देश मेरे ! तुम नहीं हो जनसमूही शोर केवल

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arpan jain avichal

राष्ट्र की सम्पूर्ण संकल्पना, उसके होने का मतलब, उसकी कार्ययोजना, उसकी संस्कृति, उसकी भाषा, लोकव्यवहार और आचरण सबकुछ उसके निवासियों की जागृत मेधा से उन्नत है।
और इन्हीं की चिंता और संगठनात्मक परिचय से मिलकर शब्द बनता है राष्ट्रवाद
राष्ट्रवाद शब्द में पहले पायदान पर राष्ट्र आता है, उसके बाद उसकी विचारधारा या कहें वाद का स्थान है।
अथर्ववेद में लिखा है ‘वयं तुभ्यं बलिहृत: स्याम’ जिसका अर्थ है- हम सब मातृभूमि के लिए बलिदान देने वाले हों यही भाव किसी राष्ट्र की उन्नति के कारक तत्व में निहित होना चाहिए।
आज राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीति, विचारधारा या कहें बचकानापन जो सामने आ रहा है वह संकल्पना ही घातक है।
आज राष्ट्र की आवश्यकता है, इसमें रहने वाले राष्ट्रवासियों का जागृत होना है।
हम सोए सिंहों की भाँति जंगल में रह तो रहे हैं पर अपने कर्त्तव्यों के प्रति सजग नहीं, न ही अधिकारों के प्रति जागरुक।
इसी का फ़ायदा वो ताकते उठाने लगी हैं, जो चाहती हैं भारत की अवनति।
अब हमें मार्ग चुनना है जिसमें राष्ट्र निहित हो या वो जिसमें राष्ट्र का बुरा निहित।
आज तकनीकी का भलीभाँति उपयोग करके हम कैसे अपने राष्ट्र को विश्व गुरु बना सकते हैं, उस मार्ग पर चलना ही हमारे लिए भी हितकारी है और राष्ट्र के लिए भी।
क्योंकि सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानियों तक कम समय में पहुँचने का सबसे कारगार मंच तकनीकी और सोशल मीडिया है।
इसका सार्थक उपयोग करके हम स्वर्णिम राष्ट्र की संकल्पना को साकार कर सकते हैं और भारत को पुनः विश्व गुरु बना सकते हैं।

कैसे करें सोशल मीडिया का उपयोग

  1. ख़ूब पढ़ें, ग्रंथों का अध्ययन करें, देश की अवधारणा को समझें, उस पर टिप्पणियाँ लिखें, फिर फेसबुक, ट्विटर, न्यूज़ पोर्टल, अन्तरतानों पर प्रसारित करें।
  2. ज़्यादा से ज़्यादा राष्ट्रवादी लोगों के माध्यम से जागरुकता फैलाएं।
  3. देश की शिक्षा नीति, भाषा नीति, विज्ञान, तकनीक, वित्त, रक्षा नीति पर अध्ययन करके जागरुक लोगों की राय प्राप्त कर नीति निर्धारक तत्वों तक उन सुझावों को पहुँचाएं।
  4. एक घंटा देह को, एक घंटा राष्ट्र को और एक घंटा हिंदी भाषा को दीजिए, क्योंकि हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जिसके माध्यम से सम्पूर्ण राष्ट्र को पुनः जोड़ा जा सकता है और सांस्कृतिक विखंडन से राष्ट्र को बचाया जा सकता है।
  5. राष्ट्र के विभिन्न मुद्दों पर जनता को जागरुक करें, उन विषयक साहित्य या आलेखों को प्रचारित प्रसारित करके जागरुकता का संचार करें।

प्रथम चरण में इतने भी काम यदि हमने शुरू कर दिए तो यकीन मानिए एक दशक में हमारा भारत विश्वगुरु बन जाएगा।

-डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’
हिन्दीग्राम, इंदौर

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संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।