ज़िंदगी हमसे कितनी हमें दूर ले गई एक सदा–ए-समा जो घबराती रहे हालात–ए–सर्द निग़ाहों में कुछ भी नहीं हम दरिचों में ख़ुद को सजाते रहे ज़िंदगी की पनाहों में कुछ तो मिले उनींदी राहों में बड़बड़ाते रहे आज कल तो हमीं दाव पर हाल है हम सजाएँ सहर थरथराते रहे […]
काव्यभाषा
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