ज़ख्म_है_तो_लाज़मी_है_दर्द_होना 

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asprindar deji
#ज़ख्म_है_तो_लाज़मी_है_दर्द_होना
बेशक़ दिखते नहीँ..
#दर्दे जिग़र पे एहसासों की परत जो लगी है
यादेँ हैँ तो लाज़मी है अश्कों से धोना
 सूख जाते हैँ कुछ नासूर_ए_ज़ख्म
  बस चंद बूँदों से धोने पड़ते हैँ
    रिसते रहते हैँ ….कतारों में
वो #दर्द जो लम्हों में ठहरे रहते हैँ
ज़िस्मों_जाँ है तो लाज़मी है चाहत होना
बेशक़ बेसबब बेहितेँहा
निगाहोँ में कशिश_ए_रूप की परत जो चढ़ी है
रूह से है तो लाज़मी है पाकीजा होना
   आह बन कर टपकते हैँ पलकों से
    लबों से ज़ाम ए हंसी पीते हैँ
    आँखो में रहते हैँ #दर्द ..ग़ज़ल बन
   वो ज़ख्म जो रूह में उतर जाते हैँ ….
#ज़ख्म_है_तो_लाज़मी_है_दर्द_होना**
  #कभी_ये_दर्द_जीने_की_वज़ह_बन_जाते_हैँ #
#असपिंदर कौर बेदी 
परिचय
पूर्ण नाम: -असपिंदर कौर बेदी 
साहित्यिक उपनाम: -डेज़ी बेदी जूनेज 
शहर -मोहाली (चंडीगढ़)
राज्य —- पंजाब 
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।