन्द उठा ही रही थी तभी  अचानक से बैटरी लो का संकेत हुआ और जब तक मैं कुछ समझती मोबाइल एक मीठी सी आवाज़ के साथ ऑफ हो गया । अब तो एक  बेचारगी की स्थिति हो गयी मेरी, तभी ध्यान आया कि अपने पड़ोसी से मुलाक़ात की जाए जो *फ्री में एवलेबल रहते हैं पर फ्री नहीं रहते* अरे भई  पत्रकार जो ठहरे कुछ न कुछ करते ही रहते हैं ज्यादातर तो टी. व्ही. के सामने ही देखा जाता है उनको ।

फोन पर वे किसी को बड़े प्यार से समझा रहे थे, यह सर्वोत्तम है किन्तु अधिक व्यक्ति होने से एवं समय कम होने से है बिना नाम के देने पड़े, भविष्य में नाम वाले ही प्रतीक चिन्ह देंगे।

तभी फोन के दूसरी ओर से किसी ने कहा हमें इतनी खुशी न दें कि हम  बर्दाश्त ही न कर सकें , चेहरा तो फिर पीलिया से ग्रसित दिखने लगा पत्रकार महोदय का, मैंने धीरे से टोकते हुए कहा कुछ गड़बड़ हुआ क्या ?

उन्होंने हाथ के इशारे से मौन रहने का संदेश दिया  सो मैंने चुप रहने में ही भलाई समझी ।

फोन पर वार्तालाप को विराम देते  हुए उन्होंने कहा आप  दो चार कविता सुना ही दीजिए कुछ समस्याओं  का हल भी मिल जाएगा ।  फेसबुक में पढ़ा कि आपको कोई सम्मान मिला है, कोई अधिकारी बन  गयीं हैं आप ।

बुझे मन से मैंने कहा हाँ जब तक कोई शिरा न खींच दे , मणि तो आप सब हैं मैँ तो एक शिरा हूँ दूसरे शिरे पर लोग पदों  को छीनने के लिए लालायित बैठे हैं ऐसे ही लोगों के लिए क्या खूब कहा गया है –

*जब भगवान दे खाने को*
*जाए कौन कमाने को*

मैंने कहा भगवान से खजूर और ताड़ी याद आ गयी…..
अब खजूर पे मत चढ़ा देना मुझको ।

वो मिसेज शर्मा भी तो काव्य पाठ करतीं  हैं एक कार्यक्रम में देखा था, वहाँ तो बिल्ला लगाएँ थीं, मुझे देखा तो मुस्कुराकर  अभिवादन किया  मेरा,   काव्य पाठ वीर रस से शृंगार  रस तक  पहुँच गया , श्रोता भी गजब के थे, तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा पंडाल गूंज उठा,  एक कवि की कल्पना तो देखिए उसने कहा *ताड़ के नीचे खड़ा कर देंगे, ताड़ी का मजा मिलेगा ।*

उन्होंने बात को बदलते हुए कहा आपकी बड़ी दीदी को संरक्षिका होना चाहिए काव्य सम्मेलन का ।  हम कब तक पुरानी यंग लेड़ी की वापसी का इन्तज़ार करेंगे,  बहुत ही सुस्त व भयंकर कामचोर हैं अभी तक डॉकूमेंट भी  नहीं भेजा ।

  व्यंग्य लिखने हेतु टॉपिक ढूंढ रहे थे मिल गया पत्रकार महोदय ने कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए कहा । आप भी मेरे अखबार में जुड़ जाइए खूब रचनाएँ प्रकाशित होंगी ।

अपने दो चार व्यंग्य दे दीजिए, काव्यपाठ के बीच- बीच में हास परिहास के काम आएंगे जब श्रोताओं का मन भटका तो उनको रोकने के लिए सुना दिया  करेंगे , लोग भी कमाल के होते हैं कविता से  तो ऊब जाते हैं पर हास्य मिश्रित चुटकुले को सर आँखो पर लेते हैं अब कौन पूँछे कि अमा कविता सुनने को आए थे आप या यूं ही गम ग़लत करने को तशरीफ का टोकरा लेकर हाज़िर हो गए ।

किसी और को ढूंढ लीजिये वरना मेरा तो  ……
मंत्र है ही ।

*बने रहो पगला*
*काम करेगा अगला ।*

अनुभवी लोगों का सूत्र है ये , अरे कुछ देर पहले ताड़ी की बात निकली थी आप कैसे जानती हैं ?
क्या तुम्हारे यहाँ निकाली जाती है ?

संभव तो नहीं है पर कहावतों के बिना कोई बात प्रभावी होती ही नहीं सो बीच – बीच में फिट कर देती हूँ मंद- मंद मुस्कुराते हुए कहा ।

चलो कुछ तो टाइम पास हुआ अब चलती हूँ मोबाइल भी चार्ज हो गया होगा ।

बहन जी तो अभी तक क्या सत्संग हो रहा था ।
अरे वो ताड़ी की बात याद आई हमारे इलाके में
बरसात में खूब बिकती है।

पढ़ती तो हमेशा थी आपका लिखा व्यंग्य पेपर में पर  लिखने में अब सुधार हुआ है ।

व्यंग्य माला निकल जायेगी एक कहिए तो अपनी संस्था में बात करूँ ।

सिग्नेचर जब करना हो तो बताइयेगा कर देंगे जाकर,  कहाँ पर ?

शुभकामना पत्र पर , अलंकारिक भाषा में आप लिख लेना मेरी तरफ़ से ….मुस्कुराते हुए चंद पंक्तियों के साथ विदा ली ……

गीतिका जो कवि रचे , संगीत सँग मधुहास हो ।
नेह रंग  में   रंग सभी, करते  चलें  परिहास हो ।।
भावनाओं को समेटे,   मान  अरु  सम्मान  नित ।
वक्त  चाहें  कुछ  रहे,  छाया नवल उत्साह  हो ।।

#छाया सक्सेना ‘ प्रभु ‘

परिचय: नाम- छाया सक्सेना ‘ प्रभु ‘
स्थान- रीवा (म.प्र.) , शिक्षा-बी एस सी बी एड, एम ए राजनीति विज्ञान, एम फिल ( नीति  शोध )  लेखन विधा- सभी विधाओं पर लेखन, प्रकाशित पुस्तकें- साझा संकलन, उपलब्धि- कई साझा संकलन का सम्पादन, ई पत्रिका की प्रबंध संपादक, साहित्य संगम संस्थान की कोषाध्यक्ष, डाक का पता- जबलपुर(मध्यप्रदेश)

0 0

matruadmin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

एक गजल

Wed Jul 4 , 2018
कभी चांदी कभी सोना कभी मोती दिखाती है ये दुनिया है हमारी मुफलिसी को आजमाती है। कभी पीली, कभी नीली, कभी काली हुई औरत मगर वो खिलखिलाने का सदा जोखिम उठाती है। रुलाती है ,हंसाती है, बाताती है कई किस्से किताबों की अलग दुनिया सखी सबको लुभाती है। कभी जोङे […]

Founder and CEO

Dr. Arpan Jain

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।