जीवन संघर्ष-प्रतिस्पर्धा

deelip sinh
सर्दी-गरमी व वर्षा से, 
क्या घबराना,क्या घबराना ?
नव अंकुर से नए विहग से, 
सीखें शीश उठाना।
एक बीज जब घर से बाहर,
खेतों में बोया जाता।
संगी साथी साथ न होते, 
निपट अकेला हो जाता।
नमी और गर्मी पाकर के,
बीज प्रफुल्लित हो जाता।
बीज चोल का तोड़ आवरण,
नव अंकुर तब शीश उठाता।
तब ऊँचा आकाश उसी का,
शीश चूमता दीवाना।
नव अंकुर से नए विहग से,
सीखें शीश…ll 
अपनी जड़ें जमाकर गहरी,
धरती से पानी लेता।
लेता वायु वायुमण्डल से,
उल्टे हवा सुहानी देता।
झूम-झूमकर नित मस्ती में,
रंग धरती को धानी देता।
नव अंकुर वट वृक्ष बन गया,
जो धरती का छोटा बेटा।
झूम-झूमकर हमें सिखाता,
फूलों-सा मुस्काना।
नव अंकुर से नए विहग से, 
सीखें शीश…ll 
प्यारा-सा नव विहग एक खग,
निकल घोंसले से आता।
देख हवा का अधिक तेज रुख,
पहले थोड़ा-सा घबराता।
फिर हल्का-सा पंख खोलकर, 
फुदक-फुदक कर अजमाता।
छोट-छोटी कठिन उड़ानें,
उड़ता उड़कर फिर गिर जाता।
मगर एक दिन वही नव विहग,
खूब समझता उड़ जाना।
नव अंकुर से नए विहग से,
सीखें शीश…ll 
घर से बाहर जिस दिन पहला,
कदम आपका पड़ता है।
घबराहट-सी मन में होती,
मन जाने क्यूं डरता है।
माँ का आँचल गोद पिता की,
न तजने का मन करता है।
पर बाहर इस वृहद धरा पर, 
ही निज भाग्य संवरता है।
कुछ पाने की खातिर कुछ सुख,
पड़ता हमें गँवाना।
नव अंकुर से नए विहग से,
सीखें शीश…ll 
एक-एक दाने से देखो,
उगती फसल करारी है।
एक-एक खग निकल धरा पर,
करते मारा-मारी है।
इक-दूजे से लड़ना हो जाती,
तब इनकी लाचारी है।
है जीवन संघर्ष यही प्रिय,
लड़िए जीत तुम्हारी है।
यही प्रतिस्पर्धा है प्यारे,
तुमको यही बताना।
नव अंकुर से नए विहग से,
सीखें,सीखें शीश उठाना।
यह जीवन संघर्ष उचित है,
न इसमें घबराओ तुमl 
सम्बल रहे सत्य का हरदम,
अनुचित न अपनाओ तुमl 
रहे भरोसा खुद पर हरदम,
खुलकर यार बनाओ तुमl 
नहीं शत्रु है कोई तुम्हारा,
प्रेम से बाहर जाओ तुमl 
देकर प्यार,प्यार मिलता है,
यह विश्वास जगाना।
नव अंकुर से नए विहग से,
सीखो शीश उठानाll 
#दिलीप सिंह ‘डीके’

matruadmin

Next Post

आठवीं अनुसूची और हिंदी के मुद्दे पर गृहमंत्री से मिले साहित्यकारगण

Tue Dec 12 , 2017
 मुंबईl संविधान की आठवीं अनुसूची और हिंदी के मुद्दे पर गृहमंत्री राजनाथसिंह से प्रतिनिधि मंडल ने मुलाकात की। इसका नेतृत्व श्याम परांडे(महासचिव अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद) ने कियाl उनके साथ पूर्व राजदूत वीरेंद्र गुप्ता,वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.अशोक चक्रधर एवं डॉ.राकेश पांडेय आदि रहे। गृहमंत्री से देश की भाषाई अखंडता पर चर्चा हुई और […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।