अटल जी

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kirti vardhan
‘चौराहे पर लुटता चीर
प्यादे से पिट गया वजीर,
चलूँ आखिरी चाल
कि बाजी छोड़
विरक्ति रचाँऊ मैं,
राह कौन-सी जाँऊ मैं ?’
‘धर्मयुग’ में प्रकाशित
आपका आत्म चिंतन
मंथन,यथार्थ से साक्षात्कार,
स्वीकारोक्ति
मेरे हृदय में
आज भी जीवित है,
आपके प्रति
मेरे सम्मान की सूचक है।
आत्म चिंतन के पश्चात
विरक्ति को छोड़
बाजी खेलने का निर्णय,
प्रतिबिम्बित करता है
आपके दृढ़ निश्चय को।
मैं आपसे
सदैव प्रेरणा तो पाता,
मगर दृढ़ निश्चय
कभी नहीं कर पाता।
शायद इसीलिए,
भाग्य को मानने लगा
जो मिला,
उसी को मुकद्दर जानने लगा।
दाँतों के बीच
कोमल जीभ का रहना,
अच्छे-बुरे का
राष्ट्र0हित में निर्णय करना
उसे कार्यरूप में लाना,
आपके साहस को
सबने ही माना।
अटल जी
यह आपकी स्तुति नहीं,
अपितु
विवेचना है
मेरे स्तर की।
आज
मैंने पुनः सकल्प किया है
आगे बढ़ने का मार्ग
प्रशस्त किया है।
मैं
प्रस्तुत करता हूँ स्वयं को
राष्ट्रहित के लिए,
और
दिलाता हूँ भरोसा
ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा
बनेगी जीवन लक्ष्य,
तथा राष्ट्र सेवा।

                                              #अ.कीर्तिवर्धन

परिचय : अ.कीर्तिवर्धन का जन्म १९५७ में हुआ है। शामली (मुज़फ्फरनगर)से आपने प्राथमिक पढ़ाई करके बीएससी मुरादाबाद से किया। इसके अलावा मर्चेन्ट बैंकिंग, एक्सपोर्ट मैनेजमेंट और मानव संसाधन विकास में भी शिक्षा हासिल की है। १९८० से नैनीताल बैंक लि. की मुज़फ्फरनगर शाखा में सेवारत हैं। प्रकाशित पुस्तकों में-मेरी उड़ान,सच्चाई का परिचय पत्र,मुझे इंसान बना दो तथा सुबह सवेरे आदि हैं। राष्ट्र भारत(निबंधों का संग्रह)भी आपकी कृति है तो नरेंद्र से नरेंद्र की ओर प्रकाशनाधीन है। व्यक्तित्व व कृतित्व पर ‘सुरसरि’ का विशेषांक ‘निष्णात आस्था का प्रतिस्वर’ कीर्तिवर्धन भी आपकी उपलब्धि है।’सुबह सवेरे’ का मैथिलि में अनुवाद व प्रकाशन भी किया है। आपकी कुछ रचनाओं का उर्दू ,कन्नड़ ओर अँग्रेजी में भी अनुवाद अंग्रेजी में अनुवाद हुआ है। साथ ही अनेक रचनाओं का तमिल,अंगिका व अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हो चुका है। आपको ८० से अधिक सम्मान, उपाधियाँ और प्रशस्ति-पत्र मिले हैं। विद्यावाचस्पति,विद्यासागर की उपाधि भी इसमें है। आप सेवा के तहत ट्रेड यूनियन लीडर सहित अनेक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।