सर्दी-गरमी व वर्षा से,
क्या घबराना,क्या घबराना ?
नव अंकुर से नए विहग से,
सीखें शीश उठाना।
एक बीज जब घर से बाहर,
खेतों में बोया जाता।
संगी साथी साथ न होते,
निपट अकेला हो जाता।
नमी और गर्मी पाकर के,
बीज प्रफुल्लित हो जाता।
बीज चोल का तोड़ आवरण,
नव अंकुर तब शीश उठाता।
तब ऊँचा आकाश उसी का,
शीश चूमता दीवाना।
नव अंकुर से नए विहग से,
सीखें शीश…ll
अपनी जड़ें जमाकर गहरी,
धरती से पानी लेता।
लेता वायु वायुमण्डल से,
उल्टे हवा सुहानी देता।
झूम-झूमकर नित मस्ती में,
रंग धरती को धानी देता।
नव अंकुर वट वृक्ष बन गया,
जो धरती का छोटा बेटा।
झूम-झूमकर हमें सिखाता,
फूलों-सा मुस्काना।
नव अंकुर से नए विहग से,
सीखें शीश…ll
प्यारा-सा नव विहग एक खग,
निकल घोंसले से आता।
देख हवा का अधिक तेज रुख,
पहले थोड़ा-सा घबराता।
फिर हल्का-सा पंख खोलकर,
फुदक-फुदक कर अजमाता।
छोट-छोटी कठिन उड़ानें,
उड़ता उड़कर फिर गिर जाता।
मगर एक दिन वही नव विहग,
खूब समझता उड़ जाना।
नव अंकुर से नए विहग से,
सीखें शीश…ll
घर से बाहर जिस दिन पहला,
कदम आपका पड़ता है।
घबराहट-सी मन में होती,
मन जाने क्यूं डरता है।
माँ का आँचल गोद पिता की,
न तजने का मन करता है।
पर बाहर इस वृहद धरा पर,
ही निज भाग्य संवरता है।
कुछ पाने की खातिर कुछ सुख,
पड़ता हमें गँवाना।
नव अंकुर से नए विहग से,
सीखें शीश…ll
एक-एक दाने से देखो,
उगती फसल करारी है।
एक-एक खग निकल धरा पर,
करते मारा-मारी है।
इक-दूजे से लड़ना हो जाती,
तब इनकी लाचारी है।
है जीवन संघर्ष यही प्रिय,
लड़िए जीत तुम्हारी है।
यही प्रतिस्पर्धा है प्यारे,
तुमको यही बताना।
नव अंकुर से नए विहग से,
सीखें,सीखें शीश उठाना।
यह जीवन संघर्ष उचित है,
न इसमें घबराओ तुमl
सम्बल रहे सत्य का हरदम,
अनुचित न अपनाओ तुमl
रहे भरोसा खुद पर हरदम,
खुलकर यार बनाओ तुमl
नहीं शत्रु है कोई तुम्हारा,
प्रेम से बाहर जाओ तुमl
देकर प्यार,प्यार मिलता है,
यह विश्वास जगाना।
नव अंकुर से नए विहग से,
सीखो शीश उठानाll
#दिलीप सिंह ‘डीके’