गणित

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दीपावली का समय था । यह तय हुआ कि निहाल को बुलाकर उससे बिजली की सारी बंद लाइट बदलवा दी जाए तथा और भी बिजली के जो छोटे-मोटे काम बचे हैं, वह करवा कर घर के बाहर की झालर लाइट भी लगवा ली जाए।
वैसे तो बिजली मैकेनिक को बुलाना ही बड़ा टेढ़ी खीर होता है ,लेकिन हमारी धर्मपत्नी की आदत है कि, जब भी कोई कारीगर आता है तो, वह उसकी खातिरदारी अच्छे से कर देती है और वह बड़ा खुश होकर जाता है । इसलिए जब निहाल को फोन लगाया तो निहाल ने तुरंत दोपहर में आने की हामी भर दी।
निहाल ने सारा काम तकरीबन एक घंटे में पूरा कर दिया । जब मैंने उससे पूछा कि ,भाई कितने हुए तो, निहाल ने तुरंत जोड़कर बताया सर पंद्रह सौ रुपए दे दीजिए ।
तभी धर्मपत्नी चाय और उसके साथ नाश्ते की एक प्लेट निहाल के लिए लेकर आ गई । निहाल ने मना किया ,लेकिन मेरी पत्नी ने बड़े आग्रह के साथ उसे नाश्ता भी करवाया और चाय भी पिलाई ।
निहाल जब जाने के लिए तैयार हो गया तो मैंने उससे पूछा,’ हां निहाल भाई ! कितने दे दूं।’
‘ अब सर, आपका तो घर का मामला है । आप तो सिर्फ बारह सौ रुपए दे दीजिए ।मैंने उसे तुरंत 12 सो रुपए निकाल कर दे दिए।
उसके जाने के बाद पत्नी ने कहा ‘देखा मेरी चाय और नाश्ते की प्लेट का कमाल! आपके ₹300 बच गए । मेरी चाय और नाश्ते की लागत सिर्फ ₹25 ही थी।’
मैं मौन रह गया ।पत्नी का गणित मेरी समझ से बाहर का था।

सतीश राठी

इंदौर 452010

परिचय

नाम- सतीश राठी।
जन्म :23 फरवरी 1956 को इंदौर में जन्म।
शिक्षा: एम काम, एल.एल.बी ।

लेखन: लघुकथा ,कविता ,हाइकु ,तांका, व्यंग्य, कहानी, निबंध आदि विधाओं में समान रूप से निरंतर लेखन । देशभर की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में सतत प्रकाशन।

सम्पादन:क्षितिज संस्था इंदौर के लिए लघुकथा वार्षिकी ‘क्षितिज’ का वर्ष 1983 से निरंतर संपादन । इसके अतिरिक्त बैंक कर्मियों के साहित्यिक संगठन प्राची के लिए ‘सरोकार’ एवं ‘लकीर’ पत्रिका का संपादन।

प्रकाशन:पुस्तकें शब्द साक्षी हैं (निजी लघुकथा संग्रह), पिघलती आंखों का सच (निजी कविता संग्रह )।

संपादितपुस्तकें -तीसरा क्षितिज(लघुकथा संकलन), मनोबल(लघुकथा संकलन), जरिए नजरिए (मध्य प्रदेश के व्यंग्य लेखन का प्रतिनिधि संकलन), साथ चलते हुए(लघुकथा संकलन उज्जैन से प्रकाशित),सार्थक लघुकथाएँ( लघुकथा की सार्थकता का समालोचनात्मक विवेचन), शिखर पर बैठकर (इंदौर के 10 लघुकथाकारों की 110 लघुकथाएं संकलित)

साझा संकलन- समक्ष (मध्य प्रदेश के पांच लघुकथाकारों की 100 लघुकथाओं का साझा संकलन) कृति आकृति(लघुकथाओं का साझा संकलन, रेखांकनों सहित), क्षिप्रा से गंगा तक(बांग्ला भाषा में अनुदित साझा संकलन),
शिखर पर बैठ कर (दस लघुकथाकारों का साझा संकलन)

अनुवाद: निबंधों का अंग्रेजी, मराठी एवं बंगला भाषा में अनुवाद । लघुकथाएं मराठी, कन्नड़ ,पंजाबी, गुजराती,बांग्ला भाषा में अनुवादित । बांग्ला भाषा का साझा लघुकथा संकलन ‘शिप्रा से गंगा तक वर्ष 2018 में प्रकाशित।

विशेष: लघुकथाएं दो पुस्तकों में,( छोटी बड़ी कथाएं एवं लघुकथा लहरी ) मेंगलुर विश्वविद्यालय कर्नाटक के बी ए प्रथम वर्ष और बी बी ए के पाठ्यक्रम में शामिल।
लघुकथाएं विश्व लघुकथा कोश, हिंदी लघुकथा कोश, मानक लघुकथा कोश, एवं पड़ाव और पड़ताल के विशिष्ट खंड में शामिल।

शोध: विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में एम फिल में मेरे लघुकथा लेखन पर शोध प्रबंध प्रस्तुत । कुछ पी एच डी के शोध प्रबंध में विशेष रूप से शामिल ।

पुरस्कार सम्मान: साहित्य कलश, इंदौर के द्वारा लघुकथा संग्रह’ शब्द साक्षी हैं’ पर राज्यस्तरीय ईश्वर पार्वती स्मृति सम्मान वर्ष 2006 में प्राप्त। लघुकथा साहित्य के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए मां शरबती देवी स्मृति सम्मान 2012 मिन्नी पत्रिका एवं पंजाबी साहित्य अकादमी से बनीखेत में वर्ष 2012 में प्राप्त । सरल काव्यांजलि, उज्जैन से वर्ष 2018 में सम्मानित। दादा रामनारायण उपाध्याय स्मृति लघुकथा अलंकरण 2020 घोषित दिनांक 19 जून 2020 को लघुकथा शोध केंद्र भोपाल द्वारा प्रदान किया जाएगा

सम्प्रति:भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर इंदौर शहर में निवास, और लघुकथा विधा के लिए सतत कार्यरत।

matruadmin

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29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।