अब मंदिरों को खोलने की अनुमति दें, कोविड की सावधानियों के साथ : आलोक कुमार

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    नई दिल्ली। अगस्त 31, 2020। विश्व हिन्दू परिषद(विहिप) ने सभी मंदिरों, गुरुद्वारों, आश्रमों तथा अन्य उपासना स्थलों को खोलने की मांग की है जिससे इस महामारी के कारण घरों में बंद लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ रहे विपरीत प्रभावों पर अंकुश लगाया जा सके। विहिप के केन्द्रीय कार्याध्यक्ष एडवोकेट श्री आलोक कुमार ने आज एक प्रेस वक्तव्य के माध्यम से कहा है कि कोरोना महामारी के कारण लम्बे समय से घरों में बंद लोग मानसिक तनाव का शिकार बन कर डिप्रेशन की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में कोविड सम्बन्धी सभी सावधानियों का पालन करते हुए, देशवासी मंदिरों तथा उपासना केन्द्रों में जाकर उस मानसिक तनाव से मुक्ति प्राप्त कर सकेंगे।



    श्री आलोक कुमार ने यह भी कहा कि हिन्दू समाज अनुशासन तथा कानून की अनुपालना में सदैव ही अपनी जिम्मेदारी निभाता रहा है तथा माता वैष्णो देवी की यात्रा भी महामारी के सभी आवश्यक मापदंडों का पालन करते हुए चल ही रही है। इसीलिए अब उचित समय आ गया हैं कि सरकार सभी मंदिरों को खोलने की अनुमति अबिलम्ब प्रदान करे।

जारीकर्ता
विनोद बंसल
राष्ट्रीय प्रवक्ता, विश्व हिंदू परिषद

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।