वो_दौर_घरौंदों_का

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minakshi vashishth
गुड्डे-गुड़िया और घरोंदा से जुड़े किस्से कहानियाँ यकीनन हम सभी की बचपन की यादों में संभले रखे होंगे ।
घरौदा—>बडो के बड़े से घर के अंदर छोटों का छोटा सा घर ,,
“घरौंदा” अगर अपनी समझ से कहूँ तो बड़ों की नाक के नीचे बडो के नियंत्रण से रहित पनपती हुई इक छोटी दुनियां ….;
वो भी एक दौर था जब हमारी गुडिया और घरौंदों से भी मुहल्ले के बच्चों में हमारी शान हुआ करती थी ,,,जब बड़ो की दुनियाँ के बीच बच्चों की अलग ही दुनियां हुआ करती थी ।
उस दौर के खेल-खिलौने बच्चों को उनके घर-परिवार संस्कृति,संस्कारों से जोड़ने वाले हुआ करते थे । ये खेल-खिलौने बच्चों को जीवन दर्शन आसान शब्दों में सिखाते थे ।
खैर………!
अब आप कहोगे कि मैं बेमौसम इन घरौंदों की बात क्यों कर रही हूँ ये तो दिवाली पर तैयार किये जाते हैं तो भले ही ये दिवाली पर तैयार किये जाएँ पर इनके साथ सबसे ज्यादा समय इन्ही दिनों में बिताया जाता है । गर्मी की लम्बी-लम्बी दुपहरी में जब घर के सभी बड़े सो जाते थे सारे बच्चे चोरी छिपे अपने-अपने घरों से निकलकर खूब मनमानी करते थे । ये प्यारे-प्यारे घरौंदे हमेसा से बच्चों को आकर्षित करते रहे हैं मगर स्मार्टफोन ने बच्चों को समय से पहले कुछ ज्यादा ही गम्भीर बना दिया है आजकल के बच्चे तो जानते ही नहीं _क्या होता है घरौंदा ??
एक दौर था जब बच्चे गुड्डे-गुड्डियों के खेल से ही दुनियादारी सीखते थे ।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान राम कार्तिक अमावस्या के दिन अयोध्या वापस लौटे थे नगरवासियों ने इनके आगमन की ख़ुशी में अपने-अपने घरों को भांति-भांति से सजाया था ताकि उनके प्यारे राम को नगर में बस सुख,समृद्धि नजर आये
कही कोई ऐसी वजह ना दिखाई दे जो राम को व्यथित कर दे ,,बस तभी से दीपावली पर नये घरोंदे बनाकर सजाने का प्रचलन हो गया । धीरे-धीरे ये एक परंपरा बन गयी। घरोंदे को अविवाहित लडकियों से इस मंगल कामना के साथ बनबाया जाता था कि उनका भावी दाम्पत्यजीवन सुख-समृद्धि से भरा रहे ।लडकियाँ घरोंदे को अपनी कल्पनानुसार सर्वश्रेष्ठ आकर देने की कोशिश करती ,घरोंदें को सजाकर उसे खील बताशे मिठाइयो से भरकर उसमें दीपक जलाती थीं और कामना करती थीं कि उनका “भावी घर-वर” उनकी इच्छाओं का सम्मान करने वाला व उनकी कल्पनानुसार ही हो ।समय बदला तो बच्चों के खेल-खिलौने भी बदल गये ।
अब परम्पराएँ लुप्त होती जा रही हैं व्यस्त जीवनचर्या और शिक्षा पद्धति के कारण बच्चे भी ऐसे खेल-खिलौनों से दूर हो गये।धार्मिक परंपरा के कारण ही तो घर के बड़े लोग बच्चों के साथ मिलकर घरोंदे बनाया करते थे जिन घरों में बड़े व्यस्त होते थे वहाँ बच्चे पड़ोस के बच्चे व बड़ों के साथ मिलकर अपने घरोंदे तैयार कर लेते थे जिन्हें दिवाली की पूजा में शामिल किया जाता था।
गुड्डे-गुड़ियो की दुनिया के नियम कानून भले ही बच्चों द्वारा संचालित होते हों पर ये बड़ो की दुनियां से प्रभावित जरूर होते थे ।बच्चे खेलते समय अक्सर वही बातें ,वही व्यवहार दोहराते थे जो वह अपने बड़ो को बोलते/करते देखते थे । ये घरोंदों की दुनिया बड़ो की दुनियाँ के समानान्तर चलने वाली छोटी दुनियाँ थी जिसमे वही नियम चलते थे जो बच्चे अपने समाज अपने पास-पड़ोस में चलते देखते थे । बच्चे हमारी कही गई आदर्श बातों को नही बल्कि हमारे द्वारा किये गये व्यवहार को सीखते हैं,दोहराते हैं।
खैर……….!
घरोंदे बनाना बेहद जटिल प्रक्रिया थी। ये 10-15 दिन की कड़ी मेहनत का परिणाम होता था ।बच्चे आस-पास के बगीचे या तालाब से मिट्टी लाते और चार दीवाले खड़ी करते ,इनके सूख जाने पर लकड़ी के टुकड़े से छत बनाते फिर दो दीवाल बनाकर लकड़ी के छोटे टुकडो को उनके बीच लगाते हुए सीढियाँ बनाते थे ! हमारे घरोंदे के दुश्मन भी कहाँ कम थे शाम को बनाई गई सीढियाँ सुबह बिखरी हुई मिलती थी
…..फिर क्या थोडा रोना,धोना ,खीझना होता और फिर से बनाना शुरु कर देते थे ।दिवाली करीब आने पर बुआ,दादी,मासी,नानी घरोंदों को सजाने सँवारने में हमारी मदद करती और अगले ही दिन हमारा घरोंदों के साथ बिताया जाने वाला समय निश्चित कर दिया जाता था ।”बेचारा घरौंदा ” समय और देखभाल के अभाव में अकेला और उदास हो जाता था । इतने दिनों के इंतजार के बाद जब गर्मी की छुट्टियाँ होतीं तो बच्चों का सारा समय और ध्यान इन घरौंदों पर केन्द्रित हो जाता था । घर वालों को तो पता भी नही होता था कि हम उनके सख्त पहरे के बीच से कितनी सारी दोपहर चुराते थे अपने घरौंदों को सबसे सुंदर बनाने के लिए हमें क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हमीं जानते हैं बड़ों के घर जैसे गुलदस्ते और पर्दों को पाने की चाह में कभी फूलदान चुराते तो कभी पर्दे के लिए माँ का पुराना दुपट्टा … कुछ बच्चे तो घरोंदे की सुन्दरता में चार चाँद लगाने की सोचकर अपनी माँ की विदाई की जरी वाली लाल साड़ी का जगमगाता हुआ पल्लू चुराने की हिमाकत कर बैठते थे फिर क्या..
.’खाया पीया कुछ नही
गिलाश टूटा बारह आना” की तर्ज पर बच्चे से वो सुन्दर पल्लू तो छीन ही लिया जाता और फालतू में बेचारे की रुई की तरह धुनाई होती सो अलग……!
बडो की नीरस दुनियाँ से ये छोटी-2 खुशियाँ चुराना भी बड़ी टेढ़ी खीर था ।
कभी- कभी तो लगता था जैसे हर माँ के पास एक हजार अदृश्य आँखे हैं जिन्हें उसने सारे घर में जासूसी कैमरे की तरह छुपा रखा है
…..फिर बेचारे भोले -भाले बच्चे रो-धोकर चुप हो जाते और कुछ देर बाद वहीं अपने #मिशन_घरौंदा_सजाओ # में जुट जाते ।
बड़ो की शातिर दुनियाँ से दूर बच्चे अपनी छल कपट रहित प्यारी सी दुनियाँ में खोये रहते थे । गिने चुने खेल खिलौने ,गुडिया-गुड्डे और घरोंदो में इनकी ढेर सारी खुशियाँ बसती थीं । किसी-2 बच्चे के पास तो कई सारे घरोंदे होते थे वो भी दो-2 ,तीन-2 मंजिल वाले ………..”
धीरे-धीरे छोटी दुनियाँ में भी सब कुछ बड़ी दुनियाँ जैसा होने लगा ।
सुन्दर घरोंदे वाले बच्चे अलग ही रौब दिखाते थे । गुड्डे वाले बच्चे बड़े निश्चिन्त और शान से रहते थे जबकि गुडियों वाले बच्चे जरा परेशान रहते थे हो भी क्यों ना आखिर उन्हें गुड़िया की शादी के लिए गुड्डा जो ढूंढना होता था ।
………तो गुड़िया वाले बच्चे दूसरे मुहल्ले के गुड्डे वाले बच्चों को तलाशते थे ।सुंदर से घरोंदे वाला सजीला गुड्डा गुडिया के लिए कुछ आसान सी शर्तों पर चुन लिया जाता । दोनों परिवारों के बच्चे और बड़े मिलते ,,सारी बातें बच्चों को करनी पड़ती थी दोनों और के बड़े तो बस हँसते रहते थे बाते सुनकर न जाने क्यों…….
बच्चों के खेल में घर के बड़े भी शामिल होते थे लेकिन उनका काम बस बारात ले जाने का इंतजाम करना और बारातियों के स्वागत की तैयारी करना था ।आजकल लोग बड़ी आसानी से ताना मार देते हैं ,”शादी/व्याह करना कोई गुडडे/ गुड़ियों का खेल नही”
अरे गुड्डे/गुड़ियों के खेल में भी गुड़िया की शादी किसी अच्छे घरोंदे में करने में कितनी मेहनत लगती थी ,कितने पापड़ बेलने पड़ते थे ये तो बस उस दौर के बच्चे ही जानते हैं ।।
खैर……….!
गुड़िया को प्यारी सी दुल्हन बनाकर घर में नाच-गाना शुरु हो जाता ।गुड़िया की सहेलियाँ और उसका घरोंदा भी सजाया जाता ।बच्चों की खुशियों में दोनों ही और से घर के बड़े/बुजुर्ग महिला-पुरुष शरीक होते थे ।गुड़िया के घर पकवान, मिठाइयाँ बनते .गुड्डे की बारात पूरे शानो सौकत से गाजे बाजे के साथ आती और विवाह की प्रमुख रश्मो के साथ विवाह सम्पन्न कराकर गुड़िया की विदाई हो जाती थी ।
देखते ही देखते ये बच्चों की दुनियाँ भी शातिर होने लगी …,,जो गुड़ियो की शादी पकवान,मिठाइयाँ,खिलौने और टाफियों पर हुआ करती थीं उन शादियों में भी अब कुछ चालाक बच्चे अजीव शर्ते रखने लगे थे जैसे कि–तुझे हमेसा मेरा होमबर्क करना होगा।
>खेल में हमेसा हम पहले खेलेंगे।
>हम अपनी मर्जी से आउट होंगे जैसी प्यारी ,मासूम और आसन शर्तें…
!इन शर्तो को पूरा न कर पाने पर बच्चों में हल्की नोक झोंक होती और थोड़ी देर बाद सब कुछ फिर से पहले जैसा हो जाता था ।
…..मगर धीरे-धीरे बच्चों की इस भोली-भाली दुनियाँ में बड़ी दुनियाँ की कुत्सित सोच पैर पसारने लगी। बच्चे बड़ों जैसी बातें व् व्यवहार खेलों में दोहराने लगे । इन शादियों के खेल में बच्चे जरा-जरा सी बातों पर ‘लड़के वालों’ वाला रौब दिखाने लगे थे ।शादी की शर्ते पूरी न हो पाने पर वो बारात लौटा ले जाने की धमकी देने लगते ।
मुझे आज भी याद है मेरी सहेली ‘रन्नो’ की गुड़िया की शादी………,यूँ तो उस शादी में मैं अचानक ही पहुँच गई थी पर वहाँ जो देखा वो बच्चों की दुनियाँ का व्यवहार तो बिलकुल नही था . नन्हे बच्चे बारातियों की खिदमत में कमी होने पर बारात लौटाकर ले जा रहे थे बड़ों के समझाने पर शादी हुई,विदाई भी हो गई लेकिन अगले ही दिन मैंने देखा कि गुड्डे वालों ने गुड़िया को नोच-खसोट कर गली में फेंक दिया । ये आखिर क्या था……!
बच्चों के मनमुटाव की सजा गुड़िया को झेलनी पड़ती थी । ये बड़ो की दुनियाँ की निर्दयता मासूमों की दुनियाँ में कैसे आ गई। मैंने देखा था जब शादी के खेल में लड़ाई झगड़ा हो जाता तो बच्चे गुड़िया को विदा कराकर तो ले जाते पर गुड़िया को घरोंदे के बाहर ही पटक देते और गुड़िया वालो से शर्तों को पूरा करने की जिद करते जब बच्चे ना-नुकर करते तो वो गुड़िया को जला देते ,उसकी आँखे नोच लेते,बाल काट देते यहाँ तक कि अगर गुड़िया वालों का घर कभी सूना मिल जाता तो गुड़िया के घरोंदों को जला देते ,फोड़ देते ………! जब गुड़िया वाले बच्चे अपनी प्यारी गुड़िया को काली कलूटी ,फटेहाल पड़ी देखते तो बहुत गुस्सा होते और खूब रोते थे । खासकर लडकियाँ तो अपनी गुड़िया से दिल से जुड़ जाती थी और गुड़िया के जल जाने पर कई-कई दिनों उदास रहती थीं ।
……….ये कैसा खेल था जहाँ दोस्तों की वादाखिलाफी की सजा गुड़िया को मिलती थी ।
गुड्डे/गुडियों से खेलने वाले भोले-भाले बच्चों का ये क्रूर व्यवहार उन्हें बड़ो से संस्कार के रुप में मिला था .आखिर क्यों न लेंते वो खेल में हुई हर गलती,हर कमी का बदला गुड़िया से जब उन्होंने अपने आस-पड़ोस में ,घर में ,पापा,चाचा,ताऊ , पड़ोसियो और रिश्तेदारों को यही करते देखा था ,,,,,,,,,उन्होंने अपनी माँ,जीजी, भाभी ,चाची ,ताई को अम्मा बाबा के ताने सुनते ,जरा जरा सी बातों पर मार खाते देखा था ।
हाय ! ये क्या किया बड़े और समझदार लोगों ने बच्चो की भोली भाली ,निश्छल दुनियां को अपने छल,कपट,चालाकी ,लालच और क्रूरता से भर दिया ।
बड़ो ने बच्चों की दुनियाँ से बचपना लूटकर उसे नीरस बना दिया
बड़ो ने छीन लिया वो ‘निश्छल बचपन’…..!

#मीनाक्षी वशिष्ठ
नाम->मीनाक्षी वशिष्ठ
 
जन्म स्थान ->भरतपुर (राजस्थान )
वर्तमान निवासी टूंडला (फिरोजाबाद)
शिक्षा->बी.ए,एम.ए(अर्थशास्त्र) बी.एड
विधा-गद्य ,गीत ,प्रयोगवादी कविता आदि ।
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।