देश में नौकर नहीं मालिक की है जरूरत

hemendra

          अभिभूत, आज बाबा साहेब आंबेड़कर का वह सबक याद आ गया जब उन्होंने कहा था हमारी शिक्षा मालिक पैदा करने लिए होना चाहिए नाकि नौकर। इतर हम नौकर बनने का पाठ पढ़ रहें तभी तो देश में मालिक नहीं नौकरों की बाढ़ आ रही है। आह्लादित भविष्यतर देश  को आजादी में भी गुलामी झेलनी पड़ेगी जिसका पार्दुभाव बहुदेशीय कंपनियों के मकड़जाल से हो चुका है। प्रतिभूत भुगतमान भोगने अपने साथ आने वाली पीढ़ी को भी तैयार करने में कोई कोताही नहीं कर रहे है ।

          मतलब, हम बात कर रहे हैं आज के दौर में प्रचलित शिक्षा प्रणाली और अपनाये जाने वाले रोजगार के भागमभागी भरे संसाधनों की जिसे हर कोई अपने-अपने माध्यमों से पाना ही नहीं अपितु हथियाना चाहता है। बस! इसी मुराद में की मुझे नौकरी मिल जाए चाहे वह सरकारी हो या गैर सरकारी और कुछ नहीं। इसी जद्दोजहद में बड़ी-बड़ी पढ़ाई महंगी-महंगी तालिम नौकरी की तलाश झोंक दी जाती है। भेड़चाल में स्वंय को ही नहीं अपितु अपने समाज और  देश को भी सीमित दायरे में बांधकर रख देने में गुरेज नहीं करते। इस खुशी में कि नौकरी मिल गई सब कुछ मिल गया यही तो हमारा मकसद था। अगर एक अदद नौकरी पाने के लिए ही इतनी मशक्कत करनी पड़़ी तो वो सबक, ज्ञान और माता पिता के अरमान किस वास्ते थे ये समझ से परे हो गए। सही मायनों में यह तो धरे के धरे रहने के सिवाय कुछ नहीं रहे बल्कि इनके सहारे देखे गये सुहाने सपने सब्जबाग ही रहे।

            खैर! नौकरी करना कोई गुनाह नहीं ये भी गौरवशाली जनसेवा, कल्याण, उन्नति और देशभक्ति द्योतक हैं। चर्चा इसके विरोध प्रतिशोध की ना होकर परिस्थिति की है क्योंकि आज समाज और देश में नौकर के बजाए मालिक की बहुत जरूरत हैं। प्रतिपूर्ति चाकरी से एक कदम आगे बढ़कर स्वरोजगारी को अपनाना ही वक्त की नजाकत हैं। येही हमारे समाज का मूलभाव व मंत्र रहा हैं। स्तुत्य, उत्तम खेती, मध्यम व्यापार, निकृष्ट चाकरी भीख ना दान। फलतः ये फलसफां उल्टा ही दिखाई पड़ रहा है कदमताल बिन सोच -विचारे रणभेरी जोरों से जारी हैं। यदि हालात ऐसे ही बने रहें हमारी अर्थव्यवस्था, मूलभूत ढांचा खासकर ग्रामीण सभ्यता, कृषि, पशुधन,  आवरण और स्वरोजगार मूलक संसाधन रसातल में पहुंच जाएंगे जिसे बचाये भी हम नहीं बचा सकते।

            अलबत्ता, अब देर किस बात कि मालिक बनने की भागीदारी युवाओं को हरहाल में निभानी पड़ेगी। अर्थात् हम नौकरी या कहें रोजगार के अलावे तकनीकी युक्त नवाचार खेती, व्यापार-उत्पादन, सेवा और कौशल विकास की नई ईबारत लिखकर संवहनीय आजीविका के साधन अध्ययन काल से ही विकसित करेंगे तो अपने आप मालिक बन जाएंगे। जिसे तन-मन-धन-वचन के साथ आत्मसात कर युवजनों को जागृत और प्रेरित करना हम सबका नैतिक कर्तव्य ही नहीं अपितु दायित्व भी हैं। ये नव चेतना स्वयं के साथ अपनो को अपने पैरों में खड़ा करना का निश्चित तौर पर गुढार्थ रहस्य साबित होगी।

                 अभियान में हमें जन-जंगल-जमीन-पशुधन, पांरपरिक पेशा और हुनर का संरक्षण व संवर्धन करते हुए जरूरत के मुताबिक विदोहन करना होगा। तभी हर हाथ को काम और खाली पेट को भोजन मिलेगा मीमांसा ही समाज कल्याण व देश सेवा की अभिलाषा को पूरी करेंगी । सहगमन, हमें ऐसी शिक्षा नहीं चाहिए जहां नौकर बनने का ज्ञान मिलता हो। अविरल, ऐसी काबिलियत सीखनी हैं जहां मालिक बनने का गुर मिलता हो। गौरतलब है कि नौकरी करने से एक ही व्यक्ति को रोजगार मिलता है और  सदा वो नौकर ही बनकर रह जाता है चाहे वह किसी भी दायित्व का निर्वहन करता हो। दूसरी ओर स्व-अर्जित जीविका पार्जित करने वाला अपने अलावा औरों को भी रोजी-रोटी मुहैया करवाकर मालिक का दर्जा प्राप्त करता हैं। इसका अर्थ ये नहीं दोनों में उच्च-निच का भाव हैं।

           अंतर्मन गेंद हमारे पाले में है कि हम देश को किस दिशा में मोड़कर जागृत करना चाहते हैं, नौकर या मालिक की। देश को जरूरत तो मालिक है ना कि नौकर की फिर देर किसलिए कंठहार उठ खड़े हो जाइऐ इस महायज्ञ में जहां कौशल देश, कुशल देश के अधिष्ठान हो। याद रहें इसमें मातृशक्ति की भागीदारी प्राणपन से होगी अभिइच्छा ही जागृतिसूत अनुष्ठान देश के सांगोपाग समर्पित होगा। अभिष्ठ, अभिनवकारी जयघोष….. स्वावलंबन की झलक पर न्योछावर कुबेर का कोष। कौशलम् वलम्!

#हेमेन्द्र क्षीरसागर

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।