सोच रहा हूँ

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rupesh jain

एक दिन मेरे दोस्त को, मैं लगा गुमसुम

बोला वो, क्या सोच रहे हो तुम

बातें बहुत सी हैं

सोच रहा हूँ, क्या सोचूँ, बोला मैं।

अलग-अलग हैं कितनी बातें

क्या-क्या हैं नए सन्दर्भ

विषयो की बिबिधता इतनी

चुनना बना जी का जाल।

दुःख पे जाऊ

जो लम्बे समय तक रहता है याद

या सुख पे, जो विस्मृत हो जाता है जल्दी

यादो से हर बार।

पिछले करीब समय में, क्या मिला मुझे

जोर शायद इसपे डालूँगा

परन्तु संशय बना है अभी भी

क्या यही है सही विषय सोचने का।

झंझावात ये जटिल

झकझोर रही कपाल

सचमुच सोचना क्या है मुझे

प्रश्न है ये जंजाल।

#डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।