उम्र की सुराही से, रिस रहा है लम्हा-लम्हा, बूँद-बूँद और, हमें मालूम तक नहीं पड़ता l कितनी स्मृतियाँ, पुरानी किताब के जर्द पन्ने की तरह, धूमिल पड़ गई हमें मालूम तक नहीं पड़ता l बिना मिले,बिना देखे कितने अनमोल रिश्ते, औपचारिकता में तब्दील हो जाते हैं, हमें मालूम तक […]
