पुस्तक समीक्षा- बम- बम चिक- चिक गिली- गिली पाशा (बालगीत)

पुस्तक : बम- बम चिक- चिक गिली- गिली पाशा
(बालगीत)
लेखिका : निशा कोठारी
प्रकाशक : शारदेय प्रकाशन( लखनऊ)
कीमत : ₹300 मात्र

कहते हैं कि छल- कपट ,दिखावे और पाखंड से भरी इस दुनिया में निश्छल और सरल होना सबसे कठिन काम है ।लेकिन यकीन मानिए कि बच्चों में यह निश्छलता और सरलता सहज भावसे प्राकृतिक रूप में पाई जाती है ।अगर आपको उनसे जुड़ना है और उनके मनोभावों को समझना है या अपनी बात उनको समझानी है तो आपको भी कुछ समय के लिए ही सही उनके जैसा होना पड़ता है ।

अगर आप प्यारे प्यारे बालगीतों के इस अनूठे संग्रह “बम बम चिक चिक गिली गिली पाशा के पन्ने पलटेंगे तो आपको बच्चों की एक रंगबिरंगी दुनिया में रमण करने का मौका मिलेगा और मुंह से बरबस ही निकल पड़ेगा

काश जिंदगी होती ऐसी
जैसा हो जादू तमाशा
बम-बम चिक चिक
गिली-गिली पाशा

कवयित्री निशा कोठारी जब लिखती हैं कि

बच्चा नहीं रहा मैं मम्मा
बड़ा हो गया देखो
मुझको सारा कुछ करना है
आप्पी आप्पी अब

या फिर जब आप पढ़ते हैं

मौछी की छादी है
आना जलूल
प्याला छा गिफ्ट
छात लाना जरूर

तो कुछ समय के लिए भ्रमित हो सकते हैं कि ये गीत किसी बच्चे ने लिखे हैं ।यही तो बाल साहित्यकार की खूबी होती है । वह बच्चों की दुनिया में ऐसा घुलमिलकर उनके साथ एकसार होता है कि दूसरों को उस समय बच्चा ही नजर आने लगता है।यही बाल साहित्य की सफलता भी है ।बच्चों तक पहुंचने और उन तक अच्छी व सार्थक बातें पहुंचने के लिए आप उन जैसे बन जाएं और उनके साथी बन जाएं ।

सुनिए एक मां कैसे अपने बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित कर सकती है –

नींद उड़ा दे नील गगन में
जल्दी से कर बिस्तर गोल

विद्यालय की कर तैयारी
बस्तर बोतल और टिफिन ले
झटपट झटपट पढ़ ले लिख ले
फट से रटकर गिनती गिन ले
कामकाज में लगना होगा
नहीं चलेगी टालमटोल

इसी तरह बच्चों को गिनती सिखाने ने का यह बचकाना मगर शर्तियाना सफल तरीका निशा कोठारी जैसी मंजी हुई कवयित्री ही बता सकती हैं

एक बिल्ली और बच्चे दो
तीन रोटियां जल्दी पो
चार बार मैं बोल चुका मां
कितनी देर लगाओगी
पांच मिनट रुक पांच मिनट रुक

कवयित्री की दृष्टि व्यापक है और समाज के हर पहलू और हर तबके पर उनकी समान नजर है। गरीब और बस्ती के बच्चों के लिए भी उन्होंने एक बालगीत लिखा है। इसकी बानगी देखिए

टूटे टायर फटी पतंगें
लकड़ी के फट्टे ले लें
पूरी फौज खड़ी बच्चों की
जो भी चाहें हम खेलें

इसी तरह हरी सब्जियों को खाने से कतराते हैं बच्चे ।उनके लिए उन्होंने “हरी सब्जियां” गीत लिखा है। इस गीत में बच्चों के नखरे और हरी सब्जियों के गुणों का बखान है।

जिन बच्चों की मां नहीं होती वे अपनी मां को कितना मिस करते हैं और मां की मौजूदगी कितना मायने रखती है यह पढ़ सकते हैं आप उनके बाल गीत “काश कि मेरी मां होती” में । पीड़ा भरे, भावुक कर देने वाले इसी गीत में उन्होंने बताया है कि बिन मां के बच्चे कैसे समय से पहले समझदार हो जाते हैं–

सीख गया मैं बाल बनाना
बिना गिराए चावल खाना
बेल्ट घुसाना सही ढंग से
और शूज की लेस लगाना
मेरे हर बड़पन के भीतर
वो थोड़ा बचपन बोती
काश कि मेरी मां होती

इस पुस्तक में इसी तरह के अचंभित , चमत्कृत और भावुक कर देने वाले पांच दर्जन से ज्यादा बाल गीत मौजूद हैं ।बच्चों की दिनचर्या , उनकी बाल सुलभ अठखेलियां ,जिद और जरूरत पर आधारित यह बाल गीत संग्रह निश्चित रूप से बच्चों के मन को भाएगा । इन गीतों को गुनगुनाने पर बच्चे ही नहीं उनके माता-पिता भी मजबूर हो जाएंगे।

अगर आपके घर में बच्चे हैं तो आपको इसे जरूर पढ़ना चाहिए और अगर आप खुद बच्चे बनना चाहते हैं तब तो आपको इसे जरूर- जरुर पढ़ना चाहिए ।

शिखर चंद जैन

मोटिवेशनल लेखक, स्तंभकार, बाल साहित्यकार

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