‘सिस्टम’

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sandeep

महानगर का प्रत्येक चौराहा व्यस्त, लाईटों से नियंत्रित ट्रेफिक …जैसे ही रेड लाईट होती है,एक साइड की गाड़ियों में ब्रेक लग जाते..तकनीकी ने मनुष्य को यांत्रिक बना दिया है,जिसे लोग सिस्टम कहते हैं। महानगर तो जैसे चलते ही सिस्टम से हैं…एक सिस्टम ये भी है कि,चौराहे पर गाड़ियाँ रुकते ही अख़बार,खिलौने,इत्यादि बेचने वाले गाड़ियों की ओर दौड़ पड़ते हैं…कभी छोटे बच्चे अपनी कमीज निकालकर हाथ में ले शीशे साफ़ करने लगते हैं और एक रूपए के सिक्के के लिए हाथ फैलाने लगते हैं..किसी को दया आ जाए तो शीशा उतार कर उन्हें सिक्का पकड़ा दें,वर्ना गाड़ी तो साफ़ हो ही गई…।
अभी रेड लाईट हुई तो १४-१५ साल की साधारण नैन-नक्श की छरहरी लड़की कार की तरफ दौड़ी..।वह इस कदर गरीब थी कि,शरीर को ढँकने के लिए पूर्ण कपड़े भी नहीं थे। बदन अधिकांश उघड़ा हुआ था..,दुपट्टे की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती थी…उसकी स्थिति उसकी गरीबी को बयाँ करने के लिए काफी थी..।
स्लेटी रंग की हौंडा सिटी के शीशे पर उसने दस्तक दी..कला शीशा नीचे सरका..लड़की ने कार में बैठे युवा से याचना भरी दृष्टि से कहा-‘साहब,एक गुलाब खरीद लीजिए न,आज तो एक भी नहीं बिका..’।
युवक ने कला चश्मा नीचे सरकाकर उसको ऊपर से नीचे तक भरपूर निहारा..थोड़ी गर्दन शीशे से बाहर निकाली ,बोला-‘ऐसी बात है,चलो हम सारे फूल खरीद लेते हैं ..एक काम करो..फूल गाड़ी में पीछे रख दो..’।
‘जी बाबु जी’।
‘कितने पैसे हुए’?
‘बाबूजी ३०० सौ रूपए …’
‘अरे, मेरा पर्स पास ही मेरे शो-रूम पर है..तुम गाड़ी में बैठो…मैं तुम्हे वहां से पैसे दे देता हूँ।’
लड़की खुश थी कि,उसके सरे फूल बिक गए॥उसने खिड़की खोली और गाड़ी में बैठ गयी…उसे लगा आज सारे दिन धुप में नहीं भटकना पड़ेगा …वह सोचने लगी -“बाबूजी कितने अच्छे हैं..उन्होंने उसे गाड़ी में भी बैठाया है..आज तक तो लोग उसे गाड़ी छूने भी नहीं देते थे…’
लाईट के ग्रीन होते ही हौंडा-सिटी ने रफ़्तार पकड़ ली थी..। वह बेचारी बेबस लड़की फिर कभी उस चौराहे पर दिखाई नहीं दी…लेकिन,रेड लाइट पर गाड़ियों के रुकने और ग्रीन होने पर स्पीड पकड़ने का सिस्टम जारी है |

परिचय : 1975 में दुनिया में आने वाले संदीप तोमर गंगधाडी जिला मुज़फ्फरनगर(उत्तर प्रदेश ) से वास्ता रखते हैं एमएससी(गणित), एमए (समाजशास्त्र व भूगोल) और एमफिल (शिक्षाशास्त्र) भी कर चुके श्री तोमर कविता,कहानी,लघुकथा तथा आलोचना की विधा में अधिक लिखते हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में ‘सच के आसपास (कविता संग्रह)’,’टुकड़ा-टुकड़ा परछाई(कहानी संग्रह)’उल्लेखनीय है। साथ ही शिक्षा और समाज(लेखों का संकलन शोध प्रबंध),कामरेड संजय (लघु कथा),’महक अभी बाकी है’ (सम्पादित काव्य संग्रह), ‘प्रारंभ’ (साझा काव्य संग्रह),’मुक्ति (साझा काव्य संग्रह)’ भी आपकी लेखनी की पहचान है। वर्तमान में आप नई दिल्ली के उत्तम नगर में रहते हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।