एक मुस्कान

sandhya
फरवरी का महीना था ।बात शिवरात्रि की है ,उस दिन सुबह से ही बारिश हो रही थी ।तभी गली में मुझे बीन की आवाज सुनाई दी।किसी ने दरवाजा खटखटाया और आवाज लगाई ,ओम नमः शिवाय ।
शिव जी का नाम कानों में सुनाई दिया तो खिड़की खोल कर देखा गली में।
दो सपेरे हाथ मे बीन और सांप की पिटारी लिए हुए बीन बजा रहे थे और उन के साथ ही कुछ बच्चे सभी का दरवाजा खटखटा रहे थे। तभी किसी बच्चे ने आवाज लगाई ,ओ माई नीचे आ कर कुछ दान करो।आज शिव रात्री का दिन है।
ओह माँ इतनी तो ठंड है आज इन को ठंड में भी चैन नही ।मन ही मन मे बुद बुदाते हुए मैने कहा ,
आती हूँ रुको तो जरा और कदम बढ़ाते हुए मै नीचे की ओर चल दी।
दरवाजा खोला तो देखा ,वो बच्चा नंगे पैर था।मुझे देखते ही दया आ गयी।
क्या चाहिए,मैने पूछा तो बच्चे ने उत्तर दिया।कुछ भी दे दो माई।
इतनी ठंड में तुम लोगो को ठण्डी नही लगती क्या??
लगती तो हैं, पर पेट की आग ज्यादा गर्म होती है और ठंड कम।
इतना कह कर वो व्याकुल सी आँखो से मुझे देखने लगा।
मेरे अंदर का ममता भाव जाग्रत हो चुका था।अपने बच्चे के पुराने जूते उसे दिए।
देखो तो जरा पहन कर,उस ने खुशी खुशी पहन लिए।
फिर अंदर से कुछ गर्म कपड़े और चप्पल भी बच्चों को दी।
सभी बच्चों के चेहरे पर खुशी थी।तभी एक छोटा सा बच्चा बोला कुछ मीठाई खाने को दो ना,बहुत दिन से कुछ मीठा नही खाया।
शायद वो बच्चे भी समझ गए थे कि उन को निराश नहीं होना पड़ेगा।
फरवरी का महीना था।शादियों का सीजन चल रहा था, तो घर मे मिठाइयां भी रखी थी।
मैने एक मिठाई का डिब्बा जिसमे मठरी और लड्डू थे ।उन को दिए और बोला लड्डू खा लो अभी।
डिब्बा लेते ही वो सब खुशी खुशी चले गए।
बच्चों के चेहरे पर लड्डू खा कर जो मुस्कान आयी।
उस से बड़ा सुकून शायद ही कुछ हो।
गरीब को भीख में रुपए बेशक ना दे,पर इतना जरूर करें कि जो कपड़े या जूते,आप के किसी काम के नही ।शायद किसी दूसरे की जरूरत पूरी कर सकते है।।
गरीब को दुत्कारें नही।गरीबी कोई बीमारी नही उस की लाचारी है।

#संध्या चतुर्वेदी
मथुरा उप

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